Memory

नायक हमारे भीतर है…

मेरे लिए हमेशा यह जानना बड़ा ही दिलचस्प होता है कि कोई भी फिल्म कैसे लोगों के दिलो-दिमाग को छू जाती है और कई बार सफलता का इतिहास रच जाती है। पिछले वर्षों में देखी कुछ फिल्मों की विषय वस्तु लंबे समय तक मुझे कुरेदती रही। इनमें से दो फिल्में थीं बागबान और भेजा फ्राई… दोनों ही न सिर्फ व्यावसायिक रूप से सफल रहीं बल्कि अपने आसपास के लोगों से मैं लगातार उनकी सराहना सुनता रहा। दोनों के सब्जेक्ट, प्रस्तुति की शैली और धाराएं भिन्न थीं। समानता बस इतनी थी कि दोनों ही किन्ही अनजान कारणों से दर्शकों को भा गईं।


बागबान व्यावसायिक शैली में बनी एक ऐसी फिल्म थी जिसका विषय इससे पहले भी सफल रुप में अवतार जैसी कई फिल्मों में दोहराया जा चुका था। वहीं भेजा फ्राई एक डार्क कॉमेडी थी… संभवतः किसी यूरोपियन सिनेमा से प्रभावित कुछ ऐसे लोगों की कहानी कहती थी, जिनकी जीवन शैली का सामान्य मध्यवर्ग से कोई लेना-देना ही नहीं था। बोहेमियन किस्म के कुछ चरित्रों के आपसी अंतर्संबंधों में भला किसी दिलचस्पी होगी। मगर यह फिल्म उसी मध्यवर्ग की खासी दिलचस्पी का सबब बनी। यहां यह जानना दिलचस्प होगा कि कैसे हमारे मध्यवर्ग की मानसिकता किन्हीं विषयों को सफल बना देती है।

बागबान में कुछ भी नया नहीं है, वही सब, यानी पीढ़ियों का टकराव, मां-बाप की उपेक्षा और रिश्तों को कुछ उसी अंदाज में पेश किया गया है जिस अंदाज में इससे पहले सालों तक हिन्दी सिनेमा में पेश किया जाता रहा। मगर इस फिल्म का एक पहलू ऐसा है जो इससे पहले किसी फिल्म में नहीं था और उसने बागबान को सफल फिल्मों की कतार में लाकर खड़ा कर दिया। दरअसल बागबान उत्तर उदारीकरण के दौर में पीढ़ियों और रिश्तों के टकराव की कहानी बयान करती है। या कहें तो यह पीढ़ियों के टकराव से ज्यादा उन लोगों की कथा कहती है जो उदारीकरण के बाद बिल्कुल बदले हुए समाज में खुद को अलग-थलग सा पाते हैं। अमिताभ और हेमा का चरित्र कुछ ऐसा ही है। उनकी जीत इस बात में है कि वे हार नहीं मानते और इसी बदले समाज में अपनी शर्तों पर जगह बनाते हैं और इस पीढ़ी की शर्तों पर खुद को खरा साबित कर देते हैं।

यहां उनकी संतान उतनी बुरी नहीं है बल्कि वह सिर्फ इस बात से अपने माता-पिता को आहत करती है कि उसके जीवन में उनकी कोई भावनात्मक जगह नहीं है। इसीलिए नौकरानी का कमरा मां के लिए घर में किसी छोटे से कोने से ज्यादा अहम हो जाता है। रात में पिता के टाइपराइटर की खटखट बेटे के घरेलू जीवन में भूचाल ला सकती है और बेटे के जूते पिता के चश्मे से ज्यादा अहम हो जाते हैं। फिल्म में उदारीकरण के बाद इस अलगाव को कई जगह खूबसूरती से प्रस्तुत किया गया है। एक जगह एकाउंटेंट रह चुका पिता अपने बेटे से उसके काम में मदद की पेशकश करता है तो बेटा कुछ अहंकार के साथ अपनी मल्टीनेशनल कंपनी के जटिल काम का हवाला देते हुए मना कर देता है।


