Memory

यूरोप का साहित्य और हमारा सिनेमा

जैसी कि चर्चा है संजय लीला भंसाली की नई फिल्म सांवरिया फ्योदोर दोस्तोएवस्की के शार्ट नावेल व्हाइट नाइट्स पर आधारित है. संयोग से यह उपन्यास मेरे पास था, और बचपन में मैंने इसके कुछ हिस्से पढ़ भी रखे थे.

मैंने उत्सुकतावश इस नावेल को दोबारा उठाया. जब दोस्तोएवस्की ने इस उपन्यास को लिखा था तो उनकी उम्र २८ साल थी. यह गहरी रूमानियत से भरी एक त्रासद प्रेम कहानी है. यह पीटर्सबर्ग में एक अकेले इनसान के बिताए गए कुछ वर्षों की कथा है. अपने प्रेमी की याद से व्यथित एक अकेली लड़की और एक अकेला इनसान. मेरी खोज जारी रही. पता चला यह उपन्यास कई ख्यात यूरोपियन निर्देशकों की प्रेरणा का स्रोत भी रहा है.

अब जरा गौर करें तो आफ बीट समझे जाने वाले संजय की प्रेरणा का स्रोत दरअसल हालीवुड नहीं बल्कि यूरोप का सिनेमा है. दिलचस्प बात यह है कि सिर्फ अपनी भाषा का साहित्य नहीं बल्कि यूरोप का साहित्य हमारे सिनेमा का बड़ा प्रेरणा स्रोत रहा है.

शुरुआत कहां से करें? मदर इंडिया से, जो महबूब की अपनी ही फिल्म औरत का रिमेक थी. और औरत बनी थी- पर्ल एस. बक के उपन्यास पर. याद करें राजकपूर का वह गीत. वो सुबह कभी तो आएगी… जी हां, फिर सुबह होगी- यह फिल्म बनी दोस्तोएवस्की के नावेल क्राइम एंड पनिशमेंट पर.

शार्लट ब्रांटी के उपन्यास जेन आयर पर दिलीप कुमार की एक शानदार फिल्म थी, संगदिल. एक डार्क मूवी. ये हवा, ये रात, ये चांदनी, तेरी इक अदा पे निसार है…. तलत महमूद का ये गीत इसी फिल्म से था. दिलीप कुमार ने इसमें शानदार अभिनय किया था. वुदरिंग हाइट्स पर बनी दिलीप कुमार और वहीदा रहमान की दिल दिया दर्द लिया.

हरमन हेस्से के उपन्यास पर बनी सिद्धार्थ में शशी कपूर अभिनय कर ही चुके हैं. थोड़े समय बाद आई राजीव कपूर की फिल्म प्रेम ग्रंथ दरअसल टामस हार्डी के उपन्यास टेस आफ डरबरविल्स पर बनी थी. ये सारी फिल्में एक खास दौर की हैं, सांवरिया से एक नई शुरुआत हो सकती है, क्या पता विश्व साहित्य के क्लासिक्स को बनाने का नया चलन निकल पड़े और इसी बहाने कुछ बेहतर फिल्में देखने को मिल जाएं….

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4 Comments

  1. बहुत बढ़िया है दिनेश जी…..
    वाकई जोरदार है, इसे स्तरीय रखने के साथ लगातार अपडेट करते रहिएगा…
    शुभकामनाएं…
    यशवंत सिंह
    भड़ास

  2. कभी इस पर भी कुछ लिखा जाए कि आज का सिनेमा कितना अभारतीय हो गया है. जिसकी विषयवस्तु, परिकल्पना, प्रस्तुति सबकुछ चाहे जितना अच्छा हो लेकिन है पूरी तरह से अभारतीय,
    आपका सिनेमा ज्ञान उत्तम है. लिखेंगे तो हम जैसे सिनेमा के अज्ञानियों को भी कुछ ज्ञान मिलेगा.

  3. दिलचस्प पोस्ट.

    ऐसी फ़िल्मों की सूची लंबी है. कुछ और ये रहीं –

    तेरे मेरे सपने, ए जे क्रोनिन के The Citadel पर बनी थी.
    बीस साल बाद आधारित थी ए सी डॉयल के The Hound of the Baskervilles पर.
    गुमनाम अगाथा क्रिस्टी के ’10 Little Niggers’ पर.
    एरिक सीगल की Love Story पर आधारित थी अँखियों के झरोखे से.
    शेखर कपूर की मासूम भी सीगल के ही Man, Woman and Child पर बनी थी.
    देव आनंद, टीना मुनीम की मनपसंद को आप शॉ के Pygmalion पर बनी मान सकते हैं, हालाँकि ये उस नाटक से ज़्यादा उस पर बनी फ़िल्म माइ फ़ेयर लेडी पर आधारित थी.
    शेक्सपियर की Comedy of Errors का रूपांतरण गुलज़ार ने दो बार किया. पहली बार दो दूनी चार में और फिर ख़ुद अपनी बनाई क्लासिक अंगूर में.
    शशि कपूर की जुनून रस्किन बॉण्ड के A Flight of Pigeons पर बनी थी.

    मुझे पूरा यक़ीन है कि और फ़िल्में भी होंगी.

    जहाँ तक बात है भंसाली द्बारा दोस्तोवस्की के उपन्यास पर फ़िल्म बनाने की, देवदास का जो हश्र उन्होंने किया उसके बाद क्या उम्मीद की जाए.

    बहरहाल, ब्लॉग का स्वागत. लिखते रहिये. एकाध सिनेमा ब्लॉग और भी हैं. न देखें हों तो देखिए, ख़ासकर प्रमोद सिंह का सिलेमा. मेरा भी एक नोट्स-टू-सेल्फ़-नुमा सिनेमाई ब्लॉग है – चित्र. कभी आइए और कुछ कहना हो तो टिपियाइये.

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