क्या मल्टीप्लेक्स में बाहर का खाना ले जाने से चीज़ें ठीक हो जाएँगी?

“चीज़ें सिर्फ़ मल्टीप्लेक्स में बाहर का खाना ले जाने की अनुमति दिए जाने भर से ठीक नहीं होंगी, क्यूँकि बतौर एक व्यवसाय भारत में सिनेमा प्रदर्शन उद्योग के साथ चीज़ें ख़राब कहीं और से हैं. वहाँ से जहाँ किसी की नज़र जाती नहीं, या जाने ही नहीं दी जाती.”

बंबई हाईकोर्ट के नवीनतम आदेश के बाद अब महाराष्ट्र के मल्टीप्लेक्स किसी भी दर्शक को बाहर से खाने का सामान लाने से नहीं रोक सकेंगे. सुनने में आ रहा है कि इससे उत्साहित होकर व बंबई हाईकोर्ट के इस आदेश की नज़ीर को आधार बना कर दिल्ली के सुल्तान केजरीवाल भी वहाँ के मल्टीप्लेक्स पर यह छूट देने का डंडा चलाने की फ़िराक़ में हैं.

वैसे अगर थोड़ी सी गहराई से देखें तो मल्टीप्लेक्स में घर से या बाहर से खाना ले जाने की सुविधा से समग्र हालात में कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ेगा, हाँ मल्टीप्लेक्स संचालकों की हालत कुछ और पतली ज़रूर हो सकती है. और ज़ाहिर है, ऐसी स्थिति में वे अपने घाटे की भरपाई टिकट के पहले से ही आसमान छूते दामों को बढ़ा कर करेंगे, आख़िर व्यापारी परिवारों में “तेल तो तिलों से ही निकलेगा” जैसी कहावतें पीढ़ियों से यूँ ही नहीं चली आ रही हैं. कुल मिलाकर दर्शकों के लिए स्थितियाँ जस की तस ही रहेंगी.

“दरअसल दिक़्क़त मल्टीप्लेक्स के टिकट दाम ऊँचे होने से नहीं है, दिक़्क़त कहीं और है जहाँ किसी का ध्यान जाने ही नहीं दिया जाता.”

असल दिक़्क़त उन अश्लील विसंगतियों भरी सरकारी नीतियों में है जो अनाप-शनाप रक़म ख़र्च करके करोड़ों की लागत से बनाए गए मल्टीप्लेक्स को तो सालों तक टैक्स में भारीभरकम छूट देती हैं, लेकिन टीवी, केबल, डीवीडी और पायरेसी जैसे तमाम झंझावात झेलते हुए भी सस्ते दामों पर सिनेमा को आम जनता तक पहुँचाते हुए किसी तरह ज़िंदा खड़े दशकों पुराने सिंगल स्क्रीन थिएटर्स को इतनी विपरीत परिस्थितियों में भी कोई रियायत नहीं देना चाहती हैं.

एक छोटा सा उदाहरण काफ़ी होगा शायद. मध्यप्रदेश सरकार की आधिकारिक मल्टीप्लेक्स नीति के अनुसार कोई नया मल्टीप्लेक्स बनाने पर 5 सालों तक मनोरंजन कर में राज्य सरकार की तरफ़ से क्रमशः 100%, 100%, 100%, 75% और 50% छूट मिलती है.

लेकिन यह छूट तभी मिलेगी, जब उस मल्टीप्लेक्स की लागत कम से कम 2 करोड़ रुपए हो, तथा कम से कम 500 सीटों वाले 2 सिनेमाघरों के साथ साथ वहाँ 1 अदद फूड कोर्ट, 1 बड़ी सी पार्किंग लॉट और 1 चमचमाता हुआ महँगा वीडियो गेम्स आर्केड (वाक़ई!) भी अवश्य बना हुआ हो.

और यक़ीन जानें, इतने सारे प्रपंच करने में 2 करोड़ नहीं, कम से कम 5 करोड़ की न्यूनतम लागत आएगी ही. अब आप सोचें, 5 करोड़ रुपए सिर्फ़ लागत में ख़र्च करने के बाद; स्टाफ़, बिजली, रखरखाव का नियमित ख़र्च और सबसे बढ़ कर डिस्ट्रीब्यूटर का हिस्सा निकाल कर मुनाफ़ा कमाने के लिए मल्टीप्लेक्स अगर 200 रुपए का समोसा और 400 रुपए का टिकट नहीं बेचेगा, तो क्या करेगा? इंटरवल में दर्शकों को अफ़ीम बेचेगा? तो गड़बड़ी जहाँ है, वहाँ सबकी आँखें मुँदी रहती हैं. और क्या सेक्युलरवादी क्या राष्ट्रवादी, इस नीतिगत हरामख़ोरी में सब सरकारें एक साथ ख़ुशी-ख़ुशी शामिल रहती हैं. भारत में सिनेमा की सामूहिक हत्या के ख़ून से इन सबके हाथ रंगे होंगे.