लोकतंत्र के विरोधाभास और विशाल भारद्वाज के शेक्सपीयर

लोकतंत्र की परिकल्पना त्रुटिहीन, निष्कलंक प्रणाली के रूप में कभी नहीं की गई। ये ऐसा ढांचा रहा है, जिसमें अधिकतम असहमतियों के साथ सहमत होकर आगे बढ़ने का पर्याप्त स्पेस रहा है और अधिकतम सहमतियों के साथ ठहराव को भी स्वीकार कर लिया गया है।

असहमतियां कई स्तरों पर रही हैं। सांस्कृतिक, राजनीतिक या आर्थिक सवालों पर मतभिन्नताओं को खत्म करने का औजार भी लोकतंत्र ने ही उपलब्ध कराया है। ये ऐसा ढांचा है, जिसने पहचानों को ठोस होने का स्पेस दिया तो उन्हें छीजते जाने के भी पर्याप्त कारण उपलब्ध कराए। लोकतंत्र के इस द्वैध के बीच ही मनुष्य होने की अनुभूति बची रही। संवेदनाओं और संवेगों के साथ जीने की सहूलियत रही है।

लोकतंत्र अच्छा है। मैं ऐसा इसलिए कहता हूं क्योंकि अन्य प्रणालियां इससे बदतर हैं।
इसलिए हम लोकतंत्र को स्वीकार करने के लिए बाध्य हैं।
– जवाहर लाल नेहरू

“किस तरफ हैं आप?”

विशाल भारद्वाज की ‘हैदर’ में गजाला मीर डॉ हिलाल मीर से जब ये सवाल पूछती हैं तो ऐसा लगता है कि लोकतंत्र के उसी द्वैध को खत्म करने की कोशिश की जा रही है, जिसके पाटों के बीच मनुष्यता जी रही है। ये सवाल जार्ज बुश के उस आततायी विकल्प की तरह लगता है, जिसे उन्होंने 16 साल पहले दुनिया के समक्ष रखा था— You’re either with us, or against us.

विशाल भारद्वाज की शेक्सपीरियन त्रयी -मकबूल, ओमकारा और हैदर- मनुष्यता के छीजते जाने की ऐसी ही त्रासदियों का आख्यान हैं। 16वीं सदी के यूरोप की पृष्ठभूमि पर लिखी गईं विलियम शेक्सपियर की त्रासदियां विशाल की फिल्मों में 21वीं सदी के भारत में ढलती हैं तो वे व्यक्तियों या परिवारों की त्रासदियां भर नहीं रह जातीं, बल्कि देश—काल की त्रासदियों का प्रतीक बन जाती हैं।

मौजूदा दौर में जबकि राजनीति और सत्ता की अभिप्सा हमारी रोजमर्रा की आम-ओ-दरफ्त में जहर के डंक चुभो रही है, और इसे नकारना बिलकुल वैसे ही जैसे किसी बच्चे का डर कर आंखें भर मूंद लेना, विशाल भारद्वाज की शेक्सपीरियन त्रयी बिलकुल नई अर्थवत्ता के साथ सामने आती है। यह अर्थवत्ता है मनुष्य की स्वायत्तता के खात्मे की कोशिशों को समझने की, आजाद-खयाली को खत्म कर सत्ता के विचारों को ही आम विचार बता देने की, धूर्तता को समझने की। सामंती बेड़ियों को मजबूत कर मानवीयता को नष्ट करने की साजिशों को समझने की।

20वीं सदी की सांझ आते-आते लगभग अस्त हो चुके ‘पैरलल सिनेमा’ को बॉलीवुड के नए जॉनर ‘मुंबई नॉयर’ ने सांस दी थी। मुंबई के अंडरवर्ल्ड और शहरी जिंदगी में आम आदमी की जीने की जद्दोजहद के इर्दगिर्द ऐसा सिनेमा बुना जा रहा था, जिसमें यथार्थ भी था और दर्शकों को ढाई घंटे तक थियेटर में बैठाए रखने वाला मसाला भी। 20वीं सदी का पैरलल सिनेमा यही मसाला नहीं ढ़ूंढ़ पाया और आम सिनेमा बनने के बजाय खास सिनेमा बनकर रह गया।

विशाल भारद्वाज ने अपनी फिल्मों में आदमी और औरत के रिश्तों की ऐसी कहानियां कहीं, जिस पर दबी जुबान में ही बात होती थी।

‘मकड़ी’ (2002) के जरिए बड़े पर्दे पर बतौर निर्देशक दस्तक दे चुके विशाल भारद्वाज को पहचान ‘मकबूल’ (2003) ने दी, जो ‘मुंबई नॉयर’ की एक अहम कड़ी है। मकड़ी से वाया मकबूल होते हैदर तक विशाल ने 8 फिल्मों का ऐसा बाइस्कोप तैयार किया है, जिसमें मौजूदा दौर की राजनीति के वो कोने दिखा दिए गए, जिसे छूने से हिंदी सिनेमा कतराता था; ग्रामीण जीवन के उस हिस्से पर रोशनी डाली गई, जिसे हिंदी सिनेमा अवांछनीय मानता था; आदमी और औरत के रिश्तों की ऐसी कहानियां कही गईं, जिस पर दबी जुबान में ही बात होती थी।

विशाल ने अपनी फिल्मों मे गाढ़े यथार्थ और धुंधले गल्प का ऐसा विन्यास तैयार किया है कि होठों पर फैली मुस्कुराहट एकाएक कचोटने लगती है। सघन हो रहीं भावनाएं उद्वेलित हो उठती हैं। सरोकारों के सवाल पर आप कसमसा उठते हैं। कहानियों में विन्यस्त त्रासदियां झकझोरती हैं, लेकिन बहुत ही जटिल लगती नियति की विडंबनाएं निढाल कर देती हैं।

मकबूल के बाद द ब्लू अंब्रेला (2005), ओमकारा (2006), कमीने (2009), 7 खून माफ (2011), मटरू की बिजली का मंडोला (2013) और हैदर (2014) विशाल की अन्य फिल्में हैं। इन फिल्मों में ‘मकबूल’, ‘ओमकारा’ और ‘हैदर’ विलयम शेक्सपियर की त्रासदियों क्रमश: ‘मैकबेथ’, ‘ऑथेलो’ और ‘हेमलेट’ पर आधारित हैं। विशाल की ये तीनों फिल्में शेक्सपीरियन त्रयी के नाम से भी जानी जाती हैं। लेख की अगली कड़ी में हम इन पर विस्तार से चर्चा करेंगे। (जारी है)