Film Review

एक सफर चाहिए, हमसफर के लिए…

“मैं किडनैप हुई थी… लेकिन ऐसा लग रहा था वहां ज्यादा आजाद हूं. यहां घर पर हूं अपने लोगों के बीच हूं…लेकिन ऐसा लग रहा कि कैद हूं…”

वीरा अपनी वर्षों की चुप्पी तोड़ती है. अचानक… और अपने अंदर के दबे उस सच को सामने लाती है. जिसे वर्षों से दबाया जा रहा था. वह अपने परिवार वालों के बीच ही महफूज नहीं. नौ साल की वीरा का बचपन उसके चाचा बर्बाद कर देते हैं.

इम्तियाज अली की फिल्म हाइवे के अंतिम दृश्य दर्शक को यह सोचने पर मजबूर कर देंगे कि हाइवे कोई रोड ट्रीप फिल्म नहीं और न ही सिर्फ एक प्रेम कहानी है. यह एक ऐसी मासूम लड़की की भी कहानी है, जिसे चांदी की कटोरी मिली है लेकिन कोई ऐसा साथी नहीं मिला, जिससे वह अपने मन की बातें शेयर कर सकें. यहां तक कि माता-पिता भी नहीं.

वीरा की शादी हो रही है. लेकिन उसे कुछ नहीं चाहिए सिर्फ ताजी हवा चाहिए. ताजी हवा की तलाश में वह हाइवे पर आ पहुंचती है और उसका अपहरण हो जाता है. अपहरणकर्ता महावीर उसके साथ बदसलूकी से पेश आता है. लेकिन वह उसे शारीरिक रूप से कोई नुकसान पहुंचाने की कोशिश नहीं करता. जब उसके ही गैंग का एक व्यक्ति वीरा की मासूमियत का फायदा उठाना चाहता है. लेकिन महावीर उसे बचाता है. वीरा तब तक दुखी है. जब तक वह अंधेरे में बंद है. खुले में आकर उसे अच्छा लगता है. वहां की चाय, चेहरे पर लगा नमक का एक कण भी उसे रोमांचित कर रहा है. उसे मौके मिलते हैं लेकिन वह भागना नहीं चाहती. वह फिर से उस कैद की दुनिया में लौटना नहीं चाहती.

सफर के ही क्रम में वह अपने साथ हुए यौन शोषण का दर्द महावीर से बांटती है. वह महावीर को नहीं जानती और वह यह भी नहीं जानती थी उस वक्त तक कि महावीर उसकी कोई मदद करेगा या नहीं. महावीर बातों से बदतमीज है.उसे अमीरों से चिढ़ है. …लेकिन वह उसे कभी गलत नजर से नहीं देखता. बल्कि अपने साथी के दुर्वव्यवहार पर आवाज उठाता है.

इम्तियाज ने अपनी इस फिल्म में पुरुषों की मानसिकता के तीन चेहरे दिखाने की कोशिश की है कि हर आदमी एक सा नहीं होता. जिनकी बातों में तमीज नहीं, लेकिन आंखों में तमीज हैं. और कई ऐसे चेहरे हैं जो तमीजदार का मुखौटा तो पहने रहते हैं. लेकिन उनके अंदर एक शैतान है. और हमारे आस पास की दुनिया में तमीजदार और ब्रांडेड बातें करनेवालों की कमी नहीं.

इम्तियाज अपनी फिल्मों में सफर को एक अहम किरदार के रूप में चुनते हैं. हाइवे उनकी फिल्ममेकिंग के अगले सफर का एक पड़ाव है, जिसमें वह दो अनजान से लोगों को एक दूसरे का साथी बनाने की कोशिश करते हैं. यह सफर आम हिंदी फिल्मों की तरह सिर्फ खूबसूरत लोकेशन की सैर नहीं करवाता. बल्कि एक लड़की की स्वछंद सोच को खुली फिजाओं में रंग भरने का मौका देता है. यह वीरा और महावीर दोनों को ही कैद से मुक्त करता है. अपने अंदर छिपे उस दर्द के कैद से. जिसे वे अब तक किसी से साझा नहीं कर पाये थे.

वीरा महावीर की जिंदगी के दर्द से वाकिफ नहीं लेकिन वादा कर बैठती है कि वह उसे अपने गांव जरूर भेजेगी. वीरा और महावीर कुछ प्लान नहीं करते. बस जिंदगी को जीते चले जाते हैं. महावीर वीरा से प्यार में मरने जीने की कसमें नहीं खाता. वह तो अपने मन की बात वीरा तक पहुंचा भी नहीं पाता. बस उसकी सारी छोटी छोटी खुशियों को पूरा कर देता है.

वीरा चाहती थी कि पहाड़ पर उसका एक मिट्टी का घर हो. और बस महावीर उसकी वही ख्वाहिश पूरी करने की कोशिश करता है. चूंकि वीरा को जिंदगी में कुछ नहीं बस यही छोटी सी खुशी चाहिए थी. हाइवे की खूबसूरती वीरा और महावीर की दोस्ती, और उनकी मासूमियत की ही दास्तां है.

इम्तियाज अपने फिल्मों के किरदार और उनके बीच पनपे प्रेम को लेकर हमेशा कंफ्यूजन में रहते हैं.लेकिन हाइवे में उन्होंने प्यार को नयी परिभाषा देने की कोशिश की है. वीरा और महावीर प्यार को लेकर कंफ्यूज नहीं हैं. बस वे जिंदगी को वाकई में जीना चाहते हैं. खुली हवा में सांस लेना चाहते हैं.

आलिया ने एक बेहतरीन फिल्म का चुनाव किया है. वीरा के बहाने आलिया ने भी उस ताजा हवा में सांस लेने की कोशिश की है. खुद आलिया ने बताया कि उन्होंने कभी इस रूप में भारत को नहीं देखा था.  इस फिल्म से उन्होंने साबित कर दिया कि हां, वह आनेवाले समय में बेहतरीन अभिनेत्री के रूप में उभरेंगी. इम्तियाज ने आलिया से कुछ भी अतिरिक्त कराने की कोशिश नहीं की है. उन्होंने आलिया को समझते हुए ही वीरा को रचा है.

हाइवे की वीरा अपनी उम्र के मुताबिक ही बातें और हरकते करती है. पॉप म्यूजिक सुनते ही वह पहाड़ों के बीच भी नाचने लगती है. महावीर को बाबा और बेबी कह कर बुलाती है. इम्तियाज की पारखी नजर सराहनीय है. जो उन्होंने रणदीप और आलिया की अनयुजल सी जोड़ी चुनी. रणदीप से बेहतरीन महावीर का किरदार कोई नहीं निभा सकता. महावीर को फिल्म में संवाद कम मिले हैं. लेकिन उनके चेहरे के हाव भाव ही आकर्षित करते हैं.

इम्तियाज ने फिर साबित कर दिया है कि भले ही लोग उनसे एक-सी लगने वाली प्रेम कहानी दिखाने की शिकायत करते रहें. वे अपने अंदाज में एक सी दिखनेवाली प्रेम कहानी में अलग-अलग कलेवर में रंग भरते रहेंगे.

आलिया के ही पिता महेश भट्ट की फिल्म का गीत है…बस एक सनम चाहिए आशिकी के लिए…दरअसल, इम्तियाज की हाइवे का सार मेरी नजर में यही है- बस एक सफर चाहिए, हमसफर के लिए.

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