Comics/Pulp

ग्राफिक नॉवेलः नए ज़माने की नई किताबें

नोएडा में गेमिंग स्टूडियो चलाने वाले फैजल ने खुद को टेंशन फ्री रखने के लिए एक कैरेक्टर रचा गुड्डू- जो उनके अपने बचपन की तस्वीर थी। फैजल कार्टून बनाते और फेसबुक पर दोस्तों के बीच शेयर करते। यह इतना लोकप्रिय हुआ कि फैजल ने इसका एक फेसबुक पेज बनाया ‘गारबेज बिन’। पहले महीने दो लाइक्स हुए। इसके बाद जो हुआ वह कम से कम भारतीय फेसबुक के लिए तो इतिहास है।

आज ‘गारबेज बिन’ के छह लाख से ज्यादा लाइक्स हैं और हर पोस्ट को हजारों लाइक्स और सैकड़ों शेयर व कमेंट्स मिलते हैं। इसके बाद फैजल की पहली किताब आई ‘गारबेज बिन (वाल्यूम वन)’ जो जबरदस्त बिकी।

अब न सिर्फ अगली किताब की तैयारी है बल्कि इस कैरेक्टर पर आधारित ऐप्लीकेशन और मर्चेंडाइज भी बाजार में आ रहे हैं। फैजल की कहानी बताती है कि किताबें लोग (खासकर नई पीढ़ी) आज भी पढ़ रहे हैं बस उनका स्वरूप बदल गया है।

फरवरी में दिल्ली में हुए कॉमिक कॉन में इस बदलाव की झलक साफ देखी जा सकती है। वक्त की कमी के कारण अब चित्रकथाएं बच्चों के बीच से निकलकर बड़ों की दुनिया में जगह बना रही हैं। ग्राफिक नॉवेल एक नया ट्रेंड है।

आक्यूपाइ वॉल स्ट्रीट और इंटरनेट सेंसरशिप के खिलाफ आंदोलनों में नजर आने मुखौटे तो आपको याद ही होंगे। कॉमिक कॉन इंडिया में ‘वी फॉर वेंडेटा’ ग्राफिक नॉवेल से पॉपुलर इस चरित्र के रचयिता डेविड लॉयड से ऑटोग्राफ लेने वालों की लंबी लाइन लगी थी। सारनाथ बैनर्जी ने सन 2004 में पहला गंभीर ग्राफिक नावेल लिखकर भारत में एक नई परंपरा की शुरुआत की थी।

इसके बाद मानता रॉय, विश्वज्योति घोष और शमिक दासगुप्ता जैसे नाम सामने आए। भारतीय मिथकों को इंटरनेशनल बाजार में बेचने की एक गंभीर कोशिश फिल्म निर्देशक शेखर कपूर और दीपक चोपड़ा ने भी जानेमाने व्यावसायी रिचर्ड ब्रानसन के साथ की थी।

कुछ असहमतियों के चलते वे अलग हो गए और लिक्विड कॉमिक्स के नाम से अलग प्रकाशन शुरु किया जो रामायण व पंचतंत्र की कहानियों के अलावा साधु और स्नेक वुमेन जैसी भारतीय कहानियों के लिए विदेशी बाजार में जगह तलाश रहा है।

ऊपरी तौर पर हल्के-फुल्के दिखने वाले ग्राफिक नावेलों में गहरे राजनीतिक निहितार्थ भी हैं। ईरान की मारिजेन सत्रापी ने जब ‘परसेपोलिस’ नाम से अपनी ग्राफिक आत्मकथा लिखी तो ईरानी शासन की त्योरियां चढ़ गईं। लेबनान युद्ध की स्मृतियों में रची-बसी ‘वाल्ट्ज विथ बशीर’ अपने में एक दस्तावेज है। ‘वी फॉर वेंडेटा’ के बारे में सभी जानते हैं कि यह फासीवाद और तानाशाही के खिलाफ एक सशक्त रचना है।

फिल्मों पर भी इन नए दौर की किताबों का असर पड़ा है। सैफ अली खान ने जब अपनी महत्वाकांक्षी फिल्म ‘एजेंट विनोद’ रिलीज की तो एक ग्राफिक नॉवेल भी बाजार में उतारा, जिसकी भूमिका श्रीराम राघवन ने लिखी। वहीं ‘तेरे बिन लादेन’ के निर्देशक अभिषेक शर्मा ने बीते साल ‘मंकीमैन’ के नाम से एक ग्राफिक नावेल लिखा, जिस पर वे फिल्म बनाना चाहते हैं।

कॉमिक कॉन के आयोजक जतिन वर्मा करते हैं कि पब्लिकेशन के काम में धैर्य चाहिए। कैंपफायर ने ग्राफिक नावेल छापने शुरु किए और पांच साल बाद वे अपने मुकाम तक पहुंच सके हैं। पाठकों तक पहुंचना आसान नहीं है। यही वजह है कि कॉमिक कॉन जैसे आयोजनों की जरूरत पढ़ती है, जहां लोग आएं, लेखकों से मिलें, उनसे चर्चा करें।

जतिन का मानना है कि फ्लिपकॉर्ट जैसे प्लेटफार्म के कारण पाठकों तक पहुंचना आसान हुआ है। इस जॅनर में अब हिन्दी के लेखक भी दिलचस्पी दिखा रहे हैं। इंटनरेट पर छिटपुट प्रयास नजर आते हैं। उम्मीद है जल्दी ही हम एक ऐसे दौर से रू-ब-रू होंगे जब किताबें नए रंग-ढंग में पाठकों से बात करेंगी।

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