Memory

दिलीप चित्रे और सेल्यूलॉयड पर लिखी उनकी एक कविता के बारे में


धीरे धीरे आओ, जैसे आता है शोक
या फुर्सत से आओ जैसे आती है दर्द की याद
जो सुन्न हुए दर्द से भी गहरी यातना देती है

दिलीप चित्रे की कविता ‘धीरे धीरे’ से
लिखना तभी सार्थक होता है जब तक कि वह एक विवशता न बन जाए। मैं काम करते, सड़कों पर चलते, सिनेमा देखते, अपने दोनों बेटों के साथ खेलते या फिर कुछ पढ़ते हुए हमेशा इस प्रार्थना में रहता हूं कि यह विवशता गाहे-बगाहे मुझे घेरती रहे। जिंदगी कभी इतनी आसान न बने कि मैं खुद से सवाल न कर सकूं। इतनी आसान न बने कि मैं किसी पल खुद को ठगा हुआ सा न महसूस करूं।

ब्लाग पर लंबे समय बाद लौट रहा हूं। इस बीच काफी कुछ बदल गया। मैं भारत के गहरे नीले आसमान वाले यूटोपियन शहर बैंगलोर से धूल की धुंध से ढकी डायस्टोपियन सिटी कानपुर में आ गया। रहने का ठिकाना बदला। काम बदला। इस बीच कई बार लिखने का मन हुआ मगर मन में कुछ उमड़-घुमड़ कर रह गया। मित्रों की शिकायतें- नियमित क्यों नहीं लिखते? मुंबई में बोधिसत्व ने भी कहा… दस दिसंबर की शाम को। ठीक उसी दिन मराठी और अंग्रेजी के कवि दिलीप चित्रे का निधन हो गया।

मुझे यह बात देर से पता लगी।

मैं दिलीप चित्रे के बारे में ‘इंडियन बाइस्कोप’ में लंबे समय से कुछ लिखना चाहता था। वे उन गिने-चुने रचनाकारों में से एक थे जिनकी जहां-तहां बिखरी, छिटपुट अनुदित कविताओं में मेरे रचनाकर्म को गहरे प्रभावित किया। मगर मैं अपने ब्लाग में उनकी हिन्दी फिल्म के बारे में लिखना चाहता था। ‘गोदाम’ जिसे शायद बहुत कम लोगों ने देखा होगा या उसके बारे में जानते होंगे।

‘गोदाम’ फिल्म दरअसल सेल्युलायड पर रची गई एक लंबी, एब्सर्ड और उदास कर देने वाली कविता थी। अर्सा पहले देखी गई इस फिल्म की सबसे खास बात जो मुझे याद रह गई वह यह कि इसके फोटोग्राफर अब के जाने-माने निर्देशक गोविंद निहलाणी थे। दोनों गहरे मित्र रहे होंगे। निहलाणी ने अपनी फिल्म ‘अर्धसत्य’ में दिलीप चित्रे की कविताओं का बहुत सुंदर इस्तेमाल किया है। वहीं चित्रे ने निहलाणी की फिल्म ‘विजेता’ लिखी थी। सिनेमा के प्रति गहरी रुचि रखने के बावजूद वे अपने पूरे जीवन में सिर्फ एक पूरी लंबाई की फिल्म ‘गोदाम’ बना सके।

1983 में प्रदर्शित इस फिल्म में जहां तक मझे याद है कि कुल तीन पात्र थे। दो मुख्य पुरुष किरदारों को सत्यदेव दूबे और केके रैना जैसे दिग्गज कलाकारों ने अभिनीत किया था, फिल्म की तीसरी किरदार पूरी फिल्म में लगभग खामोश रहने वाली, मासूम सी लड़की तृप्ति थी, जो उसके बाद किसी फिल्म में नहीं दिखी।

फिल्म में संवाद बहुत कम थे। पूरी फिल्म किसी रेगिस्तानी वीराने में शूट की गई थी। शादी से भागी हुई एक लड़की बहुत बड़े, सुनसान गोदाम में छुप जाती है। जो दुनिया की आबादी से कटा हुआ है। गोदाम की देखभाल के लिए वहां सत्यदेव दूबे और केके रैना हैं। रैना लड़की के छुपने में मदद करते हैं। इसके बाद यह फिल्म अद्भुत दृश्यों और कैमरा मूवमेंट्स का कोलाज रचती है। यह वीराने में तीन चरित्रों के बीच पनपते संशय, प्रेम और ईर्ष्या को सिनेमा की छवियों के माध्यम से अंकित करती जाती है।

फिल्म में गोदाम के भीतर झूला झूलती लड़की के दौरान कैमरा मूवमेंट और रैना तथा लड़की के बीच शारीरिक प्रेम के दृश्य अद्भुत हैं। मैं इस फिल्म को पूरा नहीं देख सका मगर यह मेरी स्मृति में आज तक अंकित है। यह फिल्म दरअसल दिलीप चित्रे की सिनेमा जैसे माध्यम पर गहरी समझ का एक उदाहरण भी है। यह फिल्म मुझे आज भी किसी यूरोपियन एब्सर्ड नाटक की याद दिलाती है। समय के अंधेरे में पेंडुलम की तरह डोलते चरित्र….

मैं इस फिल्म पर विस्तार से लिखना चाहता था। बैंगलोर रहने के दौरान ही दिलीप चित्रे मुझे फेसबुक पर दिखे और हम एक-दूसरे के नेटवर्क में आ गए। एक दिन उन्हें लाइव देखा तो संक्षिप्त सी ऑनलाइन बातचीत भी हुई। मैंने उनसे गोदाम फिल्म पर ऑनलाइन बातचीत के लिए वक्त मांगा और उनकी तरफ से हामी भी हो गई। मगर मेरी तमाम अधूरी मुलाकातों में वह फेसबुक की मुलाकात भी शामिल हो गई।

मैं अभी तक, इसे लिखने तक उनके फेसबुक पेज पर नहीं गया हूं। अंतर्जाल पर एक पन्ना… जो खामोश होगा।

उनकी कविताओं की आधुनिक संवेदना ने मुझे हमेशा नई रोशनी दी है। कुछ समय पहले सबद में तुषार धवल द्वारा किया गया उनकी कुछ कविताओं का अनुवाद पढ़ा था। उनमें से एक कविता को मैं उनके प्रति अपनी श्रद्धांजलि के तौर पर रखना चाहूंगा…

प्रस्तावना
छुपा कर रख दो भगोड़े विचारों को
हर कोने हर एकांत में
जहाँ रोशनी नहीं पहुँचती तुम्हें खोजने
तुम्हारे एकांत को भयानक भीड़ बनाने

छुपा कर रख दो भगोड़े विचारों को
मन के हर दरार हर तरेड में
जहाँ विचार रिस कर नहीं आते

पड़े रहो नीचे और गहरे
क्योंकि सतह वाली कोई भी चीज़ तुम्हें सहायता नहीं देगी

छुपा कर रख दो भगोड़े विचारों को
हो जाओ छविहीन और रहो एकाकी
क्योंकि तुम्हें फ़िर भी एक मौका मिल सकता है
मनुष्यों की दुनिया में उग आने का।

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7 Comments

  1. शर्म की बात है मगर मैं दिलीप चित्रे को नहीं जानता था। गोदाम फ़िल्म मैनें दो बार देखी और दोनो बार कुछ ही टुकड़े देख पाया था। देखकर मेरे मुँह से सिर्फ़ गजब शब्द निकला। क्यों निकला कारण आज भी नहीं जानता। अब तो ठीक से कुछ याद भी नहीं रह गया है फ़िल्म के बारे में।

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