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मकबूल, ओमकारा, हैदर या निम्मी, डॉली, गजाला

सतह पर विशाल की शेक्सपीरियन त्रयी मकबूल, ओमकारा और हैदर की त्रासदियों का आख्यान लगती है, मानों अपने दौर के सामाजिक ढांचे, राजनीतिक षडयंत्रों, सहज मानवीय संवेगों से उपजी कमजोरियों के शिकार हैं तीनों नायक। प्यार और वफादारी की कश्मकश में उलझा मकबूल, प्रेमिका की सहजता को समझ पाने में नाकाम ओमकारा, पिता की मौत और मां और चाचा की मोहब्बत से आहत हैदर। इनके दुख ऑर्गेनिक हैं, इन पर सवाल उठाना मुश्किल है। चूंकि दर्शक भी उसी नजरिए से देख रहा होता है, जिस नजरिए ये तीनों नायक देख रहे होते हैं, इसलिए इनकी त्रासदियों से सहज ही सहानुभूति होती है। हालांकि इसी सतह को दूसरी ओर से देखते हैं तो मकबूल, ओमकारा और हैदर के बजाय निम्मी, डॉली और गजाला का जीवन संत्रास से भरा लगने लगता है। तीनों नायक मकबूल, ओमकारा और हैदर अपनी धारणाओं के कैदी नजर आते हैं। नजरिए का ये हेरफेर बिलकुल मौजूदा दौर की राजनीति जैसा है। सत्ता की पीछे खड़े होकर देखने से सत्ता का ही नजरिया दिखता है और स्वाभाविक रूप से सहानुभूति उसी के प्रति होती है।

“बाहुबली! औरत के तिरया चरित्र को मत भूलना, जे लड़की अपने बाप को ठग सकती है, वो किसी और की सगी क्या होगी?”

एडवोकेट रघुनाथ मिश्र जब अपनी बेटी डॉली मिश्रा का चरित्र प्रमाणपत्र बाहुबली यानी ओमकारा को सौंपते हैं, शक की लकीर उसके बाद ही खिंच जाती है। षडयंत्रों से घिरा ओमकारा बस उस लकीर को मिटाने की कोशिश करता रहता है, लेकिन कामयाब नहीं हो पाता, जबकि इससे अनजान डॉली सहज होकर खुद को समर्पित करती चली जाती है। निम्मी महत्वाकांक्षी है, इसीलिए वो अपने से अधिक उम्र के अब्बाजी के बजाय हमउम्र मकबूल को जीवनसाथी चुनने का साहस करती है। ये चुनाव इतना कर्कश है कि इसके शोर में अब्बाजी का चुनाव दब जाता है। निम्मी का संत्राश उसे उकसाता है कि वो अब्बाजी को मकबूल के हाथों कत्ल करवा दे। निम्मी के जीवन की अनिश्चितिताओं का दुष्चक्र निर्मम महत्वाकांक्षाओं की जमीन तैयार करता है।

ये महत्वाकांक्षाएं साधारण सी लगने वाली भावनाओं को भी निगल जाती हैं। उसके बाद का बनावटीपन धीमे जहर जैसे होता है, जो मकबूल और निम्मी दोनों को खत्म कर देता है। गजाला मीर की त्रासदी भी अनिश्चितताओं का दुष्चक्र ही है। कश्मीर के हालात में पहले अपने पति और बेटे के लिए और फिर अपने और अपने बेटे के लिए एक ऐसी ठांव की तलाश, कि जिसके नीचे सुरक्षित रहा जा सके, उसके बेटे को ही उसका दुश्मन बना देती है। विशाल की शेक्सपीरियन त्रयी के पात्र दरअसल अनिश्चितताओं के उस दुश्चक्र से बाहर आने की लगातार जद्दोजहद करते दिखते हैं, जिसने उनके जीवन को संत्राश और असुरक्षा से भर दिया है। ये अनिश्चितताएं ही उनमें महात्वाकांक्षाओं को जन्म देती हैं; हालांकि तमाम जद्दोजहद के बाद भी वे अपनी नियति को बदल नहीं पाते। अनिश्चितता और नियति का ये गठजोड़ उन्हें निरीह बना देता हैं।

शेक्सपीरियन त्रयी के जरिए विशाल ने केवल स्त्रियों की त्रासदी की कहानियां ही नहीं कही, बल्कि ऐसे स्त्री पात्र भी रचे हैं, जो हिंदी सिनेमा के लिए प्रयोगधर्मी है, जबकि वो हैं यथार्थ जीवन के पात्र। ‘मकबूल’ की निम्मी, ‘ओमकारा’ की डॉली मिश्रा और इंदू त्यागी या ‘हैदर’ की गजाला जैसी स्त्रियां हिंदी सिनेमा के पर्दे पर अवतरित होती हैं तो ऐसा लगता है कि जैसे निर्देशक ने दुस्साहस करने की ठान ली है। स्याह-सफेद, पवित्र-अपवित्र जैसे खांचों में रखकर देखने के अभ्यस्त हो चुके समाज के समक्ष विशाल भारद्वाज ऐसे स्त्री पात्र रचते हैं, जिनका चरित्र, मनोवृत्ति और व्यवहार बिलकुल हमारे इर्दगिर्द से उठाया हुआ है, निरा यथार्थ। उनके नजरिए में कई परतें हैं। उनके द्वंद्व नैसर्गिक हैं, वे सहज हैं, अंतःप्रेरित हैं और स्वाभाविक हैं।

