Film Review

हाइवेः आखिर हम हैं तो बॉलीवुडिया ही ना!

हाइवे का क्लाइमेक्स फिर से लिखा जाए तो?

ये इम्तियाज की कल्पनाओं से इतर हो? कुछ ऐसा हो, जो हम आज तक बॉलीवुड फिल्मों में देखते आएं हैं? आपके दिमाग से ना उलझे? कुछ दृश्यों भर का हो, सरल और स्पष्ट? कुछ ऐसा कि आप ये ना पूछें कि…..यार, ये क्या बात हुई? ये सवाल यों ही जहन में आया।

दरअसल हाइवे का क्लाइमेक्स ही ऐसा है, जो इसे आम बॉलीवुड फिल्मों से अलग कर देता है। हमारे ढांचे में नहीं है, अमीर घराने की एक बेटी सपंन्नता के खिलाफ विद्रोह करे। बंगला, गाड़ी और पैसे को जेल समझ ले। घर से दूर ठिकाना बनाकर अपने पुराने प्रेमी की यादों में ही जीवन बिताने की ठान ले।

प्रेम का ये विलुप्तप्राय स्वरूप हमारे बातचीत में एकाएक लौट कर आ जाए, ये सोच पाना थोड़ा मुश्किल लगता है। प्लेटोनिज्म पर जितनी बहस हो सकती ही, सवाल खड़े हो सकते हैं, हाइवे के खिलाफ भी वैसी बहस और उतने ही सवाल हैं। प्रेमिका अपने प्रेमी की मां भी हो सकती हैं और प्रेमी अपनी प्रेमिका का पिता भी। भावनाओं के कई रंग हैं और प्रेम के भी। दरअसल, वात्सल्य प्रेम का ही एक रूप है। लेकिन शारीरिक संसर्ग को ही हकीकत मान लेने की आपाधापी में वात्सल्यबोध नैतिक यंत्रणा की तरह लगता है। प्लेटोनिज्म की परिणति वैसी होती है, जैसे की इस्तेमाल के काबिल न रह गई चीजें।

हाइवे ने अरसे बाद इसी प्लेटोनिज्म को ढूंढ़कर, झाड़ पोंछकर हमारे सामने रख दिया है। सोशल मीडिया के जमाने मे, जबकि दोस्ती, मोहब्बत बारास्ता फेसबुक जिंदगी का अतिक्रमण कर चुके है, प्लेटोनिक लव आपको छलावा लगे तो ताज्जुब की बात नहीं होगी। एक ऐेसे दौर में जब दोस्ती और प्यार वर्चुअल हैं, जिस्मानी रिश्ते रीयल। प्यार की अंतिम परिणाति बिस्तर पर ही है। ऐसा प्यार, जिसमें जिस्मानी रिश्तों की बात ही ना की जाए, प्रेमी की मौत के बाद भी वह बिना अवलंब के जीवन जीने का मद्दा रखता हो, बेमानी लगता है। ऐसा लगता है ये कहानी हमारी नहीं है, बकवासियत भरी बतक्कड़ी है। लेकिन फिर भी, इम्तियाज अली ने ये कहानी कही है। और इस जज्बे को इसी पीढ़ी ने स्वीकार भी किया है।

हाइवे ने एक ऐसे प्रेम की कहानी कही, जो फलसफों की किताबों में ही देखी और सुनी गई। या किशोर उम्र की उमंगों में जिन्हें महसूस किया गया। एक ऐसा प्यार जिसमें महावीर भाटी और वीरा त्रिपाठी के जीवन की गांठ उनकी वेदनाएं बनी हैं। दोनों का खोया बचपन ही उनकी दोस्ती की नींव बन गया है; और एक ऐसा प्यार, जिसमें शादी की बात नहीं की गई है, सुहागरात नहीं है, बच्चे नहीं है, फिर भी प्यार है। इम्तियाज का ये प्रयोग साहसपूर्ण है, कम से कम बॉलीवुड ने इस दायरे में जाकर आज तक नहीं सोचा। सोचा हो तो बताएं?

नया फिल्मकार

किसी फिल्मकार की सफलता का पैमाना क्या हो सकता है? फिल्म की कथावस्तु और शिल्प पर बातचीत हो? फिल्म 100 करोड़ से अधिक की कमाई करे और उस पर खूब गपोड़ीगीरी हो? ये दोनों पैमाने हमारे सामने हमेशा ही रहे हैं। सुविधा मुताबिक, अलग-अलग कसौटियों पर अलग-अलग फिल्मों को कसा भी गया है। लेकिन एक फिल्मकार को तब कितने नंबर दिए जाएं, जब फिल्म की कथावस्तु पीछे छूट जाए और शिल्प पर बतकही होने लगे।

बॉलीवुडिया संस्कारों में शिल्प पर बातचीत करने की परंपरा कम ही रही है, इसलिए हमारी बतकहियों में ऐसे फिल्मकारों, शिल्प ही जिनकी पहचान रहा है, का जिक्र ऐसे किया जाता है, जैसे श्राद्ध के महीने में पुरुखे याद किए जा रहे हों। फिर भी हाइवे के बाद इम्तियाज एक ऐसे फिल्मकार के रूप में उभर कर समाने आए हैं, जिसकी फिल्म का शिल्प ऐसा है, जिस पर लंबी चर्चा की जा सकती है। फिल्म समझने वालों को हाइवे की कहानी भूल जाएगी, लेकिन इम्तियाज की फिल्मकारी याद रहेगी।

