Author: IB Team

इंडियन बाइस्कोप भारतीय सिनेमा के अनुछए पहलुओं पर बात करता है। चाहे तो बीते दौर की लीक से हटकर बनी यादगार फिल्में हों या फिर आज के दौर का इंडिपेंडेंट सिनेमा।
  • ग्राफिक नॉवेलः नए ज़माने की नई किताबें

    नोएडा में गेमिंग स्टूडियो चलाने वाले फैजल ने खुद को टेंशन फ्री रखने के लिए एक कैरेक्टर रचा गुड्डू- जो उनके अपने बचपन की तस्वीर थी। फैजल कार्टून बनाते और फेसबुक पर दोस्तों के बीच शेयर करते। यह इतना लोकप्रिय हुआ कि फैजल ने इसका एक फेसबुक पेज बनाया ‘गारबेज बिन’। पहले महीने दो लाइक्स हुए। इसके बाद जो हुआ… Continue reading "ग्राफिक नॉवेलः नए ज़माने की नई किताबें"

  • कहानी ‘लाजवंती’ की

    विजयदान देथा की कहानियां हमेशा से फिल्म निर्देशकों के लिए आकर्षण का केंद्र रही हैं। चाहे मणि कौल की ‘दुविधा’ हो, प्रकाश झा की ‘परिणति’, अमोल पालेकर की ‘पहेली’ हो या फिर उदय प्रकाश द्वारा उनकी कहानियों पर बनाई गई छोटी-छोटी फिल्में। सभी ने उनके जादुई संसार को सिनेमा के पर्दे पर अपने-अपने तरीके से उतारने की कोशिश की है।… Continue reading "कहानी ‘लाजवंती’ की"

  • तो कैसा लड़का है तू?

    कुछ फिल्में आप देखते हैं और भूल जाते हैं। कुछ याद रह जाती हैं। और कुछ फिल्में आपका गिरेबान पकड़कर झूल जाती हैं। आप स्तब्ध हो जाते हैं और लंबे समय तक उन्हें अपनी स्मृति से निकाल नहीं पाते। अजय बहल की फिल्म ‘बीए पास’ कुछ इसी तरह की फिल्म है। किशोर मन और बच्चों पर कितना कुछ लिखा गया… Continue reading "तो कैसा लड़का है तू?"

  • एक नायक के साथ 75 साल

    यह महज एक संयोग रहा होगा कि जिस महीने सुपरमैन को 75 साल पूरे हुए उसी दौरान एक अमेरिकी बिल्डिंग कान्ट्रैक्टर डेविड को मिनेसोटा में एक घर की दीवार के पीछे बरसों से अंधेरे में दबी सुपरमैन पहली कामिक हाथ लग गई। जून 1938 में छपी ने इस सुपरमैन की इस पहली कॉमिक बुक की पिछले दिनों नीलामी हुई तो… Continue reading "एक नायक के साथ 75 साल"

  • अपने पर भरोसा है तो ये दांव लगा ले…

    विक्रमादित्य मोटवानी इसलिए जिक्र करने लायक निर्देशक हैं क्योंकि उनकी फिल्मों में हड़बड़ी नहीं है। न तो जल्दी-जल्दी कहानी कहने की, न खुद को इंटैलेक्चुअल बताने की और न ही बेवजह एक भव्य फिल्म बनाने की। उनका कैमरा उतना ही और उन्हीं चीजों को दिखाता है, जिसकी कहानी कहने में जरूरत है और तब हमें अहसास होता है कि दरअसल… Continue reading "अपने पर भरोसा है तो ये दांव लगा ले…"

  • बदलती दुनिया में महानायक

    I’m not questioning your powers of observation; I’m merely remarking upon the paradox of asking a masked man who he is. फिल्म ‘वी फॉर वेंडेटा’ से जेम्स बांड की फिल्म ‘स्काईफाल’ में एक दिलचस्प दृश्य है। बांड पहली बार अपने नए क्वार्टरमास्टर यानी क्यू से मिलता है। रिसर्च और डेवलपमेंट डिवीजन का पिछला हेड बुजुर्ग होकर रिटायर हो चुका है।… Continue reading "बदलती दुनिया में महानायक"

  • दुनिया जो भीतर गुम है कहीं

    तेरे बिना ज़िंदगी से कोई, शिकवा, तो नहीं, तेरे बिना ज़िंदगी भी लेकिन, ज़िंदगी, तो नहीं गुलज़ार (फिल्म ‘आंधी’ से) सत्तर के दशक की कुछ फिल्में एक अलग और सुहानी सी दुनिया रचती हैं। ये सत्तर के दशक का मध्यम वर्ग था। अपनी लाचारियों, परेशानियों और उम्मीदों में डूबता-उतराता। कभी हम ‘गोलमाल’ जैसी फिल्मों में उस पर हंसते थे तो… Continue reading "दुनिया जो भीतर गुम है कहीं"

  • हमने इतिहास को देखा है…

    जो अपने लिए सोचीं थी कभी वो सारी दुआएं देता हूँ…  साहिर (फिल्म ‘कभी-कभी ‘से) इस बार अनजाने में ही हाथ लग गए एक नौजवान के कुछ नोट्स शेयर कर रहा हूं. नाम और लोकेशन का पता नहीं, गौर से पढ़कर देखें शायद वह आपके पड़ोस में ही कहीं हो... कई बार यह ख्याल आता है कि दुनिया को हिला… Continue reading "हमने इतिहास को देखा है…"

  • सोशल मीडिया पर ‘अनायकों’ की महागाथाएं

    काफ्का की कहानी ‘मेटामार्फोसिस’ का बेहद मामूली जिंदगी जीने वाला नायक एक सुबह जागता है और खुद को तिलचट्टे में बदला हुआ पाता है। मगर 2011 की एक सुबह इलाहाबाद के गोविंद तिवारी की नींद खुलती है तो पता चलता है कि वे रातों-रात एक ऑनलाइन सेलेब्रिटी में बदल चुके हैं। उनका नाम विश्वव्यापी ट्विटर ट्रेंड में शामिल हो चुका… Continue reading "सोशल मीडिया पर ‘अनायकों’ की महागाथाएं"

  • हमें ये सीक्वेल चाहिए!

    देखते-देखते हिन्दी फिल्मों के सीक्वेल बनने लगे. सबसे पहले सीक्वेल के बारे में पता लगा स्टारवार्स सिरीज से. किशोरावस्था का ज्यादा हिस्सा सीक्वेल देखते ही गुजरा. एंपायर स्ट्राइक्स बैक पहले देखी फिर रिटर्न आफ जेडाइ- मगर स्टारवार्स आज तक न देख सका. कुछ और सीक्वेल देखे- कई बार खराब, जैसे- डाइहार्ड का दूसरा भाग और कई बार इतने शानदार कि… Continue reading "हमें ये सीक्वेल चाहिए!"