Memory

भयावह समय की कल्पना

11 सितंबर के बाद अमेरिका की साइकी को समझना हो तो हाल मे आई दो फिल्मों से काफी मदद मिल सकती है, पहली डाइहार्ड फोर और दूसरी ट्रांस्फार्मर्स. इन फिल्मों में एक भयावह समय की कल्पना की गई है, जब खतरा कहीं बाहर से नहीं अपने ही बनाए सिस्टम के फेल होने का है.

फिल्म डाईहार्ड का नायक ब्रूस विलिस इस बार एलिअनेटेड नजर आता है. पहली कड़ी में जहां वह एक इमारत में फंसा था, इस पार पूरा शहर संकट में है. कंप्यूटर सिस्टम पर कब्जा करके पूरे शहर की कार्यप्रणाली को छिन्न-भिन्न कर दिया गया है. नायक हताश है, वह डरा हुआ है. वह कंप्यूटर के बारे में ज्यादा नहीं जानता मगर अपनी सहज बुद्धि पर यकीन करता है और जीतता भी है. उधर ट्रांस्फार्मर्स में हमारे आसपास की मशीनें अचानक दैत्याकार रोबोट्स में बदल जाती हैं. यह मशीनें इंसान की तरह सोचती और काम करती हैं.

ट्रांस्फार्रमर्स
दरअसल एक दिलचस्प किस्म की फंतासी है. इसे अगर जुरासिक पार्क और इंडिपेंडेंस डे के संदर्भ में देखें तो ज्यादा बेहतर विश्लेषण सामने आता है. जुरासिक पार्क अतीत में खो गए एक भय को सामने लाती है तो इंडिपेंडेंस डे भविष्य को लेकर हमारे मन में छिपे भय से खेलता है. मगर ट्रांस्फार्मर्स हमारे वर्तमान में निहित भय की संभावनाओं को टटोलता है.

यह एक कल्ट फिक्शन है. एक ऐसा फिक्शन जो आगे भी फिक्शन की संभावनाओं को जन्म देता है. मैट्रिक्स सिरीज के बाद इस फिल्म को देखना अपने आप में एक अनुभव है. यह अलग बात है कि माइकेल बे इस फिल्म को उस तरह से हमारे भावनात्मक अनुभव का हिस्सा नहीं बना सके हैं जैसे जार्ज लुकाच, स्पिलबर्ग या मैकेन्टायर बनाते हैं.

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One Comment

  1. अमरीकी समाज भयाक्रांत समाज रहा है । मशीनों के दुनिया पर कब्जेt, दुनिया का विनाश, कंप्यूाटर प्रणाली का छिन्ना भिन्न> होना । ये सब दुस्वाप्न् की तरह हैं जो अमरीकी फिल्मोंि में पेश किये जाते रहे हैं । सच कहूं तो मुझे ये सब संसाधनों का अपव्य य लगता है । ये सिनेमाई कचरा है ।

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