Film Review

तो कैसा लड़का है तू?

कुछ फिल्में आप देखते हैं और भूल जाते हैं। कुछ याद रह जाती हैं। और कुछ फिल्में आपका गिरेबान पकड़कर झूल जाती हैं। आप स्तब्ध हो जाते हैं और लंबे समय तक उन्हें अपनी स्मृति से निकाल नहीं पाते। अजय बहल की फिल्म ‘बीए पास’ कुछ इसी तरह की फिल्म है।

किशोर मन और बच्चों पर कितना कुछ लिखा गया और कितनी फिल्में बनीं हैं, मगर ‘बीए पास’ इस वय के एक चरित्र की कहानी कहने के बहाने आप का हाथ थामकर उन अंधेरी गलियों की तरफ ले जाती हैं, जिनके बारे में आप हमेशा से जानते हैं मगर उधर कदम बढ़ाने से डरते हैं। यह एक शॉक्ड कर देने वाली फिल्म है और इरोटिक तो कतई नहीं है। हालांकि इसका प्रचार कुछ इसी तरह किया गया मगर यह फिल्म दिल्ली और सेक्स को एक सोशल मेटाफर की तरह इस्तेमाल करती थी। यह ठीक वैसा है जैसे चेक लेखक मिलान कुंदेरा अपने उपन्यासों में सेक्स को एक पॉलिटिकल मेटाफर की तरह इस्तेमाल करते हैं।

‘बीए पास’ दोहरे स्तर पर एक जद्दोजहद लेकर चलती है। अपने माता-पिता की दुर्घटना में मौत के बाद एक बीए का स्टूडेंट अपनी बहनों की परवरिश करने और उन्हें गरीबी के दंश से बचाने के लिए खुद देह व्यापार की दलदल में फंसता चला जाता है। उसका पुरुष होना एक नाटकीय विरोधाभास रचता है, जो इस पेशे की मजबूरी और गलाजत को पर्त-दर-पर्त खोलता जाता है।

फिल्म न्यूयार्क में रहने भारतीय और अंग्रेजी के लेखक मोहन सिक्का की कहानी ‘रेलवे आंटी’ पर आधारित है। क्लाइमेक्स को छोड़ दिया जाए तो निर्देशक बहल कहानी से दाएं-बाएं नहीं गए और उसे इमानदारी से पर्दे पर उतारने में ही अपनी रचनात्मकता दिखाई। फिल्म में दिल्ली शहर एक किरदार, एक रूपक की तरह उभरता है। उल्लेखनीय है कि यह कहानी ‘दिल्ली नॉयर’ संकलन का एक हिस्सा है, जिसमें उदय प्रकाश की कहानी ‘दिल्ली की दीवार’ भी ‘द वाल्स आफ डेलही’ के नाम से शामिल है। फिल्म का परिवेश समझने के लिए सिक्का की लिखी मूल कहानी की आरंभिक पंक्तियों पर गौर करें, जहां वे मुकेश की नजर से दिल्ली को देखते हैं –

“मैं अंधेरे में डूबे छोटे से बरामदे में लेटा हूँ, दिल्ली में बुआ के फ्लैट में मुझे यही जगह मिली है। इसकी खिड़कियां पंचकुइयां रोड की तरफ खुलती हैं, जहां से लगातार हार्न का शोर सुनाई देता रहता है। यहां तक हवा का झोंका भी नहीं पहुंचता। अभी सर्दियों का मौसम शुरु नहीं हुआ और हवा में फटे हुए पटाखों की सल्फर मिली गंध घुली हुई है, जिससे सांस लेना मुश्किल हो जाता है।“

