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टूटना, हारना और फिर उठ खड़े होना

अभी अनिल शर्मा की फिल्म अपने देखने का मौका मिला. मीडिया में इसका बड़ा ही फीका स्वागत हुआ. इसे एक साधारण और आंसू बहाऊ फिल्म का दर्जा दिया गया. मुझे यह फिल्म अपने आसपास की रिलीज कई फिल्मों के मुकाबले बेहतर लगी और अनिल शर्मा का शायद यह सबसे बेहतर एफर्ट था. मुझे निजी तौर पर अनिल शर्मा पसंद नहीं हैं, मगर अपने राकी जैसी हालीवुड की फिल्मों से प्रभावित होने के बावजूद एक बेहतर और संवेदनशील फिल्म बनी है. फिल्म एक्शन की बजाय बड़ी बारीकी से रिश्तों की बुनावट पर फोकस करती है. खास तौर पर धर्मेंद्र का काम काफी बेहतर है.

मुझे इस फिल्म में सबसे खूबसूरत इसका एनवायरमेंट लगा, जो एक खास पंजाब की आबोहवा, उसकी बोली, उनके परिवारों के कल्चर के बीच रचा गया है. फिल्म बहुत नहीं चली तो इसके पीछे एक तो इसका कमजोर प्रोमोशन हो सकता है, दूसरा उत्तरार्ध में फिल्म थोड़ी कमजोर पड़ जाती है. अगर यह सनी के भीतर मौजूद ग्लानि और धर्मेंद्र के त्याग को और ज्यादा उभार सकती तो एक बेहतर फिल्म बन सकती थी. काश अनिल शर्मा इसे मिलियन डालर बेबी की तरह थोड़ी टेक्नीक पर फोकस रखते, वैसे इसे किसी भी तरह से बहुत बेहतर फिल्म का दर्जा नहीं दिया जा सकता, मगर मेरा मानना है कि कई बार अच्छे विषय और ट्रीटमेंट वाली फिल्में चर्चा से बाहर रह जाती हैं. इसका एक उदाहरण फैमिली है, जो एक शानदार कैथार्सिस रचने वाली त्रासदी है, मगर उस फिल्म की चर्चा अधिक नहीं हुई, सिवाय जयप्रकाश चौकसे के जिन्होंने दैनिक भास्कर में इस फिल्म को सराहा था.

अपने
देखते हुए मन में एक और ख्याल आया कि क्या वजह है कि बाक्सिंग सिनेमा का इतना फेवरेट सब्जेक्ट है. देखें- पूरी राकी सिरीज, मिलियन डालर बेबी, अली, द ग्रेटेस्ट. हिन्दी में मुझे मिथुन की बाक्सर याद आती है, यह सुपर फ्लाप फिल्म अपने ट्रीटमेंट में बहुत बुरी नहीं थी, इसी फिल्म से शरत सक्सेना पहचाने जाने लगे. मुझे लगता है बाक्सिंग का रिंग सिनेमा में कई बातें अपने-आप जोड़ देता है. जैसे संघर्ष, प्रतिशोध की भावना, टूटना, हारना और फिर उठ खड़े होने, क्लाइमेक्स का रोमांच.

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2 Comments

  1. हिन्दी चिट्ठाजगत में स्वागत है।
    टूटना, हारना और फिर उठ खड़े होने का रोमांच भी है और प्रेणनादायक भी – इसी लिये इस तरह की फिल्में चल पाती हैं।

  2. मुझे याद है कि दिनेश सर ने इस फिल्म का रीव्यू करने से इनकार कर दिया था, अगर ये रीव्यू वह रिलीज ेक समय के लिखते तो अनिल शर्मा को ज्यादा राहत होती. खैर बहुत ही बेहतरीन ढ़ंग से इन्होंने पंजाब की ओबोहवा से लास एंजेलिस की सैर कराई. हां, फिल्म के संगीत के बारे में भी कुछ जिक्र किया जाना चाहिए था.
    अरविंद ।।।।

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