Memory

एनीमेशन के संसार में मानवीय संवेदनाएं

प्रमोद सिंह की लेखनी का मैं हमेशा से कायल रहा हूं. वे वरिष्ठ हैं और हिन्दी के कुछ गिने-चुने फिल्म समीक्षकों में से हैं जो ईमानदारी के साथ अपनी प्रतिक्रिया देने में यकीन रखते हैं. हाल में फिल्म रैटाटुई पर उनकी दिलचस्प टिप्पणी पढ़ने को मिली. दरअसल हॉलीवुड में एनीमेशन फिल्मों एक बेहतर और परिष्कृत परंपरा रही है. मैं यहां पर सिर्फ आइस एज के पहले और दूसरे भाग का जिक्र बतौर उदाहरण करना चाहूंगा, जो ह्यूमर के जरिए एक गहरा मानवीय संदेश देते हैं.

फिल्म आइस एज के पहले भाग में एक मनुष्य का बच्चा अपने मां-बाप को खो चुका है और उसकी परवरिश एक मैमथ और हिम युग का एक बाघ मिलकर करते हैं. फिल्म के एक दृश्य में बच्चे की शरारतों से परेशान मैमथ बच्चे के पीछे भागता हुआ एक गुफा में पहुंच जाता है. वहां दीवारों पर मनुष्यों के बनाए चित्र मौजूद हैं. मैमथ उन लकीरों को देखता है और पुरानी यादों में खो जाता है.

खूबसूरत सिनेमाई तकनीकी से दीवारों का रेखांकन सजीव हो जाता है और हम देखते हैं कि मनुष्यों के झुंट एक एक मैमथ के परिवार को घेर लिया है. वे भालों से छोटे मैमथ को मौत के घाट उतार देते हैं. बच्चे की खिलखिलाहट से मैमथ की अतीत तंद्रा टूटती है. हम यह समझ जाते हैं कि उसके परिवार को इंसानों ने मौत के घाट उतार दिया है. उसके बाद बच्चे की शरारतों को मैमथ का एकटक देखना और फिर उसे हिफाजत से लेकर अपने रास्ते चल पड़ना लगे रहो मुन्नाभाई जैसी पूरी एक फिल्म से ज्यादा गहरा संदेश दे जाता है.

आइस एज का दूसरा भाग तो मानों प्राणी और प्रकृति के बीच गहरे रिश्ते की पड़ताल है. यह भाग अपने संदेश और प्रस्तुतिकरण में पहले भाग के मुकाबले ज्यादा भव्य और उदात्त है. हिम युग समाप्त हो रहा है. बर्फ पिघल रही है. मैमथ जैसी प्रजातियां खत्म हो रही हैं. पूरी फिल्म में हम देखते हैं कि किस तरह से हजारों लाखों की संख्या में जीव पलायन कर रहे हैं. मगर फिल्म का संदेश यह है कि जीवन कभी खत्म नहीं होता. यह अनवरत यात्रा चलती ही रहती है….

Show More

Related Articles

2 Comments

Leave a Reply

Back to top button
Close