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साइंस फिक्शन के ‘अवतार’


यह महज संयोग नहीं है कि जेम्स कैमरॉन हॉलीवुड की जिस सबसे महत्वाकांक्षी साइंस फिक्शन को लेकर आए हैं, उसका शीर्षक अवतार हिन्दू माइथोलॉजी में गहरे अर्थ रखता है। अंग्रेजी में स्वीकार्य यह शब्द इन दिनों इंटरनेट की दुनिया में भी खूब पॉपुलर है, जहां यह साइबर स्पेस में खुद की एक और छवि अंकित किए जाने को भी रिफ्लेक्ट करता है।थोड़ा सा स्मृतियों को कुरेदें तो पश्चिमी साइंस फिक्शन में भारतीय संदर्भ कोई नई बात नहीं है। इसकी शुरुआत हम स्टीवेन स्पिलबर्ग की फिल्म क्लोज एनकाउंटर्स आफ द थर्ड काइंड में देख सकते हैं। सत्तर के दशक के आई यह फिल्म उस वक्त के एक अरबन मिथ यूएफओ या उड़न तश्तरियों पर आधारित थी। इस फिल्म के बारे में उन दिनों प्रकाशित होने वाली साप्ताहिक हिन्दुस्तान जैसी पत्रिकाओं में खूब छपा करता था। उस वक्त हॉलीवुड की किसी फिल्म के इलाहाबाद जैसे शहर में रिलीज होने में कम-से-कम चार-पांच साल लग जाया करते थे। मैं उस वक्त आठ-नौ बरस का था, जब पैलेस थिएटर में रिलीज इस फिल्म को देखने पहुंचा। तब तक इसके बारे में काफी कुछ पढ़-सुन चुका था, लिहाजा इतनी उत्सुकता थी कि जैसे सचमुच की कोई उड़नतश्तरी मेरी आंखों के आगे आने वाली हो।

यह उस दौर की एक खूबसूरत और भव्य फिल्म थी। दर्शकों के मनोविज्ञान से खेलने के हिचकॉकियन तरीके को कॉमर्शियल सिनेमा में स्टीवेन स्पिलबर्ग ने ही सबसे बेहतर ढंग से साधा है। इस फिल्म में भारत की शूटिंग थी। कुछ हिन्दी के डॉयलॉग भी थे। हां, उसका डायलॉग मुझे आज भी याद है कि क्योंकि यही वह संवाद था जो उस उम्र में मैं समझ सकता था, संवाद कुछ इस तरह से था, भाइयों यह आवाज कहां से आ रही है? मुझे अब याद नहीं रह गया मगर सुदूर ग्रह के वासियों का भारतीय मिथकों से कोई संबंध जोड़ा गया था।

अगर गौर करें तो ल्यूक बेसोन (ईश्वर करे यह उच्चारण दुरस्त हो) की 1997 में आई फिफ्थ एलिमेंट में भी भविष्य को तबाही से बचाने के लिए एक पांचवें तत्व की परिकल्पना की गई थी, पांचवा तत्व विशुद्ध भारतीय अवधारणा है। वायु, अग्नि, जल और भूमि के अलावा आकाश या स्पेस वह पांचवा तत्व है। दिलचस्प यह है कि आइंस्टीन की जटिल गुत्थियों में भी इस पांचवें तत्व स्पेस की बड़ी अहमियत है। भारतीय दर्शन की सामान्य समझ के बिना वाचोवस्की ब्रदर्स की मैट्रिक्स सिरीज के संदर्भ समझना भी बहुत मुश्किल है। खास तौर पर तीसरे हिस्से मैट्रिक्स रिवोल्यूशंस में जहां एक भारतीय दंपति और उसकी बेटी सती का जिक्र है। सती की भूमिका में तनवीर नाम की एक लड़की थी। इतना ही नहीं पहले भाग में वास्तविकता और अवास्तविकता पर नियो और मार्फियस की लंबी बहस की जड़ें भारतीय अद्वैत दर्शन से जुड़ती हैं।

इसके कोई स्पष्ट संदर्भ नहीं हैं मगर जहां तक मेरी स्मृति साथ देती है कि अस्सी के दशक में लोकप्रिय साइंस फिक्शन लेखक इसाक एसिमोव का एक ग्रह की खोज के इर्द-गिर्द घूमने वाले उपन्यास में ग्रह का नाम भारत के लोकप्रिय पौराणिक नायक राम के नाम पर रखा गया था। वैसे कहते तो यह भी हैं कि जार्ज लुकाच की लोकप्रिय स्टार वार्स सिरीज की प्रेरणा के मूल में भारतीय पौराणिक कथाएं ही हैं। घोषित तौर पर स्टार वार्स एशियाई निर्देशक अकीरा कुरोसावा की एक फिल्म से तो प्रभावित है ही।

