Batti Gul Meter Chalu

इसके ‘बल’ में बल कुछ ज़्यादा हुआ ठैरा तो क्या, पिक्चर तो भल ठैरी दाज्यू!

देश के पर्वतीय राज्य उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल की पृष्ठभूमि में रचा गया विषय तथा कथासूत्र होने के बावजूद  राज्य से ताल्लुक़ रखने वाले तथा मुंबई फ़िल्म इंडस्ट्री में कार्यरत ढेरों उम्दा अभिनेताओं-अभिनेत्रियों में से किसी एक को भी फ़िल्म में न लेने; और उसके परिवेश में प्रामाणिकता लाने के लिए इफ़रात में थोपे गए ‘बल’, ‘ठैरा’, ‘हुआ’ और ‘कह’ के हद से भी ज़्यादा ओवरडोज़ पर मन में उठते सवाल छोड़ दें, तो ‘बत्ती गुल मीटर चालू’ दोस्ती, प्रेम त्रिकोण, और नायकत्व की तरफ़ लौटे प्रतिनायक के साथ निजी कंपनियों द्वारा किए जा रहे विद्युत वितरण में व्याप्त धांधलियों से जुड़े सामाजिक सरोकारों का क़िस्सा कहती एक क़ायदे से बुनी हुई वाक़ई बेहतरीन, सार्थक और मनोरंजक फ़िल्म है.

फ़िल्म के लिए उत्तराखंड में किया गया रिसर्च वर्क गहरा न सही, कम से कम कामचलाऊ तो है, जो स्क्रीन पर पुकारे जाते नौटियाल, जुयाल, नेगी, पंत, उप्रेती जैसे उपनामों में झलकता है. लेकिन किरदारों के हावभाव, भाषा, तथा स्थानीय संदर्भों में प्रामाणिकता का काफ़ी अभाव है. इसी कारण देवभूमि के नाम से पहचाने जाने वाले इस ख़ूबसूरत पहाड़ी राज्य के ही निवासी बाशिंदों को यह उपनाम खटकते हुए गुदगुदा भर कर गुज़र जाते हैं. नैनीताल से ताल्लुक़ रखने वाली तथा एफ़टीआईआई, पुणे से प्रशिक्षित फ़िल्ममेकर बेला नेगी द्वारा इसी राज्य के कलाकारों को लेकर कुमाऊँ के एक गाँव की पृष्ठभूमि पर बनाई गई ‘दाएँ या बाएँ’ इस मामले में एक ऐसा मील का पत्थर है, जिसे छूने की कोशिश कम से कम उत्तराखंड पर बनने वाली हर फ़िल्म में की जानी चाहिए.

फ़िल्म में जगह-जगह हास्य और चुटीले व्यंग्य के पुट दिए गए हैं, लेकिन कथाप्रवाह के मूल में व्याप्त मुक़दमे की नैनीताल हाईकोर्ट में हो रही सुनवाई के दौरान प्रदर्शित सस्तापन व हँसी-मज़ाक़ न सिर्फ़ इसके कथानक के वज़न को कम करता है बल्कि न्यायालय की गरिमा को भी हल्का करता है. निर्देशक श्रीनारायण सिंह और विपुल रावल व सिद्धार्थ-गरिमा की लेखक त्रयी ने अगर सुभाष कपूर द्वारा लिखित-निर्देशित व अरशद वारसी अभिनीत ‘जॉली एलएलबी’ से इस बात की प्रेरणा ली होती कि संतुलित रह कर कोर्टरूम ड्रामा में हास्य-व्यंग्य कैसे पिरोया जा सकता है, तो चीज़ें शायद बेहतर होतीं. वैसे भी, अपने किसी निर्णय पर शिष्ट शब्दों में उठाए गए प्रतिरोध को भी ‘न्यायालय की अवमानना’ मान कर सख़्त ऐतराज़ जताने वाले माननीय न्यायालय को यह हरक़तें कभी क्यूँ नागवार नहीं गुज़रतीं, मालूम नहीं.

