Film Review

बिज़नेस वीमेन है तो धूर्त ही होगी, ‘बदला’ में ये भी नहीं बदला है

अवनीश पाठक

स्पेनिश सिनेमा की एक अपराध कथा बॉलीवुड में दोबारा कही जाती है और अपने नए कहन में वो विशुद्ध अपराध कथा के बजाय स्त्रियों के दो स्टीरियोटाइप्स के पैरलल में रूपांतरित हो जाती है. कहने को तो यह रचनात्मक आज़ादी भर है, मगर जब उस आज़ादी के तहत किए बदलावों को संदर्भों से परे रखकर देखते हैं तो लगता है कि ये किसी स्त्री के बदले की कहानी के साथ-साथ ही स्त्रियों पर थोपी पुरुष-दृष्टि की भी कहानी है.

संदर्भों में भी देखते हैं तो भी ये पुरुष-दृष्टि जस्टिफाई नहीं हो पाती. महाभारत के उद्धरणों और किरदारों के जेंडर बदलकर बनाई गई, स्पेनिश फ़िल्म ‘दी इनविजिबल गेस्ट’ का हिंदी रीमेक ‘बदला’ बेहद उम्दा थ्रिलर के साथ ही फीमेल स्टीरियोटाइप्स का बोगस उदाहरण भी है. ये फ़िल्म स्पेनिश फ़िल्म ‘इनविजिबल गेस्ट’ का ऑफिशियल रीमेक है और लगभग फ्रेम-दर-फ्रेम कॉपी है. फ़िल्म की मुख्य किरदार नैना शेट्टी सफल और मशहूर बिज़नेस वीमेन है, एक्सपीरियंस के लिए एक्स्ट्रा-मैरिटल रिश्ता रखने में भी हिचकती नहीं है. अपने सीक्रेट लवर के साथ एक ट्रिप से लौट रही है, उसी समय एक हादसा होता है और उस हादसे के बाद एक ऐसा ट्रैप बनता चला जाता है, जिसमें नैना शेट्टी उलझती जाती है. अब ये ट्रैप संयोगवश बनते चले जाते हैं, या साजिशन, बदला का सस्पेन्स यही है.

फिल्म द इनविज़िबल गेस्ट (2016) का एक दृश्य

बंद कमरे में नैना शेट्टी और उनके वकील बादल गुप्ता ( अमिताभ बच्चन) के बीच हुई लंबी जिरह 12 एंग्रीमैन और द इंटरव्यू जैसे थ्रिलर्स की याद दिलाती है. नैना शेट्टी और बादल गुप्ता के अलावा फ़िल्म की तीसरी अहम किरदार रानी कौर (अमृता सिंह) है. नैना शेट्टी और रानी कौर फ़िल्म के दो पैरलल भी हैं. स्त्रियों के दो स्टीरियोटाइप्स के पैरलल. एक ओर सफल बिज़नेस वीमेन के रूप में कनिंग और अपनी महत्वाकांक्षा के लिए परिवार को भी दांव पर लगा देने से न चूकने वाली युवा नैना शेट्टी है तो दूसरी ओर हॉउस वाइफ की ज़िंदगी जी रही मिलनसार और सरल स्वभाव की अधेड़ रानी कौर. सिगरेट पीती, पति से झूठ बोलती, विवाहेतर रिश्ता रखती नैना शेट्टी के बरअक्स पति के साथ खुशहाल और अपने युवा बेटे के लिए परेशान मां रानी कौर के चरित्र एक दूसरे के समांतर बिल्कुल वैसे ही रखे गए हैं, जैसा बिज़नेस वीमेन और हॉउस वाइफ को लेकर प्रचलित धारणाएं हैं.

अपने झूठ से बादल गुप्ता को अवाक करने के बाद जब नैना शेट्टी कहती है- ऐसे ही थोड़े बन गई बिज़नेस वीमेन ऑफ दी ईयर, तो मानो लगता है कि झूठ बोलना और चालक होना सफलता के सोपानों में से एक है, और एक महिला बिज़नेस वीमेन ऑफ दी ईयर तभी बन पाई होगी, जब वो इन दोनों ‘स्किल्स’ में दक्ष होगी. ‘कहानी’ जैसी फ़िल्म बना चुके सुजॉय घोष थ्रिलर्स के मास्टर हैं. बदला की कसी हुई स्क्रिप्ट पर ये छाप दिखती है. एक ही घटना के कई एकाउंट्स हो सकते हैं और एक ही ‘सेट ऑफ इवेंट्स’ से सुविधानुसार तथ्य चुनकर अपना-अपना सच गढ़ा जा सकता है, बदला इस अवधारणा को बखूबी विस्तार देती है. इसलिए ये कहना ठीक ही है कि सच कुछ भी नहीं बल्कि अपनी धारणाओं के मुताबिक तथ्यों का चुनाव है.

हालांकि तथ्यों के चुनाव में ये भी अहम है कि जिन्हें चुना गया वो तो ठीक है, मगर जिन्हें छोड़ दिया गया वो क्या था. चुनना अगर परसेप्शन से नियंत्रित है तो छोड़ना इंटरेस्ट से. ये बिल्कुल वैसे ही जैसे 1×1 को 1×1 बताने के बजाय ये बताया जाए कि दो एक हैं या दो एक थे, और जो तीसरा है उसे छिपा लिया जाए. दो एक कुछ भी हो सकता है. ये 11 भी हो सकते हैं, दो भी और एक भी, ये सुनने वाला अपने परसेप्शन से तय करेगा. बदला या इनविजिबल गेस्ट का मर्म भी यही है कि सामने वाला जो दिखा रहा है, हम भी वही देख रहे हैं या वो देख रहे हैं जो हम देखना चाहते हैं. सामने वाले के सच में उसका झूठ और अपना सच ढूंढ़ते रहना ही जीवन का द्वंद्व भी है. बदला इस द्वंद्व को बेहतर तरीके से सामने रखती है.

अवनीश पाठक

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