Film Review

एक-दूसरे में खु़द के वजूद को झांकते दो मुसाफिर

हर उस पल जब हम अपनी तेज़ रफ़्तार ज़िंदगियों की बारीक़ बुनावटों और सिलवटों पर लगभग बिना कोई ध्यान दिए बदहवास से उनसे गुज़र रहे होते हैं, उस एक—एक पल में हमारे इर्द—गिर्द बहुत सी ज़िंदगियां बेहद ख़ामोशी से इतने भिन्न स्तरों पर इतने अलग-अलग आकार ले रही होती हैं कि अगर हम उन सबको अलग—अलग दुनियाओं के हिस्से कह कर पुकारें तो भी शायद हम उस फ़र्क़ का ठीक-ठीक वर्णन न कर सकें जो उनमें से हर एक के संसार के चारों तरफ़ ऐसे अदृश्य घेरे खड़े करते हैं जिसे भेदना तो दूर, जिसके पार के संसार का ज़रा सा आभास किए बिना ही उनमें से कई अपनी इस यात्रा के अंत तक उसी ख़ामोशी से पहुंच जाती हैं!

मोटे तौर पर ‘हाइवे’ ऐसे ही दो अलग ब्रह्मांडों में चुपचाप बसर करती आई दो ज़िंदगियों की बानगी कहती है, जिनमें से एक की ‘मिडनाइट एडवेंचर’ की ख़्वाहिशों से दूसरी की ‘मिडनाइट रॉबरी’ की ज़रूरतों का अचानक हुआ टकराव उनके मध्य सदियों से खड़ी सारी कांच की अदृश्य, अभेद्य दीवारों को एक झटके में ढहा देता है और उन दोनों को एक ऐसे सफ़र के मुहाने पर ला कर खड़ा कर देता है जिसकी न मंज़िल तय है न राह, लेकिन जो बेरास्ता, बेमंज़िल सफ़र उन्हें एक दूसरे की नज़र में झांक कर अपने-अपने अर्थों को तलाश करने के रास्तों तक पहुंचाता है, और इस पूरी कवायद में ही फिल्म का वह अर्थ छिपा है जिसे न तो शब्दों में लिखा जा सकता है न ही पढ़ कर समझा- इससे आप सिर्फ एकाकार हो सकते हैं स्वयं इस सफ़र का हिस्सा बन कर!

एक दुनिया है अपने अब तक के जीवन को फ्रिज में रखी एक नाज़ुक आइसक्रीम की तरह तमाम फिक्र—ओ—ग़म से दूर रह कर जीती आई एक बीस—बाइस बरस की लड़की की, जिसे अंदर ही अंदर अपने अत्यधिक धनवान व रसूखदार घराने में उपलब्ध घुटी सी आज़ादी, जो दकियानूसी प्रथाओं व होंठों पर ज़बर्दस्ती चिपकाई गई मुस्कान की तहों में लिपटी है, एक क़ैद की तरह मालूम होती है. इस दुनिया में महसूस होती तमाम घुटन के बावजूद यह लड़की इसकी क़ैद से आज़ाद होने को ‘अंतिम पग’ उठाने लायक हिम्मत जुटाने में अपना ‘कम्फर्ट ज़ोन’ खो जाने और अब तक ‘अनदेखी—अनजानी बाहरी दुनिया’ के डर के दबाव तले ख़ुद को नाक़ाम पाती रही है, लेकिन एक अजीबोग़रीब सा हादसा उसे मजबूर कर देता है कि अपनी सुरक्षि‍त दुनिया की हदों से बाहर की जिस दुनिया का हिस्सा बनने के लिए वह अपना घर छोड़ कर भाग जाने की इच्छा रखा करती थी कभी, उस दुनिया से वह एक ट्रक ड्राइवर से ‘हाइवे रॉबर’ बने इंसान के साथ-साथ रूबरू हो, दिन-रात, दौड़ते-भागते एक ‘हाइवे’ की हिचकोले देती सड़कों पर. दूसरी तरफ वह ट्रक ड्राइवर जिस अंधेरी और नैराश्य से भरी दुनिया से आता है उसके घने और लंबे अंधेरों में यह लड़की उसी अचानक घटी घटना के बाद रोशनी के एक बारीक से सूराख के ज़रिए घुसपैठ करती है, और उसे उसके अपने संसार के सीलन भरे उन कोनों से परिचित करवाती है जिन तक पहुंचने की हिम्मत जुटा पाना उसके लिए कभी संभव नहीं रहा.

