Category: Memory

  • कहानी हमारी हकीकत न होती… बॉलीवुड की ऐतिहासिक प्रेम कहानियां

    Historical love stories of bollywood

    ‘मुगल-ए-आजम’, ‘हीर-रांझा’, ‘सोहनी-महीवाल’ और ‘बाजीराव-मस्तानी’… बॉलीवुड को प्रेम के किस्से लुभाते रहे हैं और शायद हर लार्जर दैन लाइफ फिल्म बनाने वाले निर्देशक का सपना होता है कि वह अतीत की किसी ऐसी ही कहानी को भव्य तरीके से प्रस्तुत करें। अपनी हर फिल्म में उत्तरोत्तर भव्य होते गए संजय लीला भंसाली की कुछ ऐसी महत्वाकांक्षा ‘बाजीराव मस्तानी’ के प्रोमो… Continue reading "कहानी हमारी हकीकत न होती… बॉलीवुड की ऐतिहासिक प्रेम कहानियां"

  • कहानी ‘लाजवंती’ की

    विजयदान देथा की कहानियां हमेशा से फिल्म निर्देशकों के लिए आकर्षण का केंद्र रही हैं। चाहे मणि कौल की ‘दुविधा’ हो, प्रकाश झा की ‘परिणति’, अमोल पालेकर की ‘पहेली’ हो या फिर उदय प्रकाश द्वारा उनकी कहानियों पर बनाई गई छोटी-छोटी फिल्में। सभी ने उनके जादुई संसार को सिनेमा के पर्दे पर अपने-अपने तरीके से उतारने की कोशिश की है।… Continue reading "कहानी ‘लाजवंती’ की"

  • तो कैसा लड़का है तू?

    कुछ फिल्में आप देखते हैं और भूल जाते हैं। कुछ याद रह जाती हैं। और कुछ फिल्में आपका गिरेबान पकड़कर झूल जाती हैं। आप स्तब्ध हो जाते हैं और लंबे समय तक उन्हें अपनी स्मृति से निकाल नहीं पाते। अजय बहल की फिल्म ‘बीए पास’ कुछ इसी तरह की फिल्म है। किशोर मन और बच्चों पर कितना कुछ लिखा गया… Continue reading "तो कैसा लड़का है तू?"

  • अपने पर भरोसा है तो ये दांव लगा ले…

    विक्रमादित्य मोटवानी इसलिए जिक्र करने लायक निर्देशक हैं क्योंकि उनकी फिल्मों में हड़बड़ी नहीं है। न तो जल्दी-जल्दी कहानी कहने की, न खुद को इंटैलेक्चुअल बताने की और न ही बेवजह एक भव्य फिल्म बनाने की। उनका कैमरा उतना ही और उन्हीं चीजों को दिखाता है, जिसकी कहानी कहने में जरूरत है और तब हमें अहसास होता है कि दरअसल… Continue reading "अपने पर भरोसा है तो ये दांव लगा ले…"

  • हमें ये सीक्वेल चाहिए!

    देखते-देखते हिन्दी फिल्मों के सीक्वेल बनने लगे. सबसे पहले सीक्वेल के बारे में पता लगा स्टारवार्स सिरीज से. किशोरावस्था का ज्यादा हिस्सा सीक्वेल देखते ही गुजरा. एंपायर स्ट्राइक्स बैक पहले देखी फिर रिटर्न आफ जेडाइ- मगर स्टारवार्स आज तक न देख सका. कुछ और सीक्वेल देखे- कई बार खराब, जैसे- डाइहार्ड का दूसरा भाग और कई बार इतने शानदार कि… Continue reading "हमें ये सीक्वेल चाहिए!"

  • क्या कृष्ण हैं भारतीय नायक?

    जहां हर बालक इक मोहन है, और राधा इक-इक बाला… सिकन्दर-ए-आज़म (1965) में राजेन्द्र कृष्ण का लिखा गीत भारतीय नायक की आर्किटाइपल छवि क्या है? पश्चिम में यह ग्रीक मिथकों और बाइबिल की महागाथा से ओतप्रोत है. वहां मनुष्य और प्राकृतिक शक्तियों के बीच संघर्ष ज्यादा गहरा होकर उभरता है. इसके उलट भारतीय समाज लंबे समय से नायकों की पूजा… Continue reading "क्या कृष्ण हैं भारतीय नायक?"

  • ए स्टूपिड कॉमन मैन…

    एक नजर इंडिया के आम आदमी की आइकोनिक इमेज वाली पांच फिल्मों पर आक्रोश (1980) आम आदमी का गुस्सा एक कभी न खत्म होने वाली चुप्पी बन सकता है. गोविंद निहलानी की पहली फिल्म आक्रोश में ओम पुरी ने इसका एहसास कराया. विजय तेंडुलकर की लेखनी, निहलानी का डायरेक्शन और नसीर, स्मिता और ओम पुरी की शानदार एक्टिंग इसका दर्जा… Continue reading "ए स्टूपिड कॉमन मैन…"

  • मैं इस दुनिया की कहानी कहता हूं: राजकुमार गुप्ता

    उनकी फिल्म ‘आमिर’ ने पहली बार मेरा ध्यान खींचा था. अपने अलग तरह के प्रोमो के कारण. बाद में मैंने यह फिल्म देखी. जिस बात ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया, वह था रियलिस्टिक ट्रीटमेंट और कसी हुई स्क्रिप्ट. इससे भी बढ़कर यह कि इसे देखकर इससे मिलती-जुलती किसी और फिल्म की याद नहीं आती थी. राजकुमार गुप्ता की फिल्म ‘नो… Continue reading "मैं इस दुनिया की कहानी कहता हूं: राजकुमार गुप्ता"

  • प्रलय की कहानियां

    सिनेमा में तबाही की अवधारणा बाकायदा फिल्म मेकिंग की एक धारा के रूप में डेवलप हो चुकी है, जिनमें दुनिया के अंत या बुरे भविष्य की आशंकाओं के आसपास कहानी बुनी जाती है. चाहे भारत में जबरदस्त सफल रही हॉलीवुड की ‘2012’ हो, या हाल में आई ‘स्काईलाइन’ या कुछ बरस पहले धूमकेतु के धरती से टकराने का अंदेशा लेकर… Continue reading "प्रलय की कहानियां"

  • पूरब और पश्चिम

    हाल में क्रुक देखते हुए यह ख्याल आया कि हमारी फिल्मों में विदेशी चरित्रों को पेश करने का तरीका कितना सतही है. क्रुक आस्ट्रेलिया में नस्लवाद की समस्या की तह तक जाने का दावा करती है, मगर वहां के चरित्रों को ही विश्वसनीय तरीके से नहीं पेश कर पाती. फिल्म की एक अहम किरदार, आस्ट्रेलियन युवती निकोल का चरित्र भी… Continue reading "पूरब और पश्चिम"