दरअसल भारतीय पुरा कथाओं का स्वरूप साइंस फिक्शन की फैंटेसी से काफी कुछ मेल खाता है। कुछ समय पहले फिल्म निर्देशक शेखर कपूर और माडर्न आध्यात्मिक गुरु दीपक चोपड़ा ने रामायण तथा कुछ पौराणिक भारतीय मिथकों से प्रेरित होकर वर्जिन ग्रुप के साथ कॉमिक रची थी। हालांकि वह प्रयोग सफल नहीं हो सका, मगर यह कल्पना को पंख लगाने की भारतीय पुराणों अदम्य शक्ति का एहसास दिलाता है। चित्रकथाओं की बात करें तो अपने उत्तरार्ध में भविष्य का फ्लैश गार्डन एक आध्यात्मिक अवतार के रूप में आता है, इसकी जड़ों भारतीय तथा एशियाई बौद्ध दर्शन था। मैट्रिक्स कई बार इसी का परिमार्जित रूप लगती है। कुछ समय पहले ईवान मैक्डोनाल्ड ने तो प्राचीन भारतीय नगरी काशी की पृष्ठभूमि पर एक फ्युचर फैंटेसी रच डाली। उपन्यास था, रीवर ऑफ गॉड्स, जिसमें कई पात्रों के नाम भी पुराणों से लिए गए हैं।

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8 Comments

  1. अरे वाह आप तो मेरे जैसा सोचते हैं (या मैं आपके जैसा ……)
    मेरा रिव्यू भी फुरसत मिल जाये तो पढियेगा !
    मैं मिथकों और साई फी के अन्तर्स्म्बन्धों पर अध्ययनरत हूँ !
    http://indiascifiarvind.blogspot.com/

  2. बढ़िया समीक्षा की है.

    यह अत्यंत हर्ष का विषय है कि आप हिंदी में सार्थक लेखन कर रहे हैं।

    हिन्दी के प्रसार एवं प्रचार में आपका योगदान सराहनीय है.

    मेरी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं.

    नववर्ष में संकल्प लें कि आप नए लोगों को जोड़ेंगे एवं पुरानों को प्रोत्साहित करेंगे – यही हिंदी की सच्ची सेवा है।

    निवेदन है कि नए लोगों को जोड़ें एवं पुरानों को प्रोत्साहित करें – यही हिंदी की सच्ची सेवा है।

    वर्ष २०१० मे हर माह एक नया हिंदी चिट्ठा किसी नए व्यक्ति से भी शुरू करवाएँ और हिंदी चिट्ठों की संख्या बढ़ाने और विविधता प्रदान करने में योगदान करें।

    आपका साधुवाद!!

    नववर्ष की अनेक शुभकामनाएँ!

    समीर लाल
    उड़न तश्तरी

  3. दूसरे ग्रह के प्राणी के धरती पर आने के विचार पर फिल्म बनाने की बात सबसे पहले किसी हालीवुड वाले ने नहीं, एक भारतीय ने सोची थी। कल्ट बन चुकी स्पीलबर्ग की ईटी की मूल कथा दरअसल सत्यजीत रे की है। जाहिर है इस फिल्म के लिए उन्हें काफी धन की जरूरत होती। रे ने कुछ अमेरिकी स्टूड़ियो से पत्र व्यवहार किया। अमेरिका भी गए, तमाम स्टूडियो और फिल्म निर्माताओं को अपनी कहानी दिखाई। वे महीनों अमेरिका में रहे। आखिरकार बात नहीं बनी और वे निराश भारत लौट आए। इसके कुछ सालों बाद ईटी रिलीज हुई। इस फिल्म को देखकर रे को गहरा धक्का लगा। यह बिल्कुल उनकी कहानी थी। महान स्पीलबर्ग या ईटी के पीछे जितने भी क्रिएटिव लोग हैं, उनमें से किसी ने पूरी बेशर्मी दिखाई और सत्यजीत रे की मूल कहानी में रत्ती भर भी बदलाव की जरूरत नहीं समझी। यह तो सरासर डकैती थी।
    यह अलग बात है कि आगे चलकर बा‍लीवुड के निर्माता, निर्देशकों और लेखकों ने अपने सबसे बड़े फिल्मकार के साथ हुए विश्वासघात का हालीवुड वालों से चुन चुनकर बदला लिया। हालांकि उन्हें इस बात का गुमान तक न होगा।

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