दो बिल्कुल अलग परिवेशों से आए लोगों के मध्य उपजे संबंधों की कहानी यूं तो कई बार कही-सुनी जा चुकी है, लेकिन अपने-अपने बचपन में भोगे गए नितांत निजी और एकाकी लेकिन बेहद स्याह, घुटन भरे और कड़वे अतीत की कड़ी से आपस में जुड़ते यह दोनों इंसान इस सफ़र में न सिर्फ बिना कारण या गंतव्य जाने यूं ही कहीं भी बेसबब निकल पड़ने की निरर्थकता में उस अर्थ को खोज लेते है जो व्यावहारिकता की परिभाषाओं से कहीं परे है, बल्कि अपने वजूद की गहराइयों का भी वे एक-दूसरे की मदद से परत-दर-परत आविष्कार करते हैं, आविष्कार इसलिए कि इससे पहले उसके होने या न होने की कल्पनाओं से कहीं परे खड़े थे वे दोनों ही!

‘स्टूडेंट ऑफ द इयर’ जैसी विशुद्ध आधुनिक ‘मल्टीप्लेक्स मसाला फिल्म’ से अभिनय जगत में पदार्पण करने वाली आलिया भट्ट इस दूसरी ही फिल्म में अपनी हतप्रभ कर देने वाली नैसर्गिकता से हतप्रभ भी करती हैं और भविष्य के लिए आशाएं भी जगाती हैं. रणदीप हुड्डा के लिए हालांकि इस फिल्म में साबित करने को काफी कुछ था, लेकिन अपने चेहरे-मोहरे और हाव-भाव की सीमित क्षमताओं के चलते वे उतना अधिक प्रभावित नहीं करते जितना कर सकते थे. संगीत के मामले में इम्तियाज़ अली की जब वी मेट, लव आज कल और रॉकस्टार जैसी पिछली सभी फिल्मों के मुक़ाबले ‘हाइवे’ कुछ कमज़ोर है और शायद इसका असाधारण फॉर्मेट इससे अधिक की इजाज़त भी नहीं देता था उन्हें, और ख़ुद इम्तियाज़ हमेशा की तरह ही पेशकश की ताज़गी और दर्शन की नवीनता के साथ खड़े एक अनूठा किस्सा बयान करते हैं आपसे यहां भी.

फिर भी, अपनी तमाम अच्छाइयों के बाद भी ‘हाइवे’ में एक ख़ामी जो खटकती है वह यह है कि वीरा त्रिपाठी और महाबीर भाटी नाम के अपने इन दोनों ही केन्द्रीय किरदारों से इम्तियाज़ आपका तार्रूफ़ उस गहराई से नहीं करवा पाते कि आप उनकी तक़लीफ़ को उनके अंदर खड़े होकर उसी बारीक़ी और घुटन के साथ महसूस कर सकें जिसके साथ वे उससे गुज़र रहे हैं, और तमाम कोशिश के बाद भी आप खुद को इसकी वजह यह मानने से नहीं रोक पाते कि कहीं न कहीं इम्तियाज़ ने ही इस बार अपने इन दोनों मुसाफिरों के साथ उतना लंबा फासला तय नहीं किया जितना वे दोनों एक दूसरे के साथ कर गए, एक पुराने ट्रक के ज़रिए ‘हाइवे’ पर दर्ज किए गए इस अनोखे से सफ़र के दौरान!

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