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कैसे बनी विजयदान देथा की कहानी पर फिल्म ‘लाजवंती’

विजयदान देथा की कहानियां हमेशा से फिल्म निर्देशकों के लिए आकर्षण का केंद्र रही हैं। चाहे मणि कौल की ‘दुविधा’ हो, प्रकाश झा की ‘परिणति’, अमोल पालेकर की ‘पहेली’ हो या फिर उदय प्रकाश द्वारा उनकी कहानियों पर बनाई गई छोटी-छोटी फिल्में। सभी ने उनके जादुई संसार को सिनेमा के पर्दे पर अपने-अपने तरीके से उतारने की कोशिश की है। इसी कड़ी एक अनूठी कोशिश है पुष्पेंद्र सिंह की फिल्म ‘लाजवंती’ (The Honor Keeper)। निर्माण के दौरान कई दिक्कतों उबरने के बाद इस फिल्म का दुनिया के सबसे सम्मानित फिल्म महोत्सवों में एक बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में भारत से ऑफिशियल सेलेक्शन हुआ है।

देथा की कहानी को पर्दे पर उतारने की पुष्पेंद्र की यह कोशिश कई मायनों में अलग है। उनका बचपन आगरा के गांव सैंया में बीता जो राजस्थान के बार्डर पर लगता है। स्कूली पढ़ाई के दौरान उन्होंने लोकथाओं का आधार लेकर रची गई बिज्जी की अनूठी दुनिया को बहुत करीब से देखा। जहां समाज के हाशिए पर टिके बेहद मामूली लोगों के दुख-सुख, आकांक्षाओं और सपनों की कथाएं हैं। बचपन से ही सिनेमा में दिलचस्पी रखने वाले पुष्पेंद्र ने पूना फिल्म इंस्टीट्यूट से निकलने बाद जब ‘लाजवंती’ कहानी पढ़ी तो पनिहारिनों के गीतों में रची-बसी इस प्रेमकथा से इतने प्रभावित हुए कि इसके लेखक से मिलने उनके गांव चले गए। बिज्जी से उन्होंने कहानी पर फिल्म बनाने के अधिकार मांगे।

पुष्पेंद्र इससे पहले अमित दत्ता और अनूप सिंह की महोत्सवों में सराही जा चुकी फिल्मों में बतौर सहायक निर्देशक काम कर चुके थे। उन्होंने अपनी पहली फिल्म के लिए देथा की कहानी को ही क्यों चुना?  जवाब में वे कहते हैं, “मैं मानता हूं कि हमारी संस्कृति लोककलाओं में ही बसी है। हमारे यहां इंडिपेंडेंट सिनेमा सामने तो आया मगर उसका सारा फोकस शहरी जीवन था। लोक संस्कृति का रूप सुंदर और अद्भुत है। मुझे लगा कि पनिहारिनों की अनोखी कहानी के जरिए मैं उस लोक संस्कृति को प्रस्तुत कर सकता हूं।”

अब अगला चरण था इस फिल्म के लिए राजस्थान में ऐसी लोकेशन तलाशने का जहां पर देथा के संसार को उतारा जा सके। दो साल तक भटकने के बाद भी उन्हें संतोषजनक लोकेशन नहीं मिली। एक दिन मुंबई में उनकी मुलाकात मांगनिहार लोकगायकों से हुई। और जब वे राजस्थान में उनके गांव पहुंचे तो लगा कि कहानी आंखों के आगे साकार हो रही है। उन्होंने तय किया कि फिल्म को इसी लोकेशन पर फिल्माना है। पुष्पेंद्र ने खुद एफटीआई से अभिनय का प्रशिक्षण ले रखा है। फिल्म में उनके अलावा एक ही प्रोफेशनल अभिनेत्री संघमित्रा ने काम किया। बाकी कलाकारों की जगह गांव के मूल निवासियों को रखा गया। अन्य निर्देशकों की तरह पुष्पेंद्र ने गांव के लोगों को कैमरे के सामने लाने से पहले किसी तरह की वर्कशाप वगैरह का सहारा नहीं लिया। उनका मानना है कि इससे लोग अतिरिक्त रूप से सचेत हो जाते हैं।

फिल्म सिर्फ शिड्यूल में पूरी हो गई। पहला शिड्यूल 10 दिन तक चला और दूसरा तीन दिन तक। पूरी फिल्म को सिर्फ एक ही कैमरे से शूट किया गया और इसके लिए के कैनन 5 डी मार्क-थ्री कैमरे का इस्तेमाल किया गया। पैसा जुटाने का काम क्राउड फंडिंग के जरिए किया गया। कई लोग मदद के लिए सामने आए और गाड़ी चल निकली। पुष्पेंद्र ने बताया कि यह मॉडल तो यूरोप-अमेरिका के इंडिपेंडेंट फिल्म मेकर्स ने बनाया है मगर हकीकत यह है कि भारत में क्राउड फंडिंग की परंपरा बहुत पुरानी रही है। यहां यह चंदे के रूप में दिखती है। लड़कियों की शादी में भी दोस्त, पड़ोसी और रिश्तेदार मदद करते हैं।

यहां तक तो फिल्म काफी कम बजट में शूट कर ली गई। दिक्कत तब आई जब बढ़ते खर्चों की वजह से फिल्म के पोस्ट प्रोडक्शन का काम रुक गया। इससे उबारा दिल्ली के ही एक फिल्म प्रेमी संजय गुलाटी ने। उन्होंने इसके निर्माण में सहयोग दिया और फिल्म पूरी हुई। फिल्म का प्रीमियर अब बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में होगा। पुष्पेंद्र मुस्कुराते हुए कहते हैं, “बिज्जी इस बारे में बहुत अनुभवी थे। उन्होंने मुझसे कहा था… ‘हमारा क्या हम तो कहानी लिख लेते हैं, उसी को दिन-रात जीते हैं… मगर फिल्म बनाना मुश्किल है…’ मुझे खुशी है कि यह मुश्किल काम हम पूरा कर सके।”

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