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हँसाने के साथ नश्तर सा चुभो जाती है ‘आंखों देखी’

फिल्‍म के एक सीन से ही शुरू करते हैं। बाबू जी (संजय मिश्रा) अपनी बेटी की शादी का कॉर्ड छपवाने के लिए जाते हैं। बाबू जी कुछ दिनों पहले ही यह फैसला ले चुके होते हैं कि वे उसी बात पर विश्‍वास करेंगे जो उन्होंने देखा है या भोगा है।

तो जब शादी का कार्ड उनके हाथ में आता है तो वह उसे अपने भोगे हुए अनुभव और सादगी से संपादित करना शुरु करते हैं। वे पहले कार्ड में किनारी हटवाते हैं। फिर ‌दर्शनाभिलाषी और विनीत जैसे नाम और फिर गणेश जी तस्वीर। उन्हें कार्ड का बैकग्राउंड भी अखरता है तो वह उसे सफेद कर देते हैं। सफेद बैकग्राउंड में छपे इस कार्ड में बस इतनी इबारत रह जाती है

“रीता की शादी अजय से फलां तारीख को फलां स्‍थान पर हो रही है।” सफेद कार्ड… न इसके आगे कुछ और न इसके पीछे कुछ। जब यही कार्ड रीता देखती हैं तो बाबू से पूछ बैठती हैं कि पैसे नहीं थे तो न छपवाते। इससे अच्छा और सजावटी तो कोर्ट का नोटिस होता है। जब रीता चली जाती हैं तो बाबू जी कहती हैं बिल्कुल शेर की तरह दहाड़ कर चली गई।

इस पर बाबू जी के अनुयायी पूछते हैं कि आपने शेर को दहाड़ते देखा है? बाबू जी को लगा कि यह बात तो सत्य है। कि उन्होंने शेर को दहाड़ते तो कभी देखा नहीं तो यह कैसे मान लें कि शेर दहाड़ता है। और बाबू जी अपनी पल्टन के साथ शहर से दूर चिड़ियाघर जाने के‌ लिए निकल पड़ते हैं कि शेर दहाड़ता है या नहीं।

जरा कल्पना की‌जिए कि जिस घर में बेटी की शादी हो उसके एक दिन पहले सारे काम छोड़कर बाबू जी अपने सारे अनुयायियों के साथ शेर को दहाड़ते हुए देखने के लिए निकल जाते हैं।

आंखों देखी फिल्म के यही छोटे-छोटे किस्से इसको हिंदी सिनेमा के 100 सालों में बनी फिल्‍म से अलग करते हैं। किसी भी प्रचलित शैली को मॉडीफाई करके उसे और बेहतर बनाना या हिट फॉर्मूलों को अपने ढंग से रिपीट कर देना हिंदी सिनेमा की पहचान रही है।

आंखों देखी इसी पहचान तो तोड़ने वाली फिल्‍म लगती है। फिल्म के कई सारे दृश्य ऐसे हैं जो पहली बाद दर्शकों को देखने को मिलेंगे। वह दृश्य कोई नए नहीं हैं उनको फिल्माने का तरीका नया है। भाई-भाई से अलग होने की कहानी हिंदी सिनेमा ने दर्जनों बार बड़े बड़े कलाकारों को लेकर दिखाई है ‌लेकिन जिस तरह का अलगाव आंखों देखी खींचती है वह अद्भुत है।

फिल्म की कहानी पुरानी दिल्‍ली के लगभग गंवई स्टाईल के बने घर में रह रहे दो परिवारों के बीच की है। बाबू जी के चार जन के परिवार के साथ उनके छोटे भाई रिषी (रजत कपूर) का परिवार उसी घर में रहता है। सब एक-दूसरे से इतने हिले-मिले हैं कि लगता ही नहीं कि कौन किसका पिता है और कौन किसका चाचा। तभी बाबू जी यह फैसला कर लेते हैं कि वह वही बात मानेंगे जो उन्होंने देखा या भोगा है। वह एक टूर एंड ट्रेवेल कंपनी में काम करते हैं।

चूंकि उन्होंने कभी न्यूयॉर्क या लंदन देखा नहीं होता है इसलिए वह अपने क्लाइंट को फ्लाइट कब कहां पहुंचेगी यह बताने से मना कर देते हैं। चूंकि ऐसा संभव तो था नहीं इसलिए बाबू जी नौकरी छोड़ देते हैं। फिल्म की असल कहानी और व्यंग्य यही से शुरू होते हैं। छोटा भाई घर के बढ़ते खर्च से किनारा करके अलग रहने लगता है। बाबूजी अकेले रह जाते हैं और कुछ अनोखे काम करते रहते हैं।

फिल्म कहानी तो दरअसल इतनी ही है। लेकिन इस कहानी के इर्द-गिर्द जो उप‌किस्से ‌बुने गए हैं वह अद्भुत हैं।

बाबू जी शहर के व्यस्त चौराहे पर एक तख्ती लेकर दिनभर खड़े रहते हैं। तख्ती पर लिखा होता है “आंखें खोलकर देखो सब कुछ यहीं हैं।” रजत कपूर ने फिल्‍म में व्यंग्य कुछ उसी तरह पिरोया है जैसे रानी नागफनी की कहानी में परसाई से पिरोते हैं। इन व्यंग्यों के बीच में ही मध्यमवर्गीय रिश्तों की टीस, उनके बीच की स्वाभाविक उठापटक और उनके बीच का प्यार रेल में सफर करते वक्त मिल और छूट रहे स्टेशनों जैसे लगता है। सबकुछ बिल्कुल स्वाभाविक और अपना सा।

यह फिल्म देखते-देखते हरिशंकर परसाई की एक व्यंग्य रचना ‘रानी नागफनी की कहानी’ बार-बार याद आती है। छोटे दृश्यों में व्यंग्य पिरोया गया है जो हंसाते-हंसाते नश्तर सा चुभा देता है। ये व्यंग्य उस मध्यमवर्गीय आंकाक्षाओं और जरूरत से उपजे होते हैं जिन्हें हम उपेक्षित भी नहीं कर सकते हैं। आंखों देखी रिश्तों के इन स्वार्थ की आलोचना तो नहीं करती है बस यह बताती है कि ऐसी स्थितियों में ऐसा-ऐसा हो सकता है।

फिल्‍म का एक और मजबूत पक्ष अभिनय है। संजय मिश्रा, रजत कपूर तो अपने पात्रों में सहज और स्वाभाविक हैं ही बाकी के छोटे पात्र अपने जरूरत भर का अभिनय कर देते हैं। हर पात्र का अंडरप्‍ले होना ही उन‌ किरदारों को बड़ा करता है। रजत कपूर की यह फिल्‍म फिल्मकारों के बीच उनकी इस धारणा को भी तोड़ेगी कि वे विश्‍व भर में रचे जा रहे है बौद्धिक सिनेमा का बॉलीवुडीयकरण करते हैं। इस मौलिक ‌फिल्म के लिए रजत कपूर की टीम को ढेरों बधाईयां।

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