हैदरः कश्मीर के नैरेटिव में कहां मौजूद है हैमलेट?

 

हैलो? हैलो? माइक टेस्टिंग 1,2,3… हैलो…? आवाज आ रही है आप लोग को? हेलो, हेलो, हेलो, हेलो, हेलो? यूएन काउंसिल रिजॉल्यूशन नबंर 47 ऑफ 1948, आर्टिकल 2 ऑफ द जेनेवा कन्वेंशन, एंड आर्टिकल 2 ऑफ द जेनेवा, एंड आर्टिकल 370 ऑफ इंडियन कॉन्स्टीट्यूशन। बस एक सवाल उठाता है, सिर्फ एक… हम हैं, या हम नहीं। हम हैं तो कहां हैं, और नहीं हैं तो कहां गए? हम है तो किसलिए और कहां तो कब?  (हैदर)

फिजां में बहुत शोर है। भौंकते कुत्ते, गाड़ियों के घरघराहट, फौज के बूटों की धमक, टीवी चैनलों पर चीखते एंकर, विश्वविविद्यालय में मिमिक्री करता नेता, भाषणों पर तालियां पीटते अध्यापक, सीटियां बजाते मसखरे, आजादी—आजादी का नारा लगाती भीड़, रात में बिलखते बच्चे, चूड़ियों की खनक…। हम शोर से घिरे हैं, लेकिन क्या उन सभी आवाजों को सुन पाते हैं, जो उस शोर में शामिल है? जैसे चुनने की राजनीति होती है, वैसे ही सुनने की राजनीति होती है।

हिंदी सिनेमा के पर्दे पर कश्मीर पहाड़ों, चिनारों, झील और बर्फीली वादियों से ज्यादा नहीं रहा। बिलकुल उतना ही जितना कश्मीर हमारे मुल्क की बहुसंख्य आबादी के जहन में है। इसके बाद कश्मीर का जो दूसरा नैरेटिव है, उसे गढ़ा है मीडिया ने, उन विजुअल्स के जरिए जिनमें हाथों में पत्थर या तख्तियां लिए फिरान पहने लोग होते हैं और दूसरे ओर बंदूके ताने फौजी वर्दियां पहने लोग। बॉलीवुड की पारंपरिक फिल्मों और मीडिया के प्रोपगंडा से मिलकर जो कश्मीर बनता है, वह अतिरंजना का चरम है। एक सिरे पर कश्मीर भूगोल है तो दूसरे सिरे पर आंदोलन। इसके बीच आम जिंदगी भी हैं, लोग हैं, उनके दुख और तकलीफें हैं, ये सिरा हिंदी फिल्मों से गायब रहा है। ‘हैदर’ बॉलीवुड की ऐसी फिल्म के रूप में सामने आती है, जो कश्मीर की अवाम की ओर से पूछती है—हम हैं कि हम नहीं? वह आवाज लगाती है और पूछती है कि हम हैं तो कहां हैं, और नहीं हैं तो कहां गए?

कश्मीर भारत के माथे पर रिसता हुआ जख्म है और विशाल भारद्वाज ने उस जख्म को पर्दे पर उतारा है। डिसएपियर्ड, आधी बेवाएं, क्रैक डाउन, तलाशी, कर्फ्यू, कैंप जैसे शब्द कश्मीर की तकलीफों के पर्याय हैं, लेकिन ये मेनस्ट्रीम के इस्तेमाल और विमर्श दोनों से गायब हैं। ये विकास और कैशलेस जितने भाग्यशाली नहीं हैं।

“हमारा आसमान काले परिंदों से घिरा हुआ है। कही किसी चूजे को चील उठा के ले जाती है तो कहीं बुलबुल को बाज जिंदा नोंच लेते हैं।” (हैदर)

डॉ हामिद मीर जब अपनी बहू गजाला को ये मशविरा देते हैं कि वो हैदर को अलीगढ़ भेज दे, हिंदुस्तान उस रूप को देखने के लिए जहां “न दिन पर पहरे हैं और न रात पर ताले” तो ये मशविरा बिलकुल वैसा ही लगता है, जैसे उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र या तमिलनाडू के किसी गांव या कस्बे में रह रहा दादा अपने पोते को दे। कश्मीर में बचपन फौज की बूटों और मिलिटेंसी के नारों की बीच पिस गया है, फिर भी भारत का वो हिस्सा मेनस्ट्रीम में आता है तो केवल बम धमाकों, आंदोलनों और फौज की वजह से। बच्चे, किशोर, युवा, महिलाएं और बुजुर्ग कश्मीर के नक्शे से गायब हैं।

‘हैदर’ कश्मीर के उस छूटे हुए हिस्से पर बात करती है। ये कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि ‘हैदर’ में राजनीति, कश्मीरी समाज की गतिकी और आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी दास्तावेजी ढंग से दर्ज है। विशाल ने संवाद, प्रतीकों और रूपकों के जरिए कश्मीर के सियासी इतिहास का जो कोलाज तैयार किया है, वो हिंदी सिनेमा के अदभुत प्रयोगों में से एक है। रंग और ग्रैफिटी फिल्म में प्रॉपर्टीज के बजाय फिल्म में पात्र जैसे प्रतीत होते हैं, जो कहानी को आगे बढ़ा रहे हैं। ‘हैदर’ हमारे दौर का जरूरी सिनेमा है।

सतह पर विशाल की शेक्सपीरियन त्रयी मकबूल, ओमकारा और हैदर की त्रासदियों का आख्यान लगती है, मानों अपने दौर के सामाजिक ढांचे, राजनीतिक षडयंत्रों, सहज मानवीय संवेगों से उपजी कमजोरियों के शिकार हैं तीनों नायक। प्यार और वफादारी की कश्मकश में उलझा मकबूल, प्रेमिका की सहजता को समझ पाने में नाकाम ओमकारा, पिता की मौत और मां और चाचा की मोहब्बत से आहत हैदर। इनके दुख ऑर्गेनिक हैं, इन पर सवाल उठाना मुश्किल है। चूंकि दर्शक भी उसी नजरिए से देख रहा होता है, जिस नजरिए ये तीनों नायक देख रहे होते हैं, इसलिए इनकी त्रासदियों से सहज ही सहानुभूति होती है।

हालांकि इसी सतह को दूसरी ओर से देखते हैं तो मकबूल, ओमकारा और हैदर के बजाय निम्मी, डॉली और गजाला का जीवन संत्रास से भरा लगने लगता है। तीनों नायक मकबूल, ओमकारा और हैदर अपनी धारणाओं के कैदी नजर आते हैं। नजरिए का ये हेरफेर बिलकुल मौजूदा दौर की राजनीति जैसा है। सत्ता की पीछे खड़े होकर देखने से सत्ता का ही नजरिया दिखता है और स्वाभाविक रूप से सहानुभूति उसी के प्रति होती है। (जारी)