कुछ इसी तरह निर्देशक अजय बहल भी छोटी-छोटी चीजों से एक वातावरण बुनते हैं। यह वातावरण ही चरित्रों को विश्वसनीय बनाता है। फिल्म छोटे-छोटे दृश्यों और मामूली से लगने वाले संकेतों के जरिए अपनी बात कहती चलती है। फिल्म के बड़े हिस्से में हमें अंधेरी दिल्ली दिखती है मगर उनके बीच रोशनी और रंग भी उभरते हैं और उदासी को गहरा करते हैं। फिल्म के भीतर कहानी शुरु होती है एक शोक सभा से। हम समझ जाते हैं कि नायक के माता-पिता नहीं रहे और उसकी दो बहनें हैं। वायसओवर में मुकेश (शादाब कमल) की आवाज सुनाई देती है- “मां-बाप का जल्दी मरना कभी हादसा नहीं लगता, कभी मौत नहीं लगती… सिर्फ धोखा लगता है। खाली किसने दिया… समझ में नहीं आता है।”  बीए का स्टूडेंट मुकेश कुछ कमाने लायक हुआ नहीं। दो बहनें भी हैं। परवरिश का जिम्मा बुआ पर आता है। मुकेश अपनी बुआ और रिश्तेदारों से कहता है- “मैंने कहीं नहीं जाना है, यहीं रहना है। सोनू और छोटी का ख्याल रखना है…”  और जैसे इसी संवाद के साथ ही फिल्म की बेसलाइन तैयार हो जाती है। सीन अंधेरे में फेड-इन होता है और कुछ झूलते-जगमगाते रंगों के साथ पर्दे पर शीर्षक उभरते हैं।

मुकेश के रोल को शादाब ने बड़ी सहजता से निभाया है। उनके पास नाटकीय होने के मौके थे, मगर शादाब उस लालच में नहीं पड़े। उनका अंडरप्ले ही दरअसल उस चरित्र को विश्वसनीयता प्रदान करता है। थोड़े ही दिनों में मुकेश को समझ में आ जाता है कि वह अपनी बुआ और उसके बेटे की आंखों में खटकने लगा है। कालेज और घर के बीच भटकते हुए वह एक क्रिश्चियन कब्रिस्तान में शतरंज खेलते हुए टाइम पास करता है, जहां उसकी मुलाकात वहीं काम करने वाले जॉनी से होती है और यह चरित्र दिव्येंदु भट्टाचार्य के सजीव अभिनय के कारण याद रह जाता है। जॉनी कहता है, “यह दिल्ली है, यहां हर कोई चोर है। यहां अच्छे टाइम में प्लॉट कटते हैं, बुरे टाइम में जेब और खराब टाइम में गले…”

कहानी में अहम मोड़ आता है बुआ के घर किटी पार्टी से, जहां सारिका (शिल्पा शुक्ला) भी आई है। वहां से शुरु होता है लालच का एक खेल- सेबों की पेटी के बहाने सारिका पहली बार मुकेश को सिड्यूस करती है। फिल्म का एक छोटा सा दृश्य है, जब मुकेश पहली बार सारिका के घर जाते वक्त सीढ़ियां चढ़ता है। यह है तो कुछ सेकेंड का- मगर पार्श्व में बजता संगीत उसके जीवन में जल्दी ही छा जाने वाले अंधेरे और त्रासदी का संकेत देता है। कॉलबेल बजाने से पहले मुकेश की घबराहट और बूढ़ी बीजी का अटपटे ढंग से उसे चेताना इस संभावित त्रासदी के रंग को और गहरा करता जाता है। आखिर सारिका से उसकी मुलाकात होती है। सारिका का इरादा स्पष्ट है। शिल्पा ने सारिका के चरित्र को एक नाटकीय रंग दिया है। एक ढीठ, सेक्सुअली फ्रस्ट्रेट और चालाक स्त्री के किरदार को उन्होंने पूरे आत्मविश्वास के साथ निभाया है।

सेक्स दृश्यों के फिल्मांकन में कई बड़े निर्देशक भी तटस्थ नहीं रह पाते मगर अजय बहल का कैमरा इन दृश्यों में एक दूरी बनाकर रखता है। मुकेश को अकेले में फुसलाने के बाद दोनों के बीच पहला लंबा चुंबन सेंसुअस नहीं है। वहां पर भी संगीत एक भय और उदासी का वातावरण रचता है। यह उदासी इतनी गहरी होती जाती है कि जब सारिका सोफे पर बैठे मुकेश के सामने खुद को सामने निर्वस्त्र कर रही होती है तो सेक्स का यह खेल विवशता और पैसे की ताकत के खेल में बदलता नजर आता है। हमेशा सेक्स के इस खेल में ताकत का प्रतीक पुरुष यहां निरीह नजर आता है।

