Film Review

गली बॉयः अभी कुछ और ‘गैर अभिजात्य’ कहानियां कही जानी बाकी हैं…

तो जोया ने बदल लिया स्टाइल अपना
कहानी न अमीरों, न कोई फलसफ़ा
मुफलिसी में जीने वालों का है ये सपना

रैप तो बहाना है, किस्सा ये पुराना है
‘स्लमडॉग मिलयनॉयर’ हो या फिर हो ‘रॉकी’
याद करो उनकी कहानी कैसे दिल को छूती 
गली बॉय भी है इक अंडरडॉग अंडरडॉग

जिंदगी ये सच्ची है, लोकेशन भी अच्छी है 
हीरो इसका मुझे लगा थोड़ा फिसड्डी है
किरदार उसका जोया क्यूँ फ्लैट है बनाया
बाकी छोटे किरदारों ने है फिल्म को सजाया
ये सारे भी हैं अंडरडॉग अंडरडॉग

सिद्धांत शेर बन दहाड़ा, 
विजय राज क्या खूब बना बाप
आलिया बिल्ली सी चिबिल्ली, खूंखार भी
कल्कि भी मुकाबले में ठीक-ठाक रही
पर विजय वर्मा ने भाया, खूब रंग जमाया
ग्रे-शेड कैरेक्टर का कैसा तड़का लगाया
जोया-रीमा की स्क्रिप्ट थी कड़क 
पर एबरप्ट एंड किया बेड़ा गरक 🙂

खैर, उपर लिखे को खिलवाड़ कहें या मजाक.. .फिल्म के रिव्यू के लिये तो इतना काफी है। मैं इस फिल्म के बहाने दो जरूरी बातें करना चाहता हूँ। सबसे पहले- हमारे यहां एक शब्द चला था अप-संस्कृति। यानी कुछ ऐसा जो शिष्ट वर्ग के मनोनुकूल न हो, मुख्यधारा से मेल न खाता हो। हमारा सुसंस्कृत और बुद्धिजीवी वर्ग भी अप-संस्कृति पर नाक-भौं चढ़ाता था।

जब मैं छोटा था और सत्तर के दशक के उत्तरार्ध में न इंटरनेट था न टेलीविजन तो भी इलाहाबाद के घरों में पॉप सिंगर्स ABBA, Bruce Springsteen और The Rolling Stone के पोस्टर घरों में दिखते थे और सिनेमाघरों में फिल्म शुरू होने से पहले “Trance Europe express…” गीत बजा करता था। जिसके बारे में मैंने कुछ साल इंटरनेट पर खोजा। संगीत की एक ग्लोबल अपील होती है। 1992 में अल्जीरिया के सिंगर खालेद का “दीदी-दीदी” गीत गोरखपुर की सड़कों से गुजरते सुनाई दे जाता था तो कुछ साल पहले पाकिस्तान के हसन जहांगीर भी की भी धूम मची थी।

सत्तर के दशक में अमेरिका का हिप-हॉप कल्चर अरबन ब्लैक और लैटिनो यूथ की आवाज बना और धीरे-धीरे सारी दुनिया में हाशिये पर रहने वाले दबे-कुचले लोगों की आवाज बन गया। यह हर जगह फैल गया। फैशन से लेकर स्ट्रीट आर्ट तक। रैप सांग उसी हिप-हॉप कल्चर का हिस्सा है। एक रिदमिक लय में कही जाने वाली कविता, जिसमें प्रतिरोध का स्वर है। भारत में बाबा सहगल रैप लेकर आया। उसकी टोन में एब्सर्डिटी और व्यंग था- मगर कोई कांटेक्स्ट न होने के कारण वह जल्दी ही खत्म हो गया।

तो शुरू में एलीट क्लास, बाद में मिडिल क्लास से होते हुए इस कल्चर (या अप-संसकृति?) ने लोअर मिडिल क्लास को अपनी गिरफ्त में ले लिया। पर नेज़ी उर्फ नावेद शेख और डिवाइन उर्फ विवियन फर्नांडीस जिनकी प्रेरणा से यह फिल्म बनी है वे गलियों के गुमनाम से हीरो हैं। वे मुख्यधारा मीडिया या किसी टीवी रियलिटी शो के नायक नहीं हैं। यहीं पर ‘गली बॉय’ फिल्म अहम हो जाती है। वह धूल, अंधेरे और पसीने में डूबी एक दुनिया की कहानी लेकर आती है।

तो दूसरी बात यहां से शुरू होती है। सिनेमा के पर्दे पर निम्न मध्यवर्ग की कहानियां बहुत कम कही गई थीं। पिछले कुछ सालों में आई फिल्मों में इस दुनिया की कहानियां अपने पूरे रंग और अहसास के साथ आई हैं। ‘सुई-धागा’, ‘बधाई हो’ और ‘गली बॉय’ में ऐसी ही कहानियां हैं। ये हाशिये के लोगों की भी कहानियां हैं और हमारे देश में लाखों-करोड़ों लोग हाशिये पर हैं। अच्छी बात है कि उनकी कहानियां कही जा रही हैं।

‘गली बॉय’ का संगीत न तो बहुत महान है न कुछ साल बाद लोगों को याद रह जाएगा। फिल्म में कांफ्लिक्ट भी बहुत कम है। घटनायें एक सरल रेखा सी आगे बढ़ती जाती हैं। रैप सांग में भी जोया अख़्तर विविधता नहीं ला सकी हैं। क्लाइमेक्स भी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरता, हालांकि ‘फ्लैश डांस’ या ‘डर्टी डांसिंग’ के क्लाइमेक्स की याद दिलाता है। इसके बावजूद अगर यह फिल्म पसंद आती है तो इसलिए कि बहुत मीठा खाकर अगर आप अघा गये हों तो सिर्फ एक हरी मिर्च का तीखापन भी भाता है।

पिछले दिनों मैंने बिहार में सांभा जी भगत को सुना था। वे मराठी लोक कलाकार हैं। वे हाशिये के कलाकार हैं। खुद ही गीतकार हैं, खुद गायक, खुद ही प्रस्तोता और संगीतकार। वे भारत के दलित विमर्श का अहम चेहरा हैं। एक वामपंथी कार्यकर्ता से शुरू होकर आज वे भारत में जाति प्रथा के उन्मूलन और ब्राह‍म्णवाद के खिलाफ गीत गाते हैं। हजारों की भीड़ उनका ओजपूर्ण गीत सुनती है। बोल होते हैं- “घड़ी-घड़ी-घड़ी-घड़ी लफड़ा काय को रे, ये लोचा काय को रे, झोपड़े में झंझट झमेला काय को रे”

हिन्दी स्क्रीन पर कुछ और ‘गैर अभिजात्य’ कहानियां कही जानी बाकी हैं…

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