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मेरे मन में फिर भी अंधियारा है…

सिनेमा के पर्दे पर नजर आने वाली जिस शख्सियत को पहली बार मैंने रीयल लाइफ में देखा, वह असित सेन थे. तब मैं हाईस्कूल में पढ़ता था. वे गोरखपुर में चल रहे किसी खेल कार्यक्रम में आए थे. वे मुझे सिनेमा के ग्लैमर से काफी दूर एक आम इनसान से लगे.

धीरे-धीरे यह अहसास हुआ कि सिनेमा के ग्लैमर के बावजूद तमाम लोग हैं जिनकी जड़ें हमारी तरह गली-मोहल्लों और कसबों में हैं. कैरेक्टर आर्टिस्ट ओम प्रकाश का रिश्ता बरेली से रहा है, और निर्देशक प्रकाश मेहरा का भी. प्रकाश मेहरा के बचपन के एक मित्र तो मेरे देखते-देखते उनसे मुंबई जाकर मुलाकात भी कर आए.

दो साल पहले ही उत्सुकतावश मैं अमरोहा में कमाल अमरोही के पुश्तैनी मकान पर गया. तंग और आड़ी गलियों मे काफी दूर तक चलने के बाद कमाल अमरोही का बड़ा सा मकान आता है, जिस पर लिखा है- चंदन का घर. चंदन यानी कमाल अमरोही का पुकार का नाम. इत्तेफाक से उनके बेटे ताजदार अमरोही उन दिनों मोहर्रम के मौके पर अपने घर आए हुए थे. यह देखकर अच्छा लगा कि उस छोटे से शहर का एक-एक व्यक्ति उनसे जुड़ा हुआ था. बाद मे पता लगा कि कमाल अमरोही खुद भी हर साल मोहर्रम के मौके पर अमरोहा जरूर आते थे.

यहीं से मन में एक बात आई कि क्या यह जरूरी है कि रुपहले परदे की दुनिया में जाने के बाद कलाकार अपने आसपास से कट जाएं. अपनी जड़ों को छोड़ दें. कुछ स्टार्स के साथ मजबूरी हो सकती है, मगर बहुत से कलाकारों, लेखकों, गीतकारों के साथ मैंने एक अजीब किस्म की स्नाबरी भी देखी है. बिना नाम लिए कई उन लोगों का मैं उदाहरण देना चाहूंगा जो मुंबई में छोटा-मोटा स्ट्रगल कर रहे हैं, और बड़े सितारों के अंदाज की हास्यास्पद कोशिश करते हैं, जैसे- मैं अननोन नंबर रिसीव नहीं करता. शायद जमीन से जुड़ना हमारे सिनेमा में कहीं न कहीं एक बेहतरी जोड़ जाता.

केएल सहगल काफी मशहूर होने के बाद भी अपने शहर की उन्हीं गलियों मे जाकर वक्त बिताते थे. कहीं मैंने पढ़ा था कि बच्चे उनकी खिड़की के आगे जोर-जोर से गाना गाते हुए गुजरते- ग़म दिए मुश्तकिल, कितना नाजुक है दिल, ये न जाना, हाए-हाए ये जालिम ज़माना… लखनऊ में मेरी मुलाकात मातृभूमि के निर्देशक मनीष झा से हुई तो जब बातचीत के दौरान उन्होंने कहा- मेरा तो फिल्मों से परिचय सिनेमाहाल में मिथुन की फिल्में और सत्यजीत रे की फिल्में टीवी में देख-देखकर हुआ है, तो यह सुनकर अच्छा लगा. एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर की फिल्म देने वाले की यह बड़ी ईमानदार किस्म की स्वीकारोक्ति थी.

मुझे लगता है कि अपनी जड़ों से कटने के कारण ही कई बार लाइम-लाइट से जुड़े लोगों के भीतर एक अंधेरा घर कर लेता है. जो कई लोगों को अकेलेपन, असफलता और अवसाद की ओर ले जाता है. रात और दिन का एक गीत है- रात और दिन दिया जले, मेरे मन में फिर भी अंधियारा है..

इस रुपहले परदे के जादू ने कई लोगों के मन में इच्छाएं जगाईं और वे मन के अंधियारे में कहीं खो गए…

उनके बारे में फिर कभी….

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One Comment

  1. आपके ब्लॉग पर आना बहुत अच्छा लगा ! आशा है यहां आते रहने से हमारे बाइस्कोप संबंधी अल्प ज्ञान में इजाफा होगा !

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