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मसानः प्रेम और मृत्यु के बीच एक कविता

‘‘मसान’’ विशुद्ध सिनेमाई भाषा में रची गई कविता है। एक आधुनिक मिजाज़ वाली कविता जो अपने होने में ही अर्थ को आहिस्ता-आहिस्ता खोलती है। नीरज घेवन ने अविनाश अरूण के कैमरे की मदद से अद्भुत बिंब रचे हैं। अतिशियोक्ति न लगे तो उनके बिंब सत्यजीत रे के सिनेमा की याद दिलाते हैं। ऐसी छवियां जो जीवन भर के लिए आपके मन में घर कर जाती हैं।

ऐसा सिर्फ इसलिए नहीं होता कि ये छवियां फिल्म की कथा संरचना में बड़ी खूबसूरती से रची-बसी हैं, बल्कि इसलिए कि ये प्रतिछायाएं जीवन की गहरी संवेदनाओं की लहरों पर हिलती नजर आती हैं। बनारस में रात को नदी के किनारे जगर-मगर करते घाट हों, या शमशान में चिताओं से उठती लपटें और चिंगारियां या नदी के तट से दूर पुल पर गुजरती ट्रेन… ‘‘मसान’’ देखते वक्त आप भूल जाते हैं कि यह कोई फिल्म है। आप इस फिल्म में नदी किनारे चलती बयार और चारो तरफ फैले आसमान के नीचे के निचाट खालीपन को भी स्क्रीन पर महसूस कर सकते है। फिल्म निर्देशक ने न सिर्फ कैमरे के फ्रेम में बल्कि पटकथा में भी स्पेस के महत्व को समझा है और उसका बेहतर इस्तेमाल किया है। इस तरह बिना लाउड हुए फिल्म दिल में कहीं गहरे तक उतरती चली जाती है।

मसान का निर्माण इंडो-फ्रैंच को-प्रोडक्शन के तौर पर हुआ है। नीरज ने इससे पहले बनारस से मुंबई आए एक दंपति की कहानी पर एक 17 मिनट लंबी फिल्म ‘शोर’ बनाई थी जो अनुराग कश्यप की फिल्म ‘शॉर्ट्स’ का एक हिस्सा थी। बतौर निर्देशक यह नीरज की दूसरी और पूरी लंबाई की पहली फिल्म है। कहानी मृत्यु और प्रेम के बीच आकार लेती है। फिल्म की पटकथा इन दो ध्रुवों के बीच के तनाव पर सधे कदमों से बढ़ती जाती है।

फिल्म की शुरुआत ही प्रेम और मृत्यु के इस कंट्रास्ट से होती है। एक होटल में दो उत्सुक प्रेमियों का करीब आना, अचानक पुलिस का हस्तक्षेप और पुलिस का वहां मौजूद लड़की देवी (रिचा चड्ढा) का जबरन वीडियो बनाना और लडक़े का आत्महत्या कर लेना- इस कहानी की बुनियाद को तैयार करते हैं। असली फिल्म कुछ मिनटों के इस घटनाक्रम के बाद अपना आकार लेती है। जब हम देखते हैं कि किस तरह पुलिस लगातार देवी और उनके पिता को ब्लैकमैल करती रहती है, कैसे देवी के पिता तीन लाख रुपये जुटाने के लिए परेशान होकर भटकते हैं, किस तरह झिझका हुआ प्रेम परवान चढ़ता है, कैसे लोगों के उदास जीवन में हल्की बयार जैसी खुशियां दाखिल होती हैं।

देवी का पूरा जीवन निरुद्देश्य हो जाता है मगर वह अपनी दृढ़ता छोड़ती नहीं है। वह धीमे मगर मजबूत कदमों से आगे बढ़ती जाती है। पिता और बेटी दोनों ही एक-दूसरे के प्रति भावुक नहीं हैं, मगर वे संवेदनहीन भी नहीं हो पाते। इसके समानांतर एक और कथा चलती है। यह शमशान में मृत शरीर को जताने वाले क्रिया क्रम करने वाले एक अछूत परिवार की कहानी है। घाट पर लाशों के बीच जीवन गुजारने वाला दीपक (विक्की कौशल) इस काम से छुटकारा पाना चाहता है। वह पढ़ रहा है और एक ठीक-ठाक नौकरी पाने के लिए प्रयासरत है। उसकी मुलाकात शालू (श्वेता त्रिपाठी) से होती है और दोनों के बीच दोस्ती और फिर प्रेम हो जाता है। वक्त गुजरने के साथ जैसे ही प्रेम का रंग गहराता है, उसका एक दुखद अंत होता है जो दीपक को संवेदना के स्तर पर बुरी तरह से झकझोर देता है।

