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रजत कपूर से एक मुलाकात


रजत कपूर ने बतौर अभिनेता सबसे पहले मेरा ध्यान खींचा था फिल्म ‘दिल चाहता है’ में। उनकी शख्सियत में कुछ-कुछ गिरीश कर्नाड जैसी गंभीरता भरी सादगी थी। एक खास तरह की डिग्निटी, सहजता और अभिजात्य का मिला-जुला रूप। उस वक्त तक मैं रजत कपूर के बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानता था।एक दिन अनजाने में मेरे हाथ उनकी फिल्म ‘ऱघु रोमियो’ लग गई। यह फिल्म छोटे शहरों में रिलीज नहीं हो पाई थी और इसके प्रदर्शन के करीब साल भर बाद मैंने इसे देखा होगा। इस फिल्म को देखकर मैं हतप्रभ रह गया था। कई सालों बाद मैंने कोई ऐसी फिल्म देखी थी जिसे देखकर किसी पुरानी फिल्म की याद नहीं आई। न कथ्य में, न शैली में और न ही किसी अन्य बात में। यह एक ऐसी फिल्म थी जिसे देखकर आप कहें, ‘हां, यह है कुछ अलग…’

करीब साल भर पहले मैंने उनकी तीसरी फिल्म ‘मिथ्या’ देखी। जिसकी बहुस्तरीय जटिलता चकित कर देने वाली है। दिलचस्प बात यह है कि ‘मिथ्या’ जैसी फिल्मों की तारीफ तो हुई मगर कोई भी समीक्षक फिल्म की बहुस्तरीयता और आइडेंटिटी क्राइसिस जैसे पहलुओं पर रोशनी नहीं डाल सका। इस बीच रजत कपूर के बारे में पढ़ता और समझता रहा।

यह साफ हो गया कि रजत कपूर की कोशिशों से देखते-देखते हिन्दी में एक खास किस्म का सिनेमा सामने आया, जिसे हम न्यू सिनेमा या इंडिपेंडेंट सिनेमा कह सकते हैं। इसके साथ ही मन में कुछ सवाल भी उठते रहे। पिछले हफ्ते मुझे पता लगा कि रजत कपूर बैंगलोर में अपना नाटक हैमलेटः द क्लाउन प्रिंस लेकर आ रहे हैं तो तय किया कि नाटक देखने के बहाने रजत कपूर से मुलाकात करनी है। यह जानकर खुशी भी हुई और अफसोस भी कि हैमलेट के दो दिनों के सभी शो एडवांस में फुल हो चुके थे। लिहाजा मैंने रजत कपूर से मिलने का वक्त मांगा और तय हुआ कि रंग शंकरा में शाम साढ़े पांच बजे वे मुझसे मिलेंगे।


रंग शंकरा दरअसल मालगुड़ी डेज वाले शंकर नाग की स्मृति में बनाया गया एक बेहद खूबसूरत सा और बेहद सक्रिय थिएटर है। भीतर जाते ही एक बड़ा हॉल और बगल में सुंदर सा कैफेटेरिया… मैं नियत समय पर वहां पहुंच गया। थोड़ी देर में रजत सीढ़ियों से उतरते दिखाई दिए। उन्होंने मुझे पूछा बातचीत रिकार्ड कैसे होगी। संयोग इस आपाधापी के बीच मैं अपने साथ रिकार्डर नहीं ला सका। मेरी नोटबुक देखकर वे थोड़े निराश हुए मगर मैंने उन्हें बातचीत के लिए मना ही लिया। अपने लिए ब्लैक कॉफी और मेरे लिये चाय का आर्डर देकर वे बैठे और बातचीत शुरु हो गई।

बातचीत के दौरान ऊपर से सहज दिखते हुए भी रजत भीतर से कहीं सतर्क थे। उनकी यह सतर्कता साफ बताती थी कि वे अपनी रचनात्मकता को लेकर खासे गंभीर हैं। बातचीत मेरे लिए बहुत संतोषजनक नहीं थई। एक अर्थों में यह बातचीत उन्हें एक्सप्लोर नहीं करती थी, बल्कि पहले से तय कुछ बिंदुओं पर मुहर लगाती चली। उनके ज्यादातर जवाब मेरे लिए प्रत्याशित थे। दूसरे शब्दों में मैं रजत कपूर के बारे में जैसा मैंने सोचा था वे लगभग उसी पर मुहर लगाते चले। बहरहाल आधे घंटे के भीतर इससे अधिक उम्मीद भी नहीं की जा सकती थी।

इस बातचीत में कुछ दिलचस्प बिंदु कौंधते चले। जैसे कि उनके प्रिय लेखक हैं मिलान कुंदेरा। जिन्होंने मिलान कुंदेरा को पढ़ा हो उनके पास रजत की फिल्मों को ज्यादा बेहतर ढंग से एक्सप्लोर करने वाली कुंजी हाथ लग सकती है। कुंदेरा अपनी रचनाओं में ब्लैक ह्यूमर और एक सत्तात्मक समाज में मनुष्य की आइडेंटिटी के सवाल को उठाए जाने के कारण जाने जाते हैं। मिलान ने अपने उपन्यासों मे सेक्स को बतौर पोलिटिकल मेटाफर इस्तेमाल किया है। मिलान कुंदेरा यदि रजत कपूर के प्रिय लेखक हैं तो यह उनसे उम्मीदें बढ़ा देता है।

उसने हुई बातचीत यहां लगभग शब्दशः प्रस्तुत हैः


आप आप मानते हैं कि आप का सिनेमा अब तक का जो सिनेमा था उससे अलग है? यदि अलग है तो आप उसे कैसे डिफाइन करेंगे?

