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बंबई रात की बाहों में

राजकपूर के लिए सदाबहार हिट फिल्में देने वाले ख्वाजा अहमद अब्बास ने खुद के निर्देशन में भी बहुत सी फिल्में बनाई हैं और आम तौर पर उनकी फिल्में तत्कालीन आलोचकों द्वारा खारिज कर दी जाती थीं। यह माना जाता था कि जब अब्बास खुद के निर्देशक में फिल्म बनाते थे तो वे संतुलित नहीं रह पाते थे और उनकी फिल्म भाषणबाजी में खो जाती थी।

इसके बावजूद मेरा मानना है कि भारत में इंडिपेंडेंट सिनेमा जैसी अवधारणा पर उस वक्त अब्बास ही काम कर रहे थे। यह अलग बात थी कि उस वक्त का सेटअप ऐसा नहीं था। ख्वाजा अहमद अब्बास के निर्देशन वाली एक ही फिल्म मैंने देखी है और वह है परदेसी। यह शायद भारत की पहली फिल्म थी जो रूस के सहयोग से बनी थी। इस फिल्म में उनका और रूस के निर्देशक वसीली प्रोनिन का संयुक्त निर्देशन था। तकनीकी रूप से यह उस दौर की उत्कृष्ट फिल्मों मे एक थी।

फिल्म का पोस्टर

ख्वाजा अहमद अब्बास की दो फिल्में मैंने पढ़ी हैं। फिल्म पत्रिका माधुरी ने शहर और सपना का पुनरावलोकन प्रकाशित किया था। यह अपने आप में एक अनूठा प्रयोग था। ऐसा मुझे आज तक दोबारा देखने को नहीं मिला। दूसरी फिल्म थी बंबई रात की बाहों में, जिसका मैं यहां जिक्र करना चाहूंगा। 1968 में रिलीज इस फिल्म में उस दौर के ज्यादातर नए चेहरे ही रहे होंगे, जलाल आगा, परिसिस खंबाटा आदि। यह उपन्यास के रूप में इसी नाम से हिन्द पाकेट बुक्स से छपा था। वह भी काफी पुराना संस्करण था और मेरी मां की किताबों के कलेक्शन में मौजूद था इसलिए मुझे पढ़ने को मिल गया। जाहिर तौर पर यह फिल्म की पटकथा को आधार बनाकर लिखा गया होगा मगर इसमें कोई शक नहीं कि यह एक बेहतर उपन्यास भी है।

बंबई रात की बाहों में शायद अपने समय से आगे की फिल्म रही होगी। यह इस कदर प्रासंगिक है कि आज भी अनुराग कश्यप, निशिकांत कामत (डोबिवली फास्ट, मुंबई मेरी जान) या राजकुमार गुप्ता (आमिर) जैसा निर्देशक इस उपन्यास को आधार बनाकर एक शानदार फिल्म बना सकता है। यह दरअसल मुंबई के एक दिन या कहें तो मुंबई की एक रात की कहानी है। सिर्फ एक रात कई लोगों की जिंदगी बदल देती है। यह उपन्यास पढ़े अरसा गुजर गया इसलिए मुझे अफसोस है कि मैं इस पर बहुत अधिकार के साथ नहीं लिख पाऊंगा मगर यह एक ईमानदार पत्रकार की कहानी है। अपनी पत्नी से उसके संबंध टूटने के कगार पर हैं। फिल्म में एक खल चरित्र भी है और वह एक यादगार चरित्र है।

पूरा उपन्यास एक थ्रिलर की शक्ल में लिखा गया है मगर थ्रिलर के फारमैट में वह एक महानगर के अंधेरे हिस्से को उजागर करता चलता है। कहानी कहीं भी अपने चरित्रों से नहीं भटकती मगर दिलचस्प बात यह है कि उससे सामाजिक सारोकार बहुत गहरे हैं। इसे सीन और शॉट कंपोजिशन की तकनीकी को आधार बनाते हुए लिखा गया है। इसलिए इस उपन्यास में दृश्यात्मकता और बांधने वाले तत्व बहुत मजबूत हैं। इस कुछ दृश्य मुझे आज भी नहीं भूलते। मुंबई की बारिश का चित्रण। देर रात चलने वाली पार्टियां और उनकी जलती-बुझती रोशनी में चेहरे, सूनी सड़कों पर तेज भागती गाड़ियां और लैंप पोस्ट पर चिपके हॉलीवुड के पोस्टर।

बंबई रात की बाहों में का हर चरित्र गहराई से एक दूसरे से जुडा़ हुआ है। यह एक तेज रफ्तार से भागती कहानी है। एक रात मे ही उनके बीच की कड़वाहट, उनके सामाजिक अंतर्विरोध और उनकी छटपटाहट सामने आ जाती है। यह दूसरी ऐसी किताब है जिसे मैंने फिल्म की तरह देखा। यह उपन्यास बताता है का पॉपुलर फारमैट इस्तेमाल गंभीर बातों को कहने के लिए किस तरह किया जा सकता है। जैसा कि आज बहुत से निर्देशक और लेखक कर रहे हैं।ऊपर दी गई तस्वीर मे ख्वाजा अहमद अब्बास राजकपूर के साथ एकदम बाईं तरफ दिख रहे हैं।

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9 Comments

  1. “बंबई रात की बाहों में” तो मैंने पढ़ा है .हाँ दूसरे को जरूर ढूँढने की कोशिश करूँगा .वैसे एक इंसान ओर है जो उपन्यास पर एक अच्छी फिल्म बना सकता है “विशाल भारद्वाज “

  2. बेहतरीन फिल्म थी ये…जलाल आगा ने कमाल का अभिनय किया था इसमें…आपने सच कहा सिर्फ एक रात की कहानी है ये…अफ़सोस मुझे फिल्म की D.V.D /V.C.D. भी नज़र नहीं आयी…
    नीरज

  3. ख्वाजा अहमद अब्बास के लिए फिल्म सामाजिक बराबरी की लड़ाई का एक जरिया थी.वे मुंबई में फिल्म के .रास्ते पैसा कमाने नहीं आये थे.भारत के सिनेमा को उनके बहुरत सारे योगदान हैं. सब का ज़िक्र करना लगभग नामुमकिन होगा.लेकिन एक बात का ज़िक्र करना ज़रूरी समझता हूँ. ख्वाजा साहेब को तलेंट की अद्भुत पहचान थी..उन्होंने जिन दो लोगों को महत्वा दिया उनमें एक हैं अमिताभ बच्चन ,जिनको को नहीं जानत है जग में . और दुसरे हैं नामवर पत्रकार पी साईनाथ . पत्रकारिता की दुनिया का यह बेजोड़ इंसान भी ख्वाजा साहेब को बहुत पसंद था. और जब उनकी मृत्यु हुयी तो साप्ताहिक ब्लिट्ज में ख्वाजा अहमद अब्बास के कालम लास्ट पेज का जिमा साईनाथ को दिया गया. अगर और कुछ न गिना जाए तो उनकी इन् दो खोजों के लिए ही उन्हें बहुत दिन तक याद रखा जाना चाहिए. उनकी जिस फिल्म का ज़िक्र आपने किया है वह भारतीय सिनेमा की आबरू है.कोई उसके मह्त्व को न समझे तो क्या किया जा सकता है.और बात को कहने का आपका तरीका मुझे बहुत अच्छा लगा.

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