समानांतर चलती दोनों कहानियां प्रत्याशित तौर पर फिल्म में एक जगह जाकर जुड़ती हैं, या दूसरे शब्दों में कहें तो जुड़ने का आभास सा देती हैं और फिल्म एक संभावना की तरफ इशारा करती हुई खत्म हो जाती है। इन समानांतर चलती कहानियों को नीरज ने कुछ इस तरह से निर्देशित किया है कि मुख्य कथानक लगभग विलीन हो जाता है। हमें जो याद रह जाता है वह होते हैं इसके किरदार, उनकी छोटी-छोटी खुशियां और न खत्म होने वाले दुःख। आसमान, सड़क और नदी जहां ये किरदार सांस लेते हैं।

छोटे शहरों को इससे पहले भी कई निर्देशकों ने फिल्माया है मगर वे प्रचलित ‘पैनॉप्टिकल व्यूप्वाइंट’ से बाहर न आ सके, जहां रचनाकार खुद को किसी ऊंची या विशिष्ट जगह पर रखकर सब्जेक्ट को देखता है। वह विषय-वस्तु से परे और विशिष्टता बोध के साथ उन्हें प्रस्तुत करता चलता है। यहां तक कि अनुराग कश्यप की ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ भी इस ‘पैनॉप्टिकल विज़न’ से परे नहीं हो पाई थी, जिसकी टीम में नीरज भी मौजूद थे।

यह फिल्म आपको इसके किरदारों के बीच ले जाकर बिठा देती है आप उनकी खुशियों और दुःख में शामिल हो जाते हैं। विक्की कौशल के चरित्र में एक किस्म की उदासी है, प्रेम के रंग उसकी उदासी को और गहरा कर देते हैं। यह प्रेम हिन्दी की कुछ पॉपुलर कवियों और शायरों की पंक्तियों के बीच परवान चढ़ता है। धीरे-धीरे फिल्म पर मृत्यु और उदासी का रंग और गहरा होता जाता है। मगर निरंतर बहती नदी की तरह जीवन खत्म नहीं होता वह आगे बढ़ता जाता है।

फिल्म का नैरेटिव यथार्थ के इतने करीब है कि निर्देशक, कलाकारों और कैमरामैन की तरफ से उसका निर्वाह कर पाना भी अपने में एक चमत्कार सा लगता है। खास बात यह है कि फिल्म यथार्थ को भी ग्लोरीफाई करने का प्रयास न करके उसे जस का तस लेती है। वह जीवन की विडंबनाओं के बीच हास्य और क्रूरता के बीच अति कोमल पलों को भी तलाश लेती है- जैसा कि जीवन में अक्सर होता है। बहुत महीन संवेदनाओं का जाल भी बुनता चलता जाता है और कठोर हकीकत का धरातल भी मौजूद रहता है।

शालू त्रिपाठी ने एक छोटे शहर की लड़की के संकोच, उत्सुकता और साहस को बखूबी जिया (इन सभी के लिए अभिनय शब्द उपयुक्त नहीं लगता) है। फिल्म का एक और अहम किरदार है- देवी के पिता विद्याधर पाठक (संजय मिश्रा)- वे तीसरी समानांतर कथा के नायक हैं। वे पूर्वी उत्तर प्रदेश का एक प्रतिनिधि चरित्र हैं- परंपराओं और संस्कारों में जकड़ा घिसट-घिसटकर छोटी-छोटी चालाकियों और तिकड़मों से अपना आत्मसम्मान बचाता एक शख्स। एक छोटे से बच्चे झोंटा के साथ उनकी जुगलबंदी में सहज हास्य के साथ उतनी ही मार्मिक भी है। कई दूसरे चरित्र भी याद रह जाते हैं चाहे इंस्पेक्टर मिश्रा बने भगवान तिवारी हों या फिर

फिल्म का एक और बहुत ही महत्वपूर्ण चरित्र है- नदी। इसकी हलचलों को और विभिन्न रंगों को अविनाश अरुण के कैमरे ने बड़ी खूबसूरती से पकड़ा है। उन्होंने नदी  को उसके तमाम रंगों के साथ बतौर एक किरदार खड़ा किया है। चाहे वह नदी के रूमानी रंग हों या उदासी में डूबे हुए या अद्भुत कौतुक की संरचना करते पानी के भीतर से सिक्के निकालने का दृश्य हो- सब कुछ एक-दूसरे से जुड़ता चला जाता है। शमशान बार-बार नहीं आता है मगर वह नेपथ्य में है। फिल्म के किरदारों और कहानी पर छाया हुआ है। जब-जब चलती चिताओं के बीच शमशान का फिल्मांकन हुआ- शानदार बन पड़ा है।

‘‘मसान’’ की खूबी यह है कि यह बिना बड़े बोल बोलने का प्रयास किए एक बड़ी फिल्म बन जाती है। हमारे यहां आर्टहाउस सिनेमा पर यूरोपियन सिनेमा और हॉलीवुड के इंडिपेंडेंट सिनेमा का गहरा असर है। मगर यह फिल्म अपने मूल में, अपनी शैली में और अपनी आत्मा में यूरोपियन सिनेमा की बजाय ज्यादा एशियाई है या दूसरे शब्दों में कहें तो ईरानी सिनेमा के ज्यादा करीब- सादगी लिए मगर गहरे तक असर कर जाने वाली।

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