फिल्म जैसे अनजान लोगों की भीड़ में खो गए किसी दंपति का सफर है। खास बात यह है कि दोनों किसी बुजुर्ग की तरह रहने से इनकार कर देते हैं। वे इस समाज में अपनी जगह किसी बेकार सामान की तरह कोने में पड़े रहकर बिताने को तैयार नहीं हैं। तभी हमारा यह नायक वेलेंटाइन-डे पर अपनी पत्नी को फोन करता है, युवा साथियों के साथ गीत गाता है और दोनों शादी के कई बरस बीतने के बावजूद अपने बेइंतहां प्यार का इज़हार करते हुए झिझकते नहीं।

फिल्म बताती है कि वे अपने बेटों के लिए जीने की सोचते हैं जैसे कि उनसे पहले की पीढ़ी जीती आई थी। मगर जब वहां उनके लिए कोई जगह नहीं नजर आती तो वे अपना जीवन अपनी शर्तों पर जीने का फैसला करते हैं। फिल्म बताती है कि इसी उत्तर उदारीकरण में उन तमाम लोगों के लिए जगह और सफलता के रास्ते हैं जो खुद को अलग महसूस कर रहे हैं। तभी अमिताभ की किताब को एक इंटरनेशनल पब्लिशर खरीद लेता है और वह बेस्ट सेलर बन जाती है और हमारा नायक बुकर एवार्ड के लिए नामित होता है। यानी इसी ग्लोबलाइजेशन ने साधारण इंसानों के लिए भी आगे बढ़ने के दरवाजे खोले हैं। यह फिल्म तमाम मध्यवर्गीय लोगों को यह संदेश देती है कि यह ठहरकर बदलती दुनिया को देखने का नहीं बल्कि उसके साथ चलने का वक्त है। अपने अंतिम अर्थ में यह फिल्म बहुत साधारण क्लर्क-सा जीवन जी रहे लोगों को इतिहास से मुठभेड़ करने हौसला देती है।


अब जरा दूसरी फिल्म भेजा फ्राई पर चलते-चलते एक नजर डाल लें। इस फिल्म की मध्यवर्ग के बीच पापुलैरिटी की वजह इसके अंडर करेंट वाले डायलाग या उच्चवर्गीय जीवन का खोखलापन या डार्क ह्यूमर नहीं था। इसकी सीधी सी वजह फिल्म की कथा शैली में निहित थी। फिल्म में एक शख्स (भारत भूषण बने विनय पाठक)को उच्च वर्ग के कुछ नुमाइंदे मज़ाक उडा़ने के लिए बुलाते हैं, क्योंकि अपनी मध्यवर्गीय लाचारी और बेचारगियों के चलते वह एक कॉमिक कैरेक्टर बन चुका है। वह सफल नहीं है और सफलता की आकांक्षा एक डिस्टार्टेड कैरेक्टर का रूप ले चुकी है।

हम भी उस पर हंसते हैं। मगर फिल्म दिलचस्प तरीके से उस चरित्र की मौजूदगी में उच्च वर्ग के खोखलेपन को परत-दर-परत खोलती है और हमारा नायक सचमुच का एक नायक बन जाता है। यह फिल्म उस मध्यवर्गीय चरित्र को सुख देती है जिसके लिए रजत कपूर, सारिका और मिलिंद सोमण जैसे चरित्र अजनबी हैं। उसके लिए विनय पाठक ही एक आइडेंटीफाई करने वाला चरित्र है और जब उसके सामने इन तमाम लोगों के जीवन के काले-अवसादग्रस्त पहलू उभरते हैं तो वह दरअसल नायक की जीत दिखाता है और जाहिर सी बात है हमारे उस मिडल क्लास की भी जिसके लिए भेजा फ्राई जैसी फिल्म सर से उपर गुजर जाने वाली है।

अगली बार मैं उन दो फिल्मों के बारे में लिखना चाहूंगा जिनमें मौजूदा समय की इतिहास के नायकों से मुठभेड़ दिखाई गई और दोनों ही बहुत पसंद की गईं, हालांकि नायक विरोधी प्रवृति के थे। हां, मैं बात कर रहा हूं रंग दे बसंती और लगे रहो मुन्नाभाई की।

Show More

Related Articles

3 Comments

Leave a Reply

Back to top button
Close