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कुछ कमाल अमरोही के बारे में

कमाल अमरोही और वीएस नायपाल अलग-अलग विधाओं के दो ऐसे जीनियस हैं, जिनकी निजी जिंदगी, जिनके विचार भले विवादित हों मगर उनकी असाधारण प्रतिभा में संदेह नहीं किया जा सकता. शायद अपने जीवन से जुड़े विवादों या विचारों के चलते वे अपनी बेहतर परंपरा भी नहीं विकसित कर सकें.

कमाल अमरोही के बारे में तो यह साफ-साफ कहा जा सकता है. इस जीनियस के बारे में लिखने को मेरे पास बहुत कुछ है मगर इस बार थोड़ी चर्चा उनके गीतों और उनकी शायरी पर. कमाल अमरोही के पास नफासत भरी ज़ुबान ही नहीं- उस भाषा का विट भी था. जो उनकी खुद की फिल्मों और मुग़ले आज़म में देखने को मिलता है. मेरी जानकारी में कमाल ने दो ही गीत लिखे. एक पाक़ीज़ा का- मौसम है आशिकाना, ऐ दिल कहीं से उनको ऐसे में ढूंढ़ लाना… दूसरा शंकर हुसैन फिल्म का गीत कहीं एक मासूम नाजुक सी लड़की…

पाक़ीज़ा मेरी मां की फेवरेट फिल्म थी और कहीं एक मासूम गीत… तो उन्हें इतना पसंद था कि जब वह उसे रेडियो मे बजते सुनती थीं तो सारे काम छोड़ देती थीं. हकीकत यह है कि मैंने खुद यह गीत उनके साथ बचपन के अकेलेपन में बिताए पलों में ही सुना था. कमाल की शायरी लाजवाब थी. सबसे बड़ी खूबी थी कि उनके बहुत सहज-सादे से ख्याल जब संगीत में ढलते तो मन पर एक जादुई एहसास छोड़ जाते थे. कमाल की सबसे बड़ी खूबी उनका परफेक्शन था, जो बाद में एक मिथ बन गया. उनके गीत और संगीत में यही परफेक्शन देखने को मिलता है. बतौर निर्देशक कमाल के बारे में फिर कभी…

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