अगर फिल्म निर्देशक मनमोहन देसाई न होते तो शायद चालू फिल्में, मसाला फिल्म, बंबइया सिनेमा जैसे शब्दों से हम अपरिचित ही रह जाते। वे इस बात को बिना झिझक स्वीकारते थे कि उनकी फिल्में एक चाट की तरह होती हैं जिसमें सभी मसाले होते हैं। उनका एक इंटरव्यू मुझे याद है जिसमें उन्होंने बताया कि उनकी नई फिल्म में 22 ऐसे नए आइटम हैं जिन्हें…

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आजादी के 65 सालों बाद भी हम पाते हैं कि एक समतामूलक समाज बनाने में भारत की प्रगति धीमी और निराशाजनक है। महिलाओं के प्रति भेदभाव फल-फूल रहा है और धर्म, जाति, अमीर, गरीब, शहरी-ग्रामीण विभाजकों में समान रूप से मौजूद है। आज 2013 में और बहुतेरे न्यायिक प्रावधानों के उपरांत कहा जा सकता है कि चीजें पहले से बेहतर हैं; फिर भी कुछ चीजें…

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अक्षत वर्मा की शॉर्ट फिल्म मम्माज़ ब्वायज़ को देखकर यह समझ में आ जाता है कि अभी भारत में शॉर्ट फिल्मों को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है। यह महाभारत के बहाने एक घटिया कॉमेडी फिल्म बनाने की कोशिश है। आश्चचर्य की बात यह है कि ज्यादातर रिव्यूज में इसे बेहद यूनीक, स्टाइलिश और मार्डन फिल्म बताया गया है। स्क्रोल का आलेख सेफ गेम…

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पिछले दिनों लंबी रेल यात्राओं के दौरान बहुत सी फिल्मी छवियां मन में कौंध गईं। भारतीय फिल्मों का तो रेलगाड़ी से गहरा रिश्ता रहा है। जरा सुपरहिट फिल्म ‘शोले’ का पहला सीन याद करिए। एक खाली से सूनसान प्लेटफार्म पर धुंआ उगलती ट्रेन रुकती है। एक शख्स उतरता है। इसके बाद से फिल्म के टाइटिल स्क्रीन पर उभरने शुरु होते हैं। निर्देशक बड़ी सहजता से…

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शायद एक वक्त आएगा जब लोग आश्चर्य करेंगे कि किसी पुरुष के स्त्रियों जैसे व्यवहार को लंबे समय तक भारतीय सिनेमा में मजाक का विषय माना जाता रहा है। हिन्दी सिनेमा इस मामले में खासा निष्ठुर रहा और उसने उसी निर्ममता से उसने उभयलिंगी (Bisexual), ट्रांससेक्सुअल या ट्रांसजेंडर लोगों का मजाक उड़ाने वाला बर्ताव किया जैसा तत्तकालीन सोसाइटी करती थी। अर्से तक सिनेमा में इस…

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एंग्री बर्ड्स बच्चों की मासूम फिल्म नहीं है। यह एक पॉलिटिकल फिल्म है। या कहें तो यह एनीमल फॉर्म की तरह एक बेहद स्पष्ट पॉलिटिकल एलेगरी है। जो सीधे-सीधे यूरोपीय देशों में शरणार्थियों की समस्या, इस्लामिक आतंकवाद और अमेरिका की नीतियों पर बात करती है। यह हॉलीवुड की तमाम बेहतरीन एनीमेशन फिल्मों जैसे द लॉयन किंग, टॉय स्टोरी, अप, बोल्ट और फ्रोजन की तरह मानवीय…

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‘वेटिंग’ तीन स्त्रियों का सिनेमाई जादू है। अनु मेनन का सधा हुआ, सहज निर्देशन… जिसके कारण फिल्म धीरे-धीरे आपके भीतर उतरती है। कल्कि का खुद को चरित्र के भीतर समाहित कर लेना और सुहासिनी मणिरत्नम का प्रभावशाली तरीके से हिन्दी सिनेमा में कदम रखना। बाकी नसीरुद्दीन शाह के अभिनय पर कुछ अलग से कहने की जरूरत नहीं, वे तो जैसे इन तीन स्त्रियों के जादू…

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‘मुगल-ए-आजम’, ‘हीर-रांझा’, ‘सोहनी-महीवाल’ और ‘बाजीराव-मस्तानी’… बॉलीवुड को प्रेम के किस्से लुभाते रहे हैं और शायद हर लार्जर दैन लाइफ फिल्म बनाने वाले निर्देशक का सपना होता है कि वह अतीत की किसी ऐसी ही कहानी को भव्य तरीके से प्रस्तुत करें। अपनी हर फिल्म में उत्तरोत्तर भव्य होते गए संजय लीला भंसाली की कुछ ऐसी महत्वाकांक्षा ‘बाजीराव मस्तानी’ के प्रोमो में झलकती है। थोड़ा पलट…

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भारतीय सिनेमा में अपने किस्म के अनूठे फिल्मकार कमल स्वरूप ने लोकसभा चुनाव के दौरान बनारस जाकर एक डाक्यूमेंट्री फिल्म बनाई- ‘बैटल ऑफ बनारस’। उनके शब्दों में वे ‘भारतीय जीवन में चुनाव की उत्सवधर्मिता’ और ‘भीड़ के मनोविज्ञान’ का फिल्मांकन करना चाहते थे। मगर उनकी फिल्म सेंसर बोर्ड को आपत्तिजनक लगी और इसे मंजूरी देने इनकार कर दिया गया। वे ट्रिब्यूनल के पास गए उन्होंने…

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आखिर किसी ने तो ऐसी फिल्म बनाई, जहां हम एक भारतीय परिवार को बिल्कुल उस तरह से देख सकते हैं जैसे कि वे सचमुच में हैं। अपनी तमाम लाचारियों, तकलीफों, कमजोरियों और खुशी के लम्हों के साथ। फिल्म का प्रोमो देखकर लगता है कि यह फर्जी खुशियों को दर्शाने वाली एक बनावटी सी फिल्म है मगर इसके उलट यह डार्क और खुरदरी है। मगर ठहरिए,…

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