विशाल की फिल्मों की स्त्री पात्र वैसी कभी नहीं रहीं, जिन्हें हमने महाकाव्यों में पढ़ा है। वे न किसी विशेष परिप्रेक्ष्य से परिभाषित संस्कारों का चरम हैं और न अपसंस्कारों से पतित। ये ऐसी स्त्री पात्र हैं, जो अपनी भावनात्मक अंतःक्रियाओं से संचालित हैं, उनमें मनोआवेगों के मुताबिक जीने की साध है, जिसका नतीजा भावनाओं के टकराव, इर्दगिर्द की रुढ़ियों और इच्छाओं के संघर्ष, महत्वाकांक्षाओं और नियति के द्वंद्व के रूप में बार-बार सामने आता है।

हिंदी सिनेमा के पर्दे पर शेक्सपियर

बीती फरवरी में जश्न-ए-रेख्ता में गोपीचंद नारंग ने गुलजार और गालिब के रिश्तों पर एक बात कही थी, “हर वो चीज जो गालिब के साथ जुड़ी हो वो जादू का करखाना है और उस जादू के कारखाने को खोलने की चाभी हमारे जमाने में गुलजार साहब के हाथ में है।“ यही बात शेक्सपियर और विशाल भारद्वाज के रिश्तों पर दोहराई जा सकती है। विशाल ने शेक्सपियर को नए सिरे से समझाया है। उन्होंने शेक्सपियर की त्रासदियों को न केवल भारत की परिस्थितियों में ढाला, बल्कि उन्होंने शेक्सपियर के 16वीं सदी के चरित्रों को 21वीं सदी के यथार्थ के अनुरूप नए सिरे से गढ़ दिया। उनकी आत्मा वही थी, जो शेक्सपियर ने दी, जबकि रूप विशाल ने दे दिया। मैकबैथ की चुड़ैलों को मकबूल में पुलिस इंस्पेक्टर बना दिया। लेडी मैकबेथ को अब्बाजी की रखैल निम्मी बना दिया और वही स्कॉटलैंड के साम्राज्य का प्रतीक भी बन गई, जिसे पाने के लिए मकबूल ने अब्बाजी का कत्ल किया। शेक्सपियर का मूर ऑथेलो, ओमकारा में आधा ब्राह्मण बना दिया गया।

शेक्सपियर की त्रासदियों का रूपांतरण नया नहीं है। पिछले 400 सालों में कई भाषाओं और विधाओं में अलग—अलग तरीके से पेश किया गया है। हालांकि विशाल ने उन्हें हिंदी सिनेमा के पर्दे पर पेशकर चुनौतीपूर्ण काम किया। विशाल ने एक इंटरव्यू में बताया था कि उन्होंने जब शेक्सपियर को हिंदी में एडॉप्ट करने का फैसला किया तो उन्हें हतोत्साहित करने की बहुत कोशिश हुई। उन्होंने जब मकबूल की स्क्रिप्ट पूरी कर ली तो उन्हीं के एक फाइनेंसर मित्र ने सलाह दी की अगर तुम ये फिल्म बनाना चाहते हो तो इससे शेक्सपियर का नाम हटा दो, क्योंकि साहित्य बोरियत भरा होता है। हालांकि उन्होंने ऐसा नहीं किया।

दरअसल मकड़ी के बाद विशाल मुंबई के अंडरवर्ल्ड पर एक फिल्म बनाना चाहते थे। जिन दिनों वे फिल्म की स्क्रिप्ट के लिए संघर्ष कर रहे थे, उन्हीं दिनों उन्होंने मैकबेथ पढ़ी, और ‘अंगूर’ उनके जहन में बैठी हुई थी। ‘अंगूर’ ‘कॉमेडी ऑफ एरर्स’ का बॉलीवुड रूपांतरण थी, जिसे गुलजार ने 1982 में बनाया था। उस फिल्म को ध्यान में रखकर ही विशाल ने मैकबैथ को मुंबई अंडरवर्ल्ड की पृष्ठभूमि पर बनाने का फैसला किया। शेक्सपियर के रूपांतरण के पीछे एक सहूलियत ये भी रही है कि फिल्मकार को स्क्रिप्ट पर अतिरिक्त मेहनत नहीं करनी पड़ती। विशाल ने एक इंटरव्यू में कहा था कि शेक्सपियर ने उन्हें हमेशा एक स्ट्रक्चर दिया, जिससे फिल्म की स्क्रिप्ट आसान हो गई। “मैंने कभी शेक्सपियर की महानता का बोझ महसूस नहीं किया, बल्कि उन्हें अपना सह—लेखक समझा।“ ‘मकबूल’ को मिली तारीफ ने उन्हें ‘ओमकारा’ बनाने के लिए प्रेरित किया।

विशाल भारद्वाज नए दौर के उन चुनिंदा फिल्मकारों में से एक हैं, जिनकी फिल्मों और साहित्य के बीच सतत संवाद होता रहता है और सजीव रिश्ता बना रहता है। उन्होंने रस्किन बांड के नॉवेल ‘द ब्लू अंब्रेला’ पर इसी नाम से फिल्म बनाई है। रस्किन की शॉर्ट स्टोरी ‘सुजान्स सेवन हसबैंड’ पर वो ‘सात खून माफ’ नाम से फिल्म बना चुके हैं।

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