आगे लगातार आने वाले सेक्स दृश्यों के बेहद कलात्मक मोंताज में भी पार्श्व संगीत हमें स्क्रीन पर नजर आ रहे दृश्यों से परे लेकर जाता है। इन दृश्यों का छायांकन अद्भुत है। निर्देशक इन पात्रों की शारीरिक भंगिमाओं और उनके चेहरे के एक्सप्रेशन तो दिखाता है मगर यह सब कुछ उनके आसपास की तमाम आउट ऑफ फोकस यानी धुंधली सी नजर आ रही चीजों के बीच घटित हो रहा होता है, जो इस पूरी दृश्य श्रृंखला को नियतिपरक बना रहा होता है। फिल्म के हर पात्र की नियति के बीज उसके भीतर छिपे नजर आते हैं, मगर यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि फिल्म में यह सब अमूर्त नियति के खेल की तरह सामने नहीं आता है- यह ठोस सामाजिक नियति है- जिसके आगे हम एक-एक करके इन चरित्रों को हौसला खोले और पराजित होते देखते हैं।

मुकेश की जिंदगी में कदम-दर-कदम पराजय का यह सिलसिला आगे बढ़ता जाता है। मुकेश की जिंदगी में फिर एक झटका आता है। थोड़े-बहुत खर्चे भेजने वाले दादाजी भी चल बसे। उसके फूफा फैसला लेते हैं- “छोटी और सोनू को होम में डलवा देते हैं… पम्मी अकेली कितना कर लेगी।” बहनों के घर छोड़कर जाने का दृश्य मार्मिक है। बारिश में मुकेश की दोनों बहनों को हम रिक्शे में बैठकर एक अनिश्चित भविष्य की तरफ जाते देखते हैं। मुकेश का संघर्ष बढ़ता जाता है। उसे पता चलता है कि हॉस्टल की संचालिका की गतिविधियां ठीक नहीं हैं। वह अपनी बहन को मोबाइल देता है ताकि उनके संपर्क में रह सके। अब मुकेश को और ज्यादा पैसे चाहिए। सारिका उसे चालाकी से इस्तेमाल करना शुरु करती है और अपने जैसी कई दूसरी महिलाओं के पास एक पुरुष वेश्या की तरह भेजना शुरु कर देती है।

शुरु में मुकेश का प्रतिरोध सारिका की लगातार चलने वाली दलीलों के आगे कमजोर होता जाता है। वह एक दिन सारिका से कहता है- “मेरे से नहीं होगा… मैं ऐसा लड़का नहीं हूं।” इस सीधे-सादे संवाद का मर्म गहरा है। मुकेश की जिंदगी और कठिन इसीलिए होती जा रही है क्योंकि ‘वह ऐसा लड़का नहीं है’। इसके जवाब में सारिका व्यंग से पूछती है- “अच्छा! कैसा लड़का है तू?” सारिका उसे समझाती रहती है- “पैसा कैसे आता है यह मत सोच, आता है और आता रहेगा, यह जानकर खुश रह…” जब मुकेश जानना चाहता है कि क्या वह सारिका को अच्छा नहीं लगता तो वह जवाब देती है- “सब अच्छा लगता है मुझे… तू भी अच्छा लगता है… दिल्ली की सोसाइटी मे शादी के लाइसेंस से जो कुछ भी मिलता है सब अच्छा लगता है।”

