Margarita With a Straw Movie review

खुद को जानने की छटपटाहट, मार्गरीटा विद अ स्ट्रा

शारीरिक या मानसिक रूप से अक्षम नायकों पर हिन्दी में कई फिल्में बनीं हैं। अक्सर ये फिल्में अक्षम नायकों की सामाजिक रूप से स्वीकारोक्ति को अपना विषय बनाती हैं। अक्सर इन फिल्मों में अधूरे नायकों की अपनी शारीरिक सीमाओं से परे निकलकर खुद को साबित करने छटपटाहट को अभिव्यक्ति दी जाती है। इस तरह की फिल्मों में सबसे पहले सई पराजंपे की ‘स्पर्श’ का सहज ही ख्याल आ जाता है। जहां एक नेत्रहीन शिक्षक सामाजिक रूप से अपने आत्मगौरव को बनाए रखने के लिए संघर्ष करता है। उसका यह संघर्ष  सामाजिक नहीं बल्कि भावनात्मक है और सई ने इसे बखूबी प्रस्तुत भी किया है।

संजय लीला भंसाली ने आश्चयर्यजनक रूप से अपनी बहुरंगी शैली के बीच ऐसे विषय में भी महारत हासिल कर रखी है। उनकी पहली फिल्म ‘ख़ामोशी द म्यूज़िकल’ ही एक मूक-बधिर दंपति की करुण कथा सामने लेकर आती है। ‘ब्लैक’ अभिव्यक्ति की छटपटाहट लिए एक मानवीय संवेदना से भरी कथा है। इस कड़ी में ‘गुज़ारिश’ को भी रख सकते हैं जहां एक व्यक्ति अपनी अपाहिज जिंदगी से तंग आकर इच्छा मृत्यु को चुनना चाहता है।

पिछले दिनों आई ‘मार्गरीटा विद अ स्ट्रा’ इन फिल्मों से थोड़ा अलग हाशिए पर जाकर खड़ी होती है। अपने नाम की तरह फिल्म की सामान्य से हटकर है। मार्गरीटा फिल्म की नायिका का नाम नहीं है। यह व्हीलचेयर पर जीवन बिताने वाली अक्षम लड़की लैला (कल्कि कोएचलिन) की कथा है, जो एक वास्तविक जीवन के चरित्र से प्रेरित है। वह सेरेब्रल पल्सी की बीमारी से पीड़ित है। एक धीमा और निरंतर संघर्ष उसकी नियति है। चाहे किसी से अपनी बात कहनी हो या फिर छोटी-छोटी निजी जरूरतें हों। मगर लैला का संघर्ष अपने सरवाइवल के लिए नहीं है। उसके पास सब कुछ है। उसकी देखभाल करने वाले माता-पिता, भाई, एक अपने जैसा दोस्त और अपनी मर्जी से रचनात्मक काम करने की संतुष्टि। मगर कुछ तो ऐसा रहता है जहां जाकर लैला ठहर जाती है। उसे यह याद रखना पड़ता है कि वह आम लोगों से अलग है, बार-बार यह अहसास दिलाते जाने के बावजूद कि उसे भी आम लोगों की तरह ही जीने का हक है।

लैला अपने माता-पिता के संशय और भय के बीच उस साधारण जिंदगी की सीमाओं का अतिक्रमण करती है, जिनके बीच जीते रहना उसकी मजबूरी है। वह अपने भीतर के मन को (और सेक्सुअलिटी को) एक्सप्लोर करती है। इस क्रम में उसे अपनी बाइसेक्सुअलिटी के बारे में पता लगता है। क्रिएटिव राइटिंग की क्लासेज करते हुए एक विदेशी लड़के से पहली बार लैला के शारीरिक संबंध बनते हैं। बाद में पाकिस्तान से आई एक अंधी लड़की खानम (सयानी गुप्ता) से वह शारीरिक और भावनात्मक रुप से जुड़ जाती हैऊपरी तौर पर फिल्म बस इतनी ही है। बिना किसी उतार-चढ़ाव वाली इस कहानी में लैला के जीवन के छोटे-छोटे प्रसंगों को एक घंटे 40 मिनट की फिल्म में बदल दिया गया है। । हां, लैला की मनपसंद कॉकटेल ड्रिंक मार्गरीटा यहां एक प्रतीक की तरह है। जीने के लिए तमाम नियमों के बीच अपनी इच्छाओं के जरिए खुद के करीब जाने का।

फिल्म अपनी परिणति में अमूर्त है। वह एक खुले अंत की तरफ बढ़ती है, जहां हमें यह नहीं पता होता है कि फिल्म पटकथा में पिरोई गई घटनाओं की श्रंखला में किस निष्कर्ष की तरफ जा रही है मगर अंत में लैला को सेल्फ रियलाइजेशन की तरफ बढ़ता हुआ देखते हैं। बावजूद इसके निर्देशक शोनाली बोस और निलेश मनियार ने फिल्म को दार्शनिकता में नहीं उलझने दिया है। उन्होंने यथार्थवादी शैली में सीमित संवादों के जरिए कहानी को आगे बढ़ाया है। उनका जोर डिटेलिंग पर नहीं है। यही वजह है कि शुरु में मेटाडोर में चलती रेवती थोड़ी अटपटी सी दिखती है, मगर थोड़ी ही देर में हम पूरे परिवार के लिए उस गाड़ी के महत्व को बिना कहे समझ जाते हैं। यह परिवार भी अनोखा सा है। लैला सिख पिता और दक्षिण भारतीय मां की संतान है। निर्देशक द्वय का जोर चरित्रों के प्रस्तुतिकरण और उनके आपसी अंतर्संबंधों पर ज्यादा है। ये किरदार जब एक-दूसरे के करीब आते हैं तो उनके बीच एक आभासी सा ‘इमोशनली चार्ज्ड एनवायरमेंट’ विकसित होने लगता है। चाहे वह लैला और उसकी मां (रेवती) के बीच के रिश्ते हों या लैला और खानम के बीच अंकुरित होता हुआ प्रेम जो सिर्फ परिस्थितिजन्य शारीरिक नहीं है बल्कि अपने भावनात्मक अधूरेपन को एक-दूसरे में तलाशने की कोशिश है।

