Category: Retro

  • दुनिया जो भीतर गुम है कहीं

    तेरे बिना ज़िंदगी से कोई, शिकवा, तो नहीं, तेरे बिना ज़िंदगी भी लेकिन, ज़िंदगी, तो नहीं गुलज़ार (फिल्म ‘आंधी’ से) सत्तर के दशक की कुछ फिल्में एक अलग और सुहानी सी दुनिया रचती हैं। ये सत्तर के दशक का मध्यम वर्ग था। अपनी लाचारियों, परेशानियों और उम्मीदों में डूबता-उतराता। कभी हम ‘गोलमाल’ जैसी फिल्मों में उस पर हंसते थे तो… Continue reading "दुनिया जो भीतर गुम है कहीं"

  • हमने इतिहास को देखा है…

    जो अपने लिए सोचीं थी कभी वो सारी दुआएं देता हूँ…  साहिर (फिल्म ‘कभी-कभी ‘से) इस बार अनजाने में ही हाथ लग गए एक नौजवान के कुछ नोट्स शेयर कर रहा हूं. नाम और लोकेशन का पता नहीं, गौर से पढ़कर देखें शायद वह आपके पड़ोस में ही कहीं हो... कई बार यह ख्याल आता है कि दुनिया को हिला… Continue reading "हमने इतिहास को देखा है…"

  • …उन बदनाम चेहरों की दास्तान

    हाजी मस्तान (1926-1994) साठ और सत्तर के दशक में मुंबई में एक स्मगलर और गैंगस्टर बनकर उभरे हाजी मस्तान ने भी सिनेमा इंडस्ट्री को इंस्पायर किया है. हाजी मस्तान के जीवन पर पहली फिल्म बनी दीवार और सुपरहिट हुई. अमिताभ के कॅरियर के लिए यह मील का पत्थर साबित हुई. अमिताभ की एक और सुपरहिट फिल्म मुकद्दर का सिकंदर भी… Continue reading "…उन बदनाम चेहरों की दास्तान"

  • मेड इन इंडिया…

    कहीं से एक लहर उठी और सारी दुनिया झूमने लगी. बीते दो दशकों में सबसे बड़ा कल्चरल चेंज इंडियन पॉपुलर म्यूजिक में देखने को मिलता है. इंडिया ने वेस्टर्न म्यूजिक को एक खास स्टाइल दिया और ग्लोबल आइडेंटिटी बनाई है. बदलाव के बीच बहुत से नाम उभरे, चमके और ग़ायब हो गए. वक्त की लहरें गीली रेत पर कदमों के… Continue reading "मेड इन इंडिया…"

  • जोगिंदर की स्मृति में

    ‘रंगा खुश’ जोगिंदर इस दुनिया में नहीं रहा। यह खबर मुझे देर से मिली और जब आज शाम को एक मित्र से बातों-बातों में पता लगा तो इस पर पोस्ट लिखने से खुद को रोक नहीं सका। जोगिंदर का नाम खराब एक्टिंग और खराब फिल्में प्रोड्यूस करने का पर्याय बन चुका था। वैसे भी उनको भारत के दस सबसे खराब… Continue reading "जोगिंदर की स्मृति में"

  • मन का रेडियो

    आजकल पुराने दिनों को याद करना एक फैशन सा हो चला है। बहुत पुराने नहीं- यानी रिसेंट पास्ट। फिल्में भी कुछ इसी अंदाज में बन रहीं हैं, वे सत्तर या साठ के दशक में झांकने की कोशिश करती हैं। रेट्रो लुक तो फैशन और डिजाइन का एक अहम हिस्सा बन चुका है। पश्चिम के पास याद करने को काफी दिलचस्प… Continue reading "मन का रेडियो"

  • वो जमाना ‘थ्रिलर्स’ का!

    हिन्दी सिनेमा ने थ्रिलर की अपनी एक दिलचस्प स्टाइल डेवलप की थी, जो अचानक खत्म हो गई। अगर गौर करें तो सत्तर-अस्सी का दशक का हिन्दी सिनेमा इन थ्रिलर फिल्मों के लिहाज से बहुत समृद्ध था। इसमें विजय आनंद, बीआर चोपड़ा और राज खोसला जैसे निर्देशकों का काफी योगदान था। इन फिल्मों की सबसे बड़ी खूबी थी- सोशल सिनेमा के… Continue reading "वो जमाना ‘थ्रिलर्स’ का!"

  • एक थी लड़की, नाम था नाज़िया

    यह भारत में हिन्दी पॉप के कदम रखने से पहले का वक्त था, यह एआर रहमान के जादुई प्रयोगों से पहले का वक्त था, अस्सी के दशक में एक खनकती किशोर आवाज ने जैसे हजारों-लाखों युवाओं के दिलों के तार छेड़ दिए। यह खनकती आवाज थी 15 बरस की किशोरी नाज़िया हसन की, जो पाकिस्तान में पैदा हुई, लंदन में… Continue reading "एक थी लड़की, नाम था नाज़िया"

  • बारिश में भीगता हुआ पोस्टर

    अगर सिनेमा को याद करूं तो मैं उन तमाम पोस्टरों को नहीं भूल सकता, जिन्होंने सही मायनों में इस माध्यम के प्रति मेरे मन में गहरी उत्सुकता को जन्म दिया। जबसे मैंने थोड़ा होश संभाला तो सिनेमा के पोस्टरों ने मेरा ध्यान खींचना शुरु किया। मुझे यह पता होता था कि ये फिल्में मैं नहीं देख सकता मगर पोस्टर से… Continue reading "बारिश में भीगता हुआ पोस्टर"

  • नष्ट होती धरोहर

    मेरे लिए यह खबर एक शॉक की तरह थी कि आज की तारीख में भारत की पहली बोलती फिल्म आलमआरा का कोई प्रिंट मौजूद नहीं है। यह देश और समाज की धरोहर के प्रति एक अक्षम्य लापरवाही है। भारतीय सिनेमा का इतिहास आलमआरा का जिक्र किए बिना पूरा ही नहीं हो सकता, मगर आज उस फिल्म के प्रिंट को न… Continue reading "नष्ट होती धरोहर"