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फूलों का तारों का, सबका कहना है

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कभी-कभी कुछ ऐसे गीत याद आते हैं जो स्मृति पर एक अमिट छाप छोड़ चुके हैं. कुछ ऐसे गीत जो हमारे भीतर एक गहरी नैतिकता विकसित करते हैं, जो कभी थोथे शब्दों से नहीं पैदा होती. यहां मैं उन गीतों का जिक्र करना चाहता हूं जो कुछ खास रिश्तों को बड़ी कोमलता से स्पर्श करते हैं.

जहां तक मुझे याद आता है हिन्दी सिनेमा में बेटियों पर लिखे गए गीत न के बराबर हैं. मगर कभी-कभी का एक गीत याद करें… मेरे घर आई एक नन्ही परी… खय्याम की खूबसूरत धुन और शब्दों का बेमिसाल चयन… जरा देखें, होठ जैसे कि भीगे-भीगे गुलाब, गाल जैसे कि दहके-दहके अनार….

भाई-बहन पर बहुत से फिल्मी गीत उपदेशात्मक और औपचारिकता से भरे लगते हैं, मगर उनके बीच के सहज और नैसर्गिक प्यार को फिल्म हरे रामा हरे कृष्णा का यह गीत खूब अभिव्यक्त करता है… फूलों का तारों का, सबका कहना है, एक हजारों में मेरी बहना है…

इसके बोल देखें, हम तुम दोनों देखो हैं इक डाली के फूल, मैं ना भूला तू मुझको कैसे गई भूल…

अब जरा याद करें इन दो गीतों को- बड़ा नटखट है कृष्ण कन्हैया, का करे यशोदा मैय्या (अमर प्रेम) या फिर चंदा है तू, मेरा सूरज है तू, ओ मेरी आंखों का तारा है तू…. एक मां के अपने बेटे के प्रति प्रेम, लगाव और अनुराग को महसूस करने के लिए इन गीतों से बेहतर शायद ही कोई उदाहरण हो. गीत और भी होंगे मगर ये न जाने कैसे धुंधली होती यादों के बीच अमर हो गई धुन की तरह तैरते रहते हैं….

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