इस फिल्म को कल्कि कोएचलिन के सहज अभिनय के लिए देखा जाना चाहिए। कल्कि को देखते हुए क्षण भर को भी नहीं लगता है कि वह किसी पात्र को स्क्रीन पर ला रही है या उस किरदार में डूब जाने के लिए मेहनत कर रही हो। वह बस जैसे इस फिल्म को जी रही है। कल्कि की सबसे बड़ी चुनौती थी फिल्म के कई संवेदनशील हिस्सों में किरदार के इमोशंस को अभिव्यक्त करना जबकि खुद उसका किरदार ऐसा है जो खुद को अभिव्यक्त नहीं कर पाता, न शब्दों और भाषा के जरिए और न ही भावाभिव्यक्ति के जरिए। मगर कल्कि ने यह कर दिखाया है और अपनी सेक्सुअलिटी को भांपने जैसे जटिल मनोभावों को भी वह बेहद सहजता से निभा ले जाती हैं। फिल्म में दो और कभी न भूलने वाले चरित्र हैं।

पहली लैला की मां बनी रेवती, जो अब से 25 साल पहले मणि रत्नम की ‘अंजलि’ में भी मानसिक रूप से अविकसित छोटी बच्ची की मां बन चुकी हैं। उन्होंने एक अक्षम बेटी की मां की चिंताओं को बखूबी अभिव्यक्त किया है। एक मां की चिंताओं को बयान करने के लिए पटकथा में अलग से दृश्य या संवाद नहीं रचे गए हैं। ये चिंताएं उनकी साधारण रोजमर्रा की बातचीत में एक परछांई की तरह हर वक्त मौजूद रहती है। रेवती फिल्म में बराबर उन परछाइयों का अहसास दिलाती रही हैं। इस चिंतित और केयरिंग मां के चरित्र का एक दूसरा पहलू भी है। वह दूसरे लोगों के मुकाबले बदलावों के प्रति बहुत उदार है, अनजान राहों पर चलने का जोखिम उठाती लैला को सबसे पहला समर्थन उसकी अपनी मां से ही मिलता है। कैरेक्टर में यह आयाम लाना आसान नहीं था।

दूसरा अहम किरदार है सयानी गुप्ता का। उसका चरित्र ज्यादा खुलता नहीं मगर उसमें कई परतें हैं। सयानी एक ही वक्त में उदास और बिंदास दोनों ही है। लैला के प्रति उसके खिंचाव और आकर्षण को दिखा पाना निर्देशक और अभिनेता दोनों के स्तर पर एक मुश्किल काम था। सयानी ने सहज तरीके से इस चुनौतीपूर्ण भूमिका को अंजाम दिया है। समलैंगिक रूझान को निर्देशक ने पूरी संवेदनशीलता से रखा है, यह लगभग एक केंद्रिय विषय की तरह फिल्म में मौजूद है। नहीं तो हिन्दी फिल्मों में ऐसे रिश्तों को महज कॉमेडी तक सीमित कर दिया गया है।

अपनी तमाम अच्छाइयों के बावजूद ‘मार्गरीटा…’ एक फील गुड मूवी है। यह जिंदगी के बहुत से सवालों को हाशिए पर रखते हुए ही अपने विषय पर चर्चा कर पाती है। इसके साथ ही फिल्म का पेस बहुत धीमा है। यदि हम उन फिल्मों की बात करें जो अक्षम चरित्रों के इर्द-गिर्द हैं तो पाएंगे कि उन किरदारों में एक किस्म का आवेग था, चाहे वो सई परांजपे के नसीर हों या फिर भंसाली के नाना पाटकर व रानी मुखर्जी। शारीरिक अक्षमता भावनात्मक तीव्रताओं को जन्म देती है। इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण स्टीफेन ज्विग का उपन्यास ‘बिवेयर ऑफ पिटी’  है। जिसका युवा नायक एंटोन जब पक्षाघात की शिकार एडिथ से मिलता है तो उसके साथ-साथ पाठकों को भी अनुमान भी नहीं होता है कि आने वाले समय में वे किन भावनात्मक झंझावातों से रूबरू होने जा रहे हैं।

‘मार्गरीटा…’ में खूबी यह है कि इसे मेलोड्रामा से दूर रखा गया है। न वेबजह आंसू बहे और न ही भावुकता भरे संवाद बोले गए। न ही नायिका के प्रति संवेदना दिखाने के लिए के एक भी दृश्य रचा गया है। इसका मेलोड्रामा कहानी की ऊपरी सहत से काफी नीचे हिलकोरे लेता रहता है… मगर ऊपरी तौर पर उस भावनात्मक तीव्रता की कमी खलती है, जिसके चलते किरदार और फिल्म अर्से तक याद रह जाते हैं।