क्या आपको नहीं लगता कि यह सिनेमा अब के सिनेमा से अलग है? फर्क हमारी सेंसिबिलिटी का है। कहानी बताने का तरीका, जीवन को देखने का तरीका अलग है।

लेकिन क्या आप सत्तर के दशक में उभरे कला सिनेमा आंदोलन से खुद को जोड़ते हैं?
नहीं। दरअसल आर्ट सिनेमा का ट्रीटमेंट रियलिस्टिक था। मेरा सिनेमा रियलिज्म से बहुत दूर है। यह उन अर्थों में यथार्थवादी सिनेमा नहीं है, जिस तरह का सिनेमा सत्तर के दशक में आया था। अब बात आती है चॉयस आफ सब्जेक्ट की तो यकीनन हमारा चॉयस डिफरेंट है। दूसरे शब्दों में कहें तो वे बहुत फार्मल थे और मैं नॉन रियलिस्टिक हूं।

तो क्या हम मानें कि आपकी सेंसिबिलटी पर मारक्वेज जैसे पोस्ट मार्डन लेखकों का असर है, जिन्होंने यथार्थवादी सांचे को तोड़कर अपनी बात कही…
मारक्वेज को मैं पसंद करता हूं मगर जिस लेखक का काम मुझे सबसे ज्यादा पसंद है वह हैं चेक लेखक मिलान कुंडेरा। इसके अलावा सेंसिबिलिटी के लेवेल पर देखे तो चार्ली चैपलिन को मैं बहुत पसंद करता हूं।

आप खुद को किस परंपरा से जोड़ना पसंद करेंगे, भारतीय सिनेमा या यूरोपियन?
मेरे लिए इस सवाल का जवाब देना बहुत मुश्किल होगा। मैं खुद नहीं जानता कि मैं किस परंपरा से अपने को जोड़ूं….


तो ‘रजत कपूर काइंड आफ सिनेमा’ को हम कैसे परिभाषित करें?
मेरा मकसद एक ऐसी फिल्म बनाना है, जिसमें मैं खुद को अभिव्यक्त कर सकूं। जिसे दिखाकर लोगों को मैं कह सकूं कि ‘यह मैं हूं’… वह मेरी आस्था हो, मेरी एक्सपीरिएंसेज हों। मैं खुद को एक ग्लोबल सिटिजन मानता हूं। मेरी अपब्रिंगिंग अलग हुई है। तो मेरी एक खास किस्म की संवेदनाएं हैं, मैं उन्हें आसानी से किसी दायरे में नहीं बांध सकता।

अपनी तरह का सिनेमा बनाने में आपको कितना वक्त लग गया?
पूरे 18 साल। मैं 1988 में पूना फिल्म इंस्टीट्यूट से पास आउट हुआ था। 1997 में बनी मेरी पहली फिल्म ‘प्राइवेट डिटेक्टिव’ रिलीज ही नहीं हो सकी।

तो आपको सही मौका कैसे मिला?
पिछले कुछ सालों में बड़ा बदलाव आया। इसमें सबसे अहम है मल्टीप्लेक्स की चेन। आज अगर मल्टीप्लेक्स न होते तो हम ‘रघु रोमियो’ और ‘मिथ्या’ जैसी फिल्में रिलीज करने के बारे में सोच ही नहीं सकते थे।

नई पीढ़ी के निर्देशकों मे से कुछ अपनी पसंद के लोगों का नाम लेना चाहेंगे?
अनुराग की ‘देव-डी’ मेरी फेवरेट फिल्म है। हालांकि उन्होंने ‘नो स्मोकिंग’ जैसी खराब फिल्म भी बनाई है। श्रीराम राघवन मेरे दोस्त हैं मगर वे बहुत अच्छे फिल्ममेकर भी हैं। उन्हें भी लंबे समय बाद ‘एक हसीना थी’ जैसी फिल्म बनाने का मौका मिला। मेरे लिये भी ‘रघु रोमियो’ और उसका लोकार्नो फिल्म महोत्सव में जाना एक टर्निंग प्वाइंट था।

भविष्य की क्या योजनाएं हैं?
नई फिल्म ‘ए रेक्टेंग्यूलर लव स्टोरी’ आने वाली है। इसके अलावा तीन फिल्मों की पटकथा पर काम लगभग तैयार है।

क्या अभी भी डिफरेंट फिल्म बनाना घाटे का सौदा है?
अभी लगाया हुआ पैसा वापस पाना आसान है। हम सस्ते में फिल्म बना लेते हैं। इंडिपेंडेंट सिनेमा का मतलब ही यही होना चाहिए। हर चीज से आजादी….

यह बातचीत मूल रूप से दैट्स हिन्दी वेबसाइट में प्रकाशित हुई है।

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2 Comments

  1. बढिय़ा है दिनेश जी. रजत कपूर की $जरा सी उपस्थिति भी स्क्रीन पर भली ही लगी हमेशा. यह बातचीत काफी रुचिकर है.

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