Memory

जेम्स कैमरॉन का नया ‘अवतार’


पेंडोरा नाम के सुदूर ग्रह पर एक अनजान सभ्यता और मानव जाति के बीच जंग और उसके बीच पनप रही कोमल संवेदनाओं को बचाने की जद्दोजहद। कथानक उत्सुकता जगाता है न! और बहुत सारी संभावनाएं भी। जेम्स कैमरॉन से मुझे हमेशा बहुत उम्मीदें रहती हैं। वे सही मायनों एक ऐसे फिल्मकार हैं जो पर्दे पर आपकी कल्पना से परे का एक संसार रचते हैं। टाइटेनिक और टर्मिनेटर की दूसरी कड़ी मेरी ऑल टाइम फेवरेट फिल्मों में से हैं। इस बार वे डिजिटल थ्री-डी साइंस इपिक रचने जा रहे हैं। फिल्म का नाम है अवतार। यह फिल्म कई वजहों से उत्सुकता जगाती है। पहली तो अपने शीर्षक को लेकर, जो विज्ञान और भारतीय दर्शन और मिथ के बीच कड़ी जोड़ता दिखता है।देखें तो यह 1997 में आई टाइटैनिक के बाद कैमरॉन की पहली महत्वाकांक्षी फिल्म है। यह पूरी फिल्म खुद कैमरॉन के विकसित किए फ्यूजन डिजिटल थ्री-डी कैमरा से शूट की गई है। विन्स पेस के सहयोग से तैयार किए गए इस कैमरे की मदद से संभवतः पहली बार कंप्यूटर से तैयार छवियों और लाइव एक्शन परपारमेंस का एक ऐसा मिश्रित प्रभाव पैदा किया जा सकेगा जो अब तक किसी फिल्म में संभव नहीं हो सका है। बता दें कि विन्स पेस एक अवार्ड विनर फोटोग्राफर हैं और टाइटेनिक की अंडरवाटर लाइटिंग में उन्हीं का कमाल था। इस फिल्म के लिए डेवलप किए गए क्रांतिकारी मोशन कैप्चर सिस्टम की मदद से न सिर्फ अभिनेताओं के चेहरे के भावों को नियंत्रित किया जा सकेगा बल्कि वे यह भी जान सकेंगे कि उनके कंप्यूटर संचालित चरित्र किस तरह दिखेंगे। इस फिल्म में जटिल विजुअल इफेक्ट्स के लिए पीटर जैक्सन के आस्कर से सम्मानित वीटा डिजिटल विजुअल इफेक्ट को हायर किया गया है।


यह कहानी है जैक सुली की, जो पहले एक जहाजी था और धरती पर चल रहे युद्ध के दौरान घायल होकर कमर के नीचे अपाहिज हो गया है। जैक को अवतार प्रोग्राम में हिस्सा लेने के लिए चुना जाता है, जिसकी मदद से वह चलने में सक्षम हो जाएगा। जैक पेंडोरा की यात्रा पर जाता है, जो अंतरिक्ष में घने जंगलों से आच्छादित एक उपग्रह है, जहां जीवन के अद्भुत रूप हैं, कुछ खूबसूरत और कुछ बहुत ही भयावह। पेंडोरा ही नैवियों का घर है। जो कि मनुष्यों की एक संवेदनशील प्रजाति हैं, जिन्हें मानव आदिम समझते हैं मगर वास्तव में उनकी उत्पति इंसानों से उन्नत रूप में हुई है। करीब तीन मीटर ऊंचे कद, नीले रंग की चमड़ी और पूंछ वाले नैवी अपनी दुनिया में काफी खुशी और मेलजोल के साथ रहते हैं। संघर्ष वहां से जन्म लेता है जब मनुष्य पैंडोरा के घने जंगलों में दुर्लभ खनिज की तलाश में अतिक्रमण करने लगते हैं और नैवी योद्धा अपने अस्तित्व के खिलाफ इस हमले पर एकजुट होने लगते हैं।