उस दृश्य की ही बात कर लें, जब महावीर ने वीरा को भाग जाने को कहा। भाटी गिरफ्त से छूट कर वीरा अपनी मौत से जान बचाकर भागी है। वीरा को ये अहसास है कि ये उसकी जिंदगी की आखिरी दौड़ है। वो भागने में कामयाब रही, तो ही महावीर भाटी के चंगुल से निकल पाएगी। इम्तियाज ने इस दृश्य को पर्दे पर जैसे उतारा है, वाकई में मौत से भाग रही उस लड़की की मनोभावों को जीवंत करने में वो कामयाब रहा है। ये दृश्य अतियथार्थ के अधिक करीब है। घुप्प अंधेरे में, जहां आसमान और धरती एक दूसरे से मिलते हुए लग रहे हैं, वहां तक की दौड़ वीरा के लिए वैसी है, जैसे धरती के एक छोर से दूसरे छोर तक दौड़ लगानी हो। एक छोर पर उसका घर है दूसरे छोर पर महावीर भाटी।

कैथार्सिस इम्तियाज की फिल्म के नदी के किनारे की तरह है। एक किनारे पर कुंठाएं है, क्षोभ और पीड़ा है दूसरे पर कैथार्सिस। इम्तियाज की कहानी इन दो किनारों के बीच ही चलती है। हाइवे में कैथार्सिस के दो दृश्य हैं और दोनों फिल्म के दो कंधे। इन कंधो के सहारे ही इम्तियाज हाइवे का सफर पूरा कर दिया है। कैमरे के क्लोज फ्रेम में वीरा त्रिपाठी का चेहरा और पृष्ठभूमि में महावीर की धुंधली छवि। एक ऐसा दृश्य, जहां सबकुछ स्थिर है, केवल चेहरे के भाव बदल रहे है, बातों की पीड़ा और संवेग के साथ।

वीरा की बातों में शुक्ला अंकल हैं, घर के भीतर का शोषण है, खुद से होने वाली चिढ़ है और उसकी पृष्ठभूमि में धुंधलके में बदल रहा महावीर के चेहरे की रंग है। कैथार्सिस के दृश्य और कैमरे का ये प्रयोग, दोनों ने इम्तियाज को एक नए किस्म के निर्देशक के रूप में पेश किया है। इम्तियाज ने महावीर भाटी की पीड़ा के विरेचन के लिए भी अनोखा प्रयोग किया है। एक कांट्रेक्ट किलर, वीरा के सपनों से सहम गया है। वह रो रहा है, छिपकर रो रहा है, हाथों से चेहरा छिपाकर रो रहा है, आसुंओं को धुल-धुल कर रो रहा है और खूब रो रहा है। फूट-फूट कर रो रहा है। दो पृष्ठभूमि, दो व्यक्तित्व, दो व्यक्ति, लेकिन पीड़ाएं एक जैसी।

…यही है इम्तियाज का हाइवे

फिर भी इम्तियाज का हाइवे केवल उनका नहीं है। इस फिल्म के बारे में एक बात और कही जा सकती है। किसी कहानी का एक अंत होता है। हाइवे के कई अंत है। हालांकि फिल्म की बुनावट में कई धागे यों छूट गए हैं कि उनके सिरे पकड़कर आप अपना अंत बुन लें। हाइवे की यही खूबसूरती है; ये फिल्म कुछ हिस्सें में आपको इम्तियाज अली की कहानी लगती है और कुछ हिस्सो में अपनी।

इम्तियाज की किस्सागोई कुछ ऐसी है की उन्होंने कहानी की जमीन भर तैयार की है। बीच की इमारत, खिड़कियां, दरवाजे और छत कैसी तैयार होगी, वो जिम्मा उन्होंने आपको सौंप दिया है। हालांकि पूरी फिल्म मेंइम्तियाज आपके साथ है, लेकिन एक किस्सागो की तरह नहीं गाइड की तरह। हाइवे का गाइड; वह कस्बो की तंग सड़कों से गुजरता है, जहां दीवारों पर सुर्ख, नीले, हरे रंगो में खूबसूरत चित्र बने हैं; शहरों से गुजरता है, जहां जिंदगी बेधड़क भाग रही है; खेतों, पहाड़ों से गुजरता है; झरनों और बर्फ को करीब से देखता है। जिन झरनों के पानी की धमधम आप भी सुनते हैं; और जिसकी बर्फ उछलकर आपके चेहरे पर भी चिपक जाती है।

एक किस्सागो, जो आपके बगल में बैठा रहता है और आपसे पूछकर कहानी बुनता चलता है। वो हमारे दीमाग के कई फ्रेम तोडता-फोड़ता भी है। हमारे दिमाग फ्रेम ही फ्रेम हैं। प्यार के फ्रेम हैं, नफरत के फ्रेम हैं; चूमना कैसे है, हमने सोच रखा है। तमाचा कैसे लगाना है, हमने सोच रखा है। ट्रक की सीट पर बैठने और कप से चाय पीने के तरीके का फ्रेम भी हमारे जहन पैबस्त है। इससे इतर करने की सोचना ही मुश्किल है। कर डालना तो बिलकुल असंभव।

लेकिन इम्तियाज अली हाइवे के पूरे सफर में तोड़ते-फोड़ते, तहस-नहस करते चलते रहते हैं। सड़कों पर ट्रक तो आखिर ऐसे ही दौड़ते हैं ना?

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