Interview

मैं इस दुनिया की कहानी कहता हूं: राजकुमार गुप्ता


उनकी फिल्म ‘आमिर’ ने पहली बार मेरा ध्यान खींचा था. अपने अलग तरह के प्रोमो के कारण. बाद में मैंने यह फिल्म देखी. जिस बात ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया, वह था रियलिस्टिक ट्रीटमेंट और कसी हुई स्क्रिप्ट. इससे भी बढ़कर यह कि इसे देखकर इससे मिलती-जुलती किसी और फिल्म की याद नहीं आती थी. राजकुमार गुप्ता की फिल्म ‘नो वन किल्ड जेसिका’ को भी आलोचकों से खूब सराहना मिल रही है. फिल्म रिलीज होने से कुछ दिनों पहले यह बातचीत हुई थी. हालांकि बातचीत का संदर्भ उनकी आने वाली फिल्म थी, मगर इससे बतौर फिल्ममेकर राजकुमार के कन्सर्न भी पता लगते हैं.
‘आमिर’ के बाद आप मोस्ट प्रॉमिसिंग डायरेक्टर बन गए, अपनी अगली फिल्म ‘नो वन किल्ड जेसिका’ के बारे में बताएं?

मेरी फिल्म ‘नो वन किल्ड जेसिका’ रीयल इंसिडेंट्स से प्रेरित है. मैंने उसे एक एंटरटेनिंग थ्रिलर बनाने की कोशिश की है. मैं आम तौर पर इस दुनिया की कहानी कहता हूं. यानी वह दुनिया जो मैं अपने आसपास देखता हूं.

अपने आसपास की इसी घटना ने आपको क्यों इंस्पायर किया?

आम तौर पर मेरी दिलचस्पी वास्तविक घटनाओं के ड्रामेटिक इंटरप्रिटेशन में रहती है. इस घटना में मेरी दिलचस्पी लंबे समय से थी. मैं लगातार इसके बारे में पढ़ता-सुनता और डिस्कस करता रहा. इस इश्यू के चलते पूरे देश में विरोध की एक आवाज पैदा हुई. इस बात ने मुझे सबसे ज्यादा फिल्म बनाने के लिए प्रेरित किया.

आज के समय में लीक से हटकर सब्जेक्ट पर फिल्म बनाना कितना मुश्किल या आसान है?

दोनों ही बातें हैं. यह मुश्किल भी है आसान भी. मेरी पहली फिल्म ‘आमिर’ को आलोचकों ने तो सराहा ही, मगर उसे कामर्शियल सक्सेस भी मिली. छोटे बजट की फिल्म में कहानी और सब्जेक्ट बहुत इंपार्टेंट हो जाता है. यह सच है कि फिल्म मेकिंग पर बिजनेस का बहुत ज्यादा प्रेशर होता है. हमें उसके बीच से ही अपने लिए रास्ता बनाना होता है.

रीयल लाइफ से इंस्पायर्ड कहानियों पर फिल्में बनाना कितना रिस्की है? 

यह सच है कि मैंने इस फिल्म के रेफरेंस प्वाइंट सच्ची घटनाओं से लिए हैं मगर यह मेरा इंटरप्रिटेशन है. मैंने अपनी बात को सिनेमा के दायरे में रहकर कहने की कोशिश की है.

अक्सर फिल्मों को लेकर कोई न कोई कंट्रोवर्सी क्रिएट होती रहती है, ‘नो वन किल्ड जेसिका’ के लिए आप कितना तैयार हैं?

आपको पता है कि कंट्रोवर्सी किसी भी चीज को लेकर हो सकती है, चाहे फिल्म की थीम हो, कहानी, कोई सीन या गाने को कुछ बोल भर. इस लिए मुझे इसकी ज्यादा परवाह नहीं है. मेरे लिए चैलेंज इस बात का है कि फिल्म किस तरीके से लिखी जाए कि वह एक थ्रिलर के फारमेट में होते हुए भी सब्जेक्ट की सेंसिबिलिटी बरकरार रखे.

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