जैक अनजाने में ही इस अतिक्रमण का हिस्सा बन जाता है। क्योंकि मानव जाति पैंडोरा के वातावरण में सांस लेने में असमर्थ हैं इसलिए अवतार के नाम से मनुष्यों में जेनेटिक परिवर्तन किए जाते हैं। ये अवतार जीवित रह सकते हैं, सांस ले सकते हैं मगर उनका शरीर मनुष्य चालित ड्राइवर द्वारा नियंत्रित होता है, जो अवतार के शरीर पर नियंत्रण रखने वाले मस्तिष्क की तरह है।

इस अवतार के जरिए जैक को एक बार पुनः अपना पूरा शरीर हासिल हो जाता है और वह योद्धाओं के एक दल के साथ पैंडोरा के घने जंगलों में भेजा जाता है, जहां उसका सामना खूबसूरती और आतंक दोनों से होता है। वहां उसकी नयत्री नाम की एक खूबसूरत नैवी स्त्री से मुलाकात होती है। यहां नियति एक अजीब खेल रचती है और जैक नयत्री के मोहपाश में बंध जाता है और उसके सामने खड़ा हो जाता है पूरी दुनिया के भाग्य का फैसला करने वाले युद्ध में अपना पक्ष चुनने का संशय।


सन 1994 में फिल्म के निर्देशक जेम्स कैमरॉन ने 80 पेज की इस पटकथा को तैयार कर लिया था। यह पटकथा दरअसल उनकी बचपन में पढ़ी किसी विज्ञान कथा से प्रेरित थी। कैमरॉन ने देखा कि कैसे इस कहानी में दिखाया गया है कि उन्नत सभ्यताएं मूल संस्कृति को नष्ट करती चली जाती हैं। 1996 अगस्त में कैमरॉन ने घोषणा की थी कि टाइटैनिक के बाद उनकी अगली फिल्म अवतार होगी। इस वे कंप्यूटर से निर्मित सिंथेटिक अभिनेताओं की मदद से बनाएंगे। इस पूरी परियोजना पर 100 करोड़ डॉलर खर्च का अनुमान लगाया गया था। इसके लिए उन छह अभिनेताओं को तैयार करना था जो जो वास्तविक हैं मगर भौतिक दुनिया मे मौजूद नहीं हैं। इसके लिए कैमरॉन की पार्टनिशिप वाले डिजिटल डोमेन हाउस की भागीदारी भी तय हो गई थी। मगर यह पूरा प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ सका।

कैमरॉन ने यह भी कहा था कि अगर अवतार सफल रहा था तो उन्हें उम्मीद है कि इस फिल्म के दो सिक्वेल और बनेंगे। जनवरी से अप्रैल 2006 तक कैमरॉन ने स्क्रिप्ट पर काम किया। खास बात यह है कि इस फिल्म में नैवी नामक जाति की भाषा और उनकी पूरी संस्कृति को पटकथा के भीतर विकसित करने के लिए कैमरॉन ने पॉल फार्मर नाम के एक भाषाविद् और यूएससी प्रबंधन संचार केंद्र के निदेशक के साथ कार्य काम किया। सितंबर 2006 में कैमरॉन ने फिल्म के लिए अपने रियलिटी कैमरा सिस्टम 3D की घोषणा की थी। इस प्रणाली के तहत एक कैमरे में दो हाई-डिफिनिशन कैमरों का इस्तेमाल करके तस्वीरों में गहराई का आयाम हासिल किया जा सकेगा।


