Film Review

आर्टिकल 15 : जाति पर मुखर होता सिनेमा

अवनीश पाठक

माओत्से तुंग कहते थे- एक चिंगारी ऊंची घास के विशाल मैदानों को जला सकती है.

जाति ऊंची घास के विशाल मैदानों जैसी नहीं है. ये जलेबी जैसी है या उससे भी जटिल, दुरूह. प्रतिरोध की चिंगारियां जाति की दुरुहता में या तो उलझकर ख़त्म हो जाती हैं, या जलेबी जैसी जटिलताओं का रसास्वादन करने लगती हैं. ब्राह्मण होने के नाते जाति पर बात करना बर्र के छत्ते में हाथ डालने जैसा है. फ़िल्म ने एक ब्राह्मण के जरिए जाति के सुअरताल में पैर रखा है, इस स्वीकृति के साथ कि कभी न कभी तो ब्राह्मण को भी इसमें उतरना ही पड़ेगा.

फ़िल्म विदेश से पढ़कर, उच्च मध्य वर्ग की तरबियत, मानवीयता, संवैधानिक उसूलों के आईने में अपने इर्दगिर्द के हालात और खुद को लगातार समझने के कोशिश कर रहे आईपीएस ऑफिसर अयान रंजन के जरिए जाति की दुरुहता और उन दुरुहताओं में जी रहे मनुष्य की पीड़ा को समझने की यात्रा है. यूरोप से आयातित लोकतांत्रिक मूल्यों पर यकीन लेकर लौटे एक आउटसाइडर की, लालगांव थाने और सुअरताल के पार के जंगलों तक फैली ‘औकात में रखने’ की उस प्रवृत्ति से टकराव की यात्रा है, जिसे ‘ये लोग ऐसे ही हैं’ कहकर बार-बार यकीन दिलाकर, उसके पुराने यकीन को रिप्लेस करने के कोशिश की जाती है.

अयान की जाति ब्राह्मण है, मगर किसी प्रक्रिया के तहत वो या तो खुद को डि-कास्ट कर चुका है, जिसका जिक्र फ़िल्म में नहीं है; या वो जिस इलाके और समाज मे पला-बढ़ा है, वहां जाति का डंका वैसा नहीं है, जैसा कि हिंदुस्तान के जर्रे-जर्रे में है. जाति के सवाल पर अयान की ये अनभिज्ञता ही उसे, एक ऐसा नायक बना देती है, जो मात्र कल्पनाओं में है. आर्टिकल 15 में हर वो मुद्दे और हर वो दृष्य हैं, जिन्होंने पिछलों 5 सालों में हमें झकझोर कर रख दिया. बदायूं, उना, बुंदेलखंड, भीम आर्मी, दलित के घर भोजन करता भगवाधारी, ये सब सच्ची घटनाएं हैं और फ़िल्म में रेफेरेंस के रूप में मौजूद हैं. मगर अयान रंजन वास्तविक जिंदगी के किसी भी रेफरेन्स में नहीं मिलेगा.

फ़िल्म में अयान और अदिति के बीच एक व्हाट्सएप चैट है-
तुम्हें एक हीरो चाहिए अदिति.
हीरो नहीं चाहिए अयान.. बस ऐसे लोग चाहिए जो हीरो का वेट ना करें.

हमारी जिंदगी में उना है मगर अयान नहीं. हीरो का वेट न करने वाले हीरो हमारी ख़ाहिश है, हक़ीक़त नहीं. जिस आईपीएस ऑफिसर ने हीरो का वेट किए बगैर हीरो बनने की कोशिश की थी वो सलाखों के पीछे उम्र कैद की सजा काट रहा है.

दरअसल अयान वो मसीहा है, जिसका इंतजार पुराणों के दौर से है.

बेहतर होता ये फ़िल्म निषाद की तरह ही अयान की जिंदगी की निरर्थकता के साथ खत्म होती, वो एब्सर्डिटी ज्यादा यक़ीनदेह होती.

आर्टिकल 15 जब जाति के दलदल में उतरती है तो असामान्य को बिल्कुल उसी सामान्य तरीके से सामने रखती है, जैसे हमें देखने-सुनने की आदत है. हममें से ज़्यादातर सीबीआई का वो अफसर हैं, जिन्हें 3 रुपए के लिए 3 लड़कियों का बलात्कार तब समझ में आता है, जब ये बताया जाता है कि वो तीन रुपये बिसलेरी उन तीन-चार बूंदों के बराबर हैं, जिसे हम रोजाना अपने विशेषाधिकार की तरह पी जाते हैं, या वो ब्रह्मदत्त हैं, जो ये मानते हैं कि जो बरसों से चला आ रहा है, वही सामान्य, या फिर निहाल सिंह हैं, जिनके पास ग्लानिबोध है मगर ग़लत के खिलाफ खड़े होने का साहस नहीं. अलग अलग पृष्ठभूमि के लोगों के लिए दो दलित लड़कियों को रेप सामान्य है, यही जाति निर्मित कॉमन सेंस है. जो इस कॉमन सेंस के ख़िलाफ़ है, केओस है. अनुभव सिन्हा ने इस कॉमन सेंस को बिना सनसनीखेज बनाए बहुत ही साधारण तरीके से पर्दे पर दिखाया है, जो सराहनीय है.

चमार और पासी दोनों सीडयूल्ड कास्ट हैं, मगर चमार पासी से बड़ा है. बाबा साहब ने इसे ग्रेडेड इनइक्वेलिटी कहा था. जाति की उत्तरजीविता का यही अमृतघट, जिसे महात्मा गांधी ने हिंदुस्तानी सामाजिक पदानुक्रम की अद्वितीयता बताया था, जिसे सिरोधार्य कर हिंदुस्तानी लोकतंत्र फासीवाद के साथ आंख मिचौली कर रहा है, उस अमृतघट पर हिंदी सिनेमा ने पहली बार, जनरल नॉलेज की शैली में ही सही, कम से कम बात तो की है.

फ़िल्म का वो दृश्य जिसमें पुलिस ऑफिसर अपनी-अपनी जातियों का परिचय दे रहे हैं, अपने कथ्य के कारण हिंदी सिनेमा के कालजयी दृश्यों में रखा जा सकता है. जाति पर इतने मुखर तरीके से पर्दे पर कभी बात नहीं हुई. फ़िल्म के लेखक-द्वय अनुभव सिन्हा और गौरव सोलंकी ने जाति पर मौजूद लगभग सभी विमर्शों को कहानी में समेट लिया है. कहानी की ये खूबी फ़िल्म को इस दौर की राजनीति को समझने का जरूरी दस्तावेज़ बना देती है.

आर्टिकल 15 जब ये यकीन दिलाती है कि किसी अयान रंजन, किसी डॉक्टर मालती, किसी गौरा और किसी शास्त्री के जरिए ये लोकतंत्र न्याय की गारंटी देता रहेगा, उसी समय ये भी दिखाती है कि दलितों को हिन्दू एकता की घुट्टी पिलाकर कोई महंत ये कहता रहेगा- हिंदुओ असली दुश्मन को पहचानों.

आशा और द्वेष का ये कॉकटेल ही आज के दौर की राजनीति जीव-द्रव्य है. आर्टिकल 15 अगले कई सालों तक याद रखी जाएगी तो केवल इसलिए कि इसने इस कॉकटेल को ईमानदारी से पर्दे पर रखा.

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