पलटनः बॉर्डर न सही, जे.पी. दत्ता तो हैं

किसी भी क्षेत्र में एक बार कालजयी, बहुप्रशंसित और अत्यधिक सफल मुक़ाम का स्पर्श कर लेना कई नई चुनौतियों को जन्म देते हुए आगे की राह कठिन बना देता है. यह बड़ी सफलताओं से जुड़ी सबसे बड़ी विडम्बनाओं में से एक है जिससे इनकार क़तई नहीं किया जा सकता.

आज से 21 साल पहले साल 1997 में ‘बॉर्डर’ नाम की ज़बर्दस्त युद्ध फ़िल्म बना कर अपने पूरे फ़िल्मी करियर की सबसे ऊँची बुलंदियों को छू लेने वाले जे.पी.दत्ता, तभी से इस विडम्बना के शिकार हो रहे हैं और लगातार हो रहे हैं.

अपने निर्देशकीय करियर के शुरुआती दौर में ही हमें ‘ग़ुलामी’, ‘हथियार’ और ‘यतीम’ जैसी लाजवाब फ़िल्में देकर चमत्कृत कर देने वाले जे.पी.दत्ता, ‘बॉर्डर’ के बाद से ही युद्ध फ़िल्मों के जादुई चितेरे के रूप में अपनी उसी कामयाबी के उत्कर्ष को दोबारा हासिल करने के प्रयास में लगे हैं और इस जद में कहीं ज़्यादा पैसा ख़र्च कर के, कहीं बड़ी स्टारकास्ट लेकर नए प्रयोग कर रहे हैं, लेकिन अफ़सोस कि वह बात कहीं भी नहीं बन पा रही. ताज़ातरीन ‘पलटन’ भी उन्हीं युद्ध फ़िल्मों की कड़ी में एक नया नाम है.

1967 में सिक्किम के सामरिक दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण नाथूला दर्रे पर कब्ज़े को लेकर भारतीय सेना तथा चीनी सेना के मध्य चले लम्बे मनोवैज्ञानिक, मौखिक, और यहाँ तक कि सीधे शारीरिक संघर्ष के बाद अंततः सीधी सैन्य मुठभेड़ के क़िस्से को बयाँ करती यह फ़िल्म भारतीय सेना की वीरता की एक बेहद कम कही-सुनी गई दास्ताँ हम तक पहुँचाती है और काफ़ी अच्छी तरह से पहुँचाती है.

लेकिन इसके साथ मुख्य समस्या ढाई घंटे की अवधि तक समेटने के लिए तफ़सील और ब्यौरों की कमी होना है, जिसकी वजह से फ़िल्म के पूर्वार्द्ध में चीज़ों की पुनरावृत्ति काफ़ी ऊब पैदा करती है, जो एक युद्ध फ़िल्म के लिए शुभ संकेत तो हरगिज़ नहीं कहा जा सकता. हालाँकि मध्यान्तर के बाद फ़िल्म गति पकड़ती है और आप इसमें रमने लगते हैं, और अन्त तक आप इसका हिस्सा बन जाते हैं, जो साबित करता है कि जे.पी.दत्ता क़िस्सागोई के फ़न में आज भी वही महारत रखते हैं जिसके मुरीद दर्शक 80 के दशक से ही रहे हैं.

एक और चीज़ जो ‘पलटन’ को युद्ध की पृष्ठभूमि पर बनी दूसरी फ़िल्मों से अलग करती है वह यह है कि भारत के शत्रु देश के रूप में घिसे-पिटे पाकिस्तान के बजाय यह उस चीन को रखती है, जिसने “हिन्दी चीनी भाई भाई” का मीठा फ़रेब देते हुए हिंदुस्तान की पीठ में छुरा भोंकने का काम 1962 के युद्ध के बाद भी जारी रखा, वह भी ख़ुद को पूरी बेशर्मी से ‘माओ की पवित्र भूमि’ घोषित करते हुए. बेशक, आज के युवा दर्शकों के लिए यह उनके देश के इतिहास का एक ऐसा पन्ना पलटने जैसा है, जिस पर उँगली रखने की हिम्मत जाने क्यूँ अच्छे-अच्छे नहीं रख पाते.

फ़िल्म के कथानक से जुड़े तथ्यों की रिसर्च पर मेहनत की गई है, हालाँकि बारीक नज़र रखने वाली आँखें बताती हैं कि कई व्यावहारिक पहलुओं जैसे तत्कालीन हथियारों के यथार्थवादी चित्रण में लापरवाही भी बरती गई है. कलाकारों में भी लगभग सभी का काम अच्छा है, जिन में आश्चर्यजनक रूप से शत्रुघ्न सिन्हा के बेटे लव सिन्हा और शक्ति कपूर के बेटे सिद्धांत कपूर भी शामिल हैं. हाँ, ‘बॉर्डर’ वाले मेजर कुलदीप सिंह चाँदपुरी यानि सनी देओल की बुलन्द आवाज़ की कमी थिएटर में बैठे दर्शक शिद्दत से महसूस करते हैं.

कुल मिलाकर, ‘बॉर्डर’ का स्तर न छू पाने के बावजूद ‘पलटन’ एक बार देखी जा सकने लायक ठीकठाक मनोरंजक फ़िल्म है जो इतिहास की दरारों में छुपा कर रख दिए गए कुछ तथ्यों को प्रामाणिक और प्रभावशाली तरीक़े से सामने रखती है. हालाँकि फ़िल्म की अवधि कुछ और कम होती और फ़र्स्ट हाफ़ थोड़े और करीने से लिखा गया होता तो यह एक मज़बूत और याद रखने लायक फ़िल्म बन सकती थी. आख़िर, चेतन आनंद द्वारा 1962 के युद्ध पर बनाई गई लाजवाब ‘हक़ीक़त’ के बाद भारत-चीन संघर्ष पर हिन्दी में फ़िल्में बनी ही कितनी हैं!?