एक तेज़तर्रार लेकिन पैसे को ऊपर रखने वाले, चलता-पुर्ज़ा क़िस्म के खिलंदड़ युवा पहाड़ी वक़ील की भूमिका में शाहिद कपूर ने वाक़ई क़ाबिल-ए-तारीफ़ काम किया है. हालांकि उनका डायलेक्ट पश्चिमी उत्तर प्रदेश और कहीं-कहीं तो पूर्वी उत्तर प्रदेश के लहजे के बीच फँस कर बुरी तरह गड़बड़ाया हुआ है, लेकिन किरदार उन्होंने बेशक ईमानदारी से निभाया है. मेरे अपने ख़ुद के संपर्क में पहाड़ के ऐसे कई लड़के हैं, जो दिल के राजा और तेज़ी में ज़हर एक साथ हैं. आख़िर पर्यावरण संरक्षण से लेकर पृथक उत्तराखंड राज्य गठन तक, हज़ारों जनांदोलनों की उर्वर भूमि यह राज्य यूँ ही नहीं रहा. वहीं श्रद्धा कपूर भी, भाषाई लहजे को छोड़ कर एक ऊर्जावान पहाड़ी लड़की के रूप में जँची हैं. यूँ भी, इस वक़्त उनके सितारे बहुत सही चल रहे हैं और सब के ठीक-ठाक रहा तो ‘स्त्री’ के बाद यह उनकी दूसरी हिट फ़िल्म साबित होगी. ‘प्यार का पंचनामा’ से शुरुआत करने वाले दिब्येंदु शर्मा ‘टॉयलेट एक प्रेम कथा’ की ही तरह यहाँ भी अपनी अच्छी छाप छोड़ते हैं, और लीड कैरेक्टर्स निभा रहे कलाकारों के सामने कहीं भी फीके पड़ते नहीं दिखते.

फ़िल्म के संपादक ख़ुद इसके निर्देशक श्रीनारायण सिंह ही हैं, और निर्देशकों को अपनी फ़िल्म के हर फ़्रेम से चूँकि काफ़ी ज़्यादा मुहब्बत होती है इसलिए उनके द्वारा स्व-संपादित फ़िल्में लम्बी हो ही जाती हैं. ‘बत्ती गुल मीटर चालू’ की अवधि भी काफ़ी ज़्यादा है – 3 घंटे से कुछ ही कम , 173 मिनट; और इसी वजह से यह कई जगह, ख़ास कर सेकेंड हाफ़ में, ढीली पड़ कर बिखरने लगती है; लेकिन निर्देशक-संपादक जल्दी ही दिब्येंदु शर्मा के एक उम्दा संवाद के साथ फ़िल्म को दोबारा पटरी पर ले आते हैं जिसके लिए उनकी तारीफ़ की जानी चाहिए.

लेकिन फ़िल्म का सबसे बेहतरीन और मानीख़ेज़ हिस्सा श्रीनारायण सिंह इसके अंतिम दृश्य के लिए बचा कर रखते हैं – बिल्कुल दावत के अंत में परोसे जाने वाले सर्वाधिक स्वादिष्ट व्यंजन की तरह. शाहिद कपूर द्वारा फ़ाइनल कोर्ट स्पीच बतौर दमदार तरीक़े से बोले गए एक मोनोलॉग के ज़रिए ही सही, श्रीनारायण सिंह वह कर दिखाते हैं जो अभी तक हिन्दी सिनेमा के परदे पर कभी नहीं किया गया, किसी के द्वारा भी. देश भर के महानगरों के कंक्रीट के पहाड़ों जैसे विशालकाय शॉपिंग मॉल्स को अपनी नदियों से पैदा होती बिजली से रौशन करते उत्तराखंड के असली पहाड़ों में दूरदराज़ बसे गाँव ख़ुद पलायन, जल-अभाव और बेरोज़गारी के कितने भयावह अँधेरों में साल भर डूबे हुए रहते हैं, इसका सारा दर्द शाहिद उस एक ही मोनोलॉग में बयाँ कर देते हैं, जो कम से कम इस राज्य के क़स्बों और शहरों में स्थित थिएटरों में बैठे दर्शकों से तो तालियों की गड़गड़ाहट जीत ही लेता है.

और सबसे बढ़ कर, फ़िल्म ‘विकास’ और ‘कल्याण’ को लेकर पिछले चार सालों से बजाई जा रही गालों पर एक बेहद ज़बर्दस्त तमाचा रसीद करती है – न सिर्फ़ शब्दों के बल्कि एक ग़ज़ब के कलात्मक दृश्य बिंब के ज़रिए भी – जो आपको फ़िल्म में देखने को मिलेगा. पिछले साल ‘टॉयलेट एक प्रेम कथा’ बनाने पर बहुत से लोगों ने श्रीनारायण सिंह को मौजूदा केन्द्र सरकार का चमचा बताया था. यक़ीन जानिए, यह तमाचा उन लोगों के मुँह पर भी उतना ही कर्रा पड़ेगा, जितना इस चुनावी साल में ‘विकास’ और ‘कल्याण’ के ढोल सोशियल मीडिया से लेकर गली-कूचों तक पीट रहे राजनैतिक दलों के गुर्गों के मुँह पर.

कुल मिलाकर, सामाजिक मुद्दों और मनोरंजन को पिरोते हुए अच्छी फ़िल्में बनाने की प्रथा के नए वाहक बन कर उभरे श्रीनारायण सिंह का भी दिल खोल कर स्वागत किया जाना चाहिए, और उनकी रची इस फ़िल्म का भी. इसके ‘बल’ में बल कुछ ज़्यादा हुआ ठैरा तो क्या, पिक्चर तो भल ठैरी दाज्यू! मेरी तरफ़ से साढ़े तीन स्टार.