धीरे-धीरे दिल्ली का अंधेरा फिल्म पर हावी होता जाता है। पैरों की एड़ियां रगड़ने वाले घिसे-पिटे सेक्स दृश्य को निर्देशक ने लगातार डिज़ाल्व के जरिए जैसे एक पूरी सोसाइटी का रूपक बना दिया। कुछ ऐसे ही खूबसूरत दृश्य रात के अंधेरे में पुल से गुजरती खाली मेट्रो के हैं। घटनाएं आगे कई मोड़ लेती हैं। सारिका का पति उसे मुकेश के साथ रंगे हाथों पकड़ लेता है। सारिका न सिर्फ अचानक मुकेश से संबंध तोड़ लेती है बल्कि उसके पैसे भी हड़प लेती है। मुकेश को अचानक पैसे मिलने बंद हो जाते हैं। इसी बीच उसकी बहनें हॉस्टल छोड़ने का फैसला कर लेती हैं।

इसके बाद फिल्म का सबसे मार्मिक दृश्य सामने आता है जब मुकेश फोन करके दोबारा उन महिलाओं से संपर्क करने की कोशिश करता है- “हलो.. जी, कविता जी… मैं मुकेश बोल रहा हूं! हलो, मिस रीना.. जी मैं मुकेश बोल रहा हूं… जी… आपने फोन नहीं किया इसलिए सोचा कि… जी, रांग नंबर… काजल जी बोल रही हैं? उषा जी… वंदना जी… जी, सॉरी अबसे फोन नहीं करूंगा…” आखिरकार वह एक समलैंगिंक वेश्या के रूप में सड़क पर जाकर खड़ा हो जाता है। इस धंधे में उसकी इंट्री करना वाला नौजवान उसकी घबराहट देखकर उसे शराब की बोतल देता है और कहता है- “पी ले! मर्द को भी दर्द होता है…”  इसके बाद जो कुछ घटित होता है निर्देशक ने उसे किसी दुःस्वप्न की तरह प्रस्तुत किया है। मुकेश को पैसे नहीं मिलते हैं। हताशा के चरम पर पहुंचा मुकेश अंततः सारिका के घर से अपने पैसे चुराने का फैसला करता है। वहां उसकी मुठभेड़ सारिका से होती है और उसी वक्त उसका पति दरवाजा खटखटाने लगता है। घटनाएं तेजी से घटने लगती हैं। सारिका को चाकू मारकर मुकेश वहां से भाग खड़ा होता है।

क्लाइमेक्स में जब मुकेश भागता है तो हम समझ चुके होते हैं कि उसके लिए सारे दरवाजे बंद हो चुके हैं। जॉनी जो हमेशा मॉरीशस जाने के सपने देखता था, अपना कमरा छोड़कर जा चुका है। जब पुलिस मुकेश का पीछा कर रही होती है तो उसका फोन बजता है। उसकी बहनें बस स्टैंड पर उसका इंतजार कर रही होती हैं।

“हलो भइया! आप कहां हो? आप आए नहीं अभी तक? हम कब तक खड़े रहेंगे यहां पर? ये सीधी-सपाट आवाजें आपके कलेजे को चीर जाती हैं। खास तौर पर तब जब आप फिल्म के क्रेडिट्स पर्दे पर उभरने से ठीक पहले कहे गए मुकेश के संवाद के बरक्स इन्हें रखते हैं- “मैंने कहीं नहीं जाना है, यहीं रहना है। सोनू और छोटी का ख्याल रखना है…” मगर उस वक्त दृढ़ता से खड़ा मुकेश अब भाग रहा होता है। सोनू और छोटी आधी रात को बस स्टैंड पर अकेली उसका इंतजार कर रही होती हैं। मुकेश के पास जान बचाने का विकल्प भी खत्म हो चुका है।

‘बीए पास’ का मर्म उसकी कथा संरचना की निरंतरता में आकार लेता है। इस फिल्म को टुकड़ों में नहीं समझा जा सकता। यह फिल्म निर्ममता का दिखावा किए बिना हमारे बीच के एक निर्मम सत्य को सामने रख देती है।

यह फिल्म बताती है कि कड़वी हकीकत को बयान करने के लिए जिंदगी की कोमलता और संवेदनशीलता की पहचान होना कितना जरूरी है।

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