कैमरॉन बताया कि फिल्म निर्माण में देरी की एक वजह यह भी थी कि 1990 के दशक में उन्हें अपनी परियोजना के लिए ज्यादा उन्नत तकनीक का इंतजार था। मोशन कैप्चर एनीमेशन टेक्नोलॉजी की मदद से फोटो रियलिस्टिक कंप्यूटर जेनरेटेड चरित्रों को तैयार करने में उन्हें करीब 14 महीनों का वक्त लग गया। अभी तक यह होता था कि अभिनेताओं की वास्तविक गतिविधियों में डिजिटल एनवायरमेंट जोड़ा जाता था। कैमरॉन के वर्चुअल कैमरे की मदद से अब यह संभव था कि डिजिटल चरित्र तथा वातावरण के बीच अभिनेताओं की गतिविधियों को देखा जा सके। लिहाजा निर्देशक पूरे काल्पनिक दृश्य को संभव होते हुए देख सकेगा और उसके मुताबिक दृश्यों को निर्देशित किया जा सकेगा। इस नई तकनीकी का परिक्षण निर्देशक स्टीवन स्पीलबर्ग ने भी किया और इस दौरान स्टार वार्स के निर्देशक जॉर्ज लुकास भी मौजूद रहे।

इस तकनीकी में एक उपकरण का इस्तेमाल किया जाएगा। जिसके तहत अभिनेता के सिर पर लगी एक टोपी में नन्हा कैमरा फिट होगा। यह कैमरा अभिनेता के चेहरे के भावों तथा आंखों की सूक्ष्मतम गतिविधियों को दर्ज करेगा और उसे कंप्यूटर को ट्रांस्फर करता रहेगा। इस तरह से अभिनेताओं की आंगिक गतिविधियों का 95 प्रतिशत डिजिटल फार्मेट में बदलते हुए कंप्यूटर में दर्ज होता चला जाएगा। इस तरीके से लाइव एक्शन के वक्त ही एनीमेडेटेड दुनिया और चरित्रों के साथ संवाद और अभिनय का तारतम्य स्थापित किया जा सकेगा।


कैमरॉन इस फिल्म को एक हाइब्रिड फिल्म कहना पसंद करते हैं जो कंप्यूटर जनित चरित्रों, वास्तविक वातावरण और लाइव एक्शन शूट का मिला-जुला रूप होगा। इंटरनेट पर उपलब्ध फिल्म के ट्रेलर आपको कल्पनाओं से परे की एक अद्भुत दुनिया में ले जाते हैं। उम्मीद है कि शायद एक बार फिर स्टार वार्स, टर्मिनेटर और मैट्रिक्स की तरह एक नई फंतासी आने वाले वर्षों में सिनेमा दर्शकों के दिलो-दिमाग पर राज करेगी।

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2 Comments

  1. अवतार अब तक मेरी देखी गई बहतरीन फिल्मों मे से एक है….. इस फिल्म को एक बात अन्य साईंस फिक्शन और फेंटेसी फिल्मो से अलग करती है- वह यह है कि पहली बार यहाँ सभ्य संसार और सबाल्टर्न ( पिछड़ी समझी जने वाली दुनिया) के संघर्ष को गम्भीरता पूर्वक और बहुत ही यथार्थ परक दृष्टिकोण से उभारा गया है.यहाँ इस संघर्ष को गहराई से परखा भी गया है. और फेंटेसी का सहारा लेते हुए इस समस्या को दर्शक के सामने सफलता पूर्वक रखा गया है . मेरी समझ मे इस फिल्म के के सीक़्वेल तभी सफल होंगे जब इस बुनियादी तत्व का निर्वहन उन मे भी किया जाएगा.यानि कि इसी विमर्श को आगे विस्तार मिलेगा तो ही फिल्म की पहुँच जन जन तक जाएगी .और अगर विश्व की सभी प्रमुख भाषाओं मे इस सीरीज़ का अनुवाद हो सके तो मज़ा जए. आप ने अच्छी जानकारियों से इन दो पोस्ट्स को पठनीय बनाया है. जारी रखें! क्या टर्मिनेटर सीरीज़ पर कुछ लिखा है ?

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