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दुनिया जो भीतर गुम है कहीं

तेरे बिना ज़िंदगी से कोई, शिकवा, तो नहीं,
तेरे बिना ज़िंदगी भी लेकिन, ज़िंदगी, तो नहीं

गुलज़ार (फिल्म ‘आंधी’ से)

सत्तर के दशक की कुछ फिल्में एक अलग और सुहानी सी दुनिया रचती हैं। ये सत्तर के दशक का मध्यम वर्ग था। अपनी लाचारियों, परेशानियों और उम्मीदों में डूबता-उतराता। कभी हम ‘गोलमाल’ जैसी फिल्मों में उस पर हंसते थे तो कभी घरौंदा जैसी फिल्मों में उसकी मजबूरियाँ हमें उदास कर जाती थीं।

मगर यहां मैं उस दुनिया को याद नहीं करने जा रहा, मैं यह ध्यान दिलाने जा रहा हूं कि वह संसार दरअसल आज भी हमारे भीतर ही कहीं गुम पड़ा है। जब अकेली रात को हम कभी गुलज़ार को सुनते हैं तो बंद आंखों के आगे एक फिल्म सी चलने लगती है। इस फिल्म में न तो अमोल पालेकर हैं, न विद्या सिन्हा और न बिंदिया गोस्वामी। यहां हम नजर आते हैं: सर्दियों की गुनगुनी धूप सेंकते, मई की धूल उड़ती सड़क पर फेरी वाले की भटकती आवाज, शाम को मद्धम होते उजाले में झींगुरों की झनकार।

जिंदगी में धीमापन जरूरी है। इस धीमेपन में ही हम अपनी आवाज को सुन पाते हैं। अपनी आवाज को सुनना दरअसल क्या है। यह दरअसल परिवर्तित होती वस्तुओं, जीवन और खुद की गति को समझना। चेक लेखक मिलान कुंदेरा ने अपने उपन्यास ‘स्लोनेस’ में धीमेपन को याद रखने और रफ्तार को भूल जाने के एक्ट के रूप में परिभाषित किया है। गांधी ने एक बार कहा था, “पैदल चलने से सत्य को हम ज्यादा करीब से जान पाते हैं।” इस बात का मर्म तभी समझा जा सकता है जब हम यह समझते हों कि जीवन का धीमापन किस तरह से हमें खुद के करीब ले जाता है।

मुझे लगता है कि आने वाले वक्त में हम जीवन के धीमेपन को दोबारा से हासिल करने की कोशिश करेंगे। हम धीमेपन के कुछ पल अपनी जिंदगी के जोड़ने की कोशिश करेंगे। स्लोनेस को अपने जीवन में लाना एक मुश्किल काम है। ठहराव आपकी जीने की अवधि को बढ़ाता है। वह आपके भीतर छिपे ब्रह्मांड से आपको रू-ब-रू कराता है और बाहर के ब्रह्मांड से जोड़ता है।

सत्तर का दशक दरअसल उस दुनिया की याद दिलाता है जब लोगों से हमारे संबंध वास्तविक थे, वर्चुअल नहीं। उस वक्त को फिक्शन से परे उन गीतों में महसूस कर पाते हैं, जिनका अधिकांश गुलज़ार ने रचा है। एक बार फिर से उन सच्चे मोतियों में से किसी एक को चुनें। अपनी आंखें बंद करें और पुरानी यादों में खुद को डुबो दें।

गुलज़ार के शब्दों में-

आज अगर भर आई है
बूंदे बरस जाएंगी
कल क्या पता किनके लिए
आँखें तरस जाएंगी
जाने कब गुम हुआ,
कहाँ खोया
इक आंसू छुपा के रखा था
तुझसे…

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2 Comments

  1. दिनेश भाई, आपने बेहद ज़रूरी और प्रासंगिक बात कही है। गति और धीमेपन पर बहुत कुछ कहा गया है। प्राणायाम के मूल में भी यह तत्व है। कार दौड़ते हुए जब आप एक धीमा आलाप सुनते हैं तो वह आपको सुहाता नहीं; कोई कड़ी टूटी सी लगती है।
    छोटी सी अरज।।।सत्तर के दशक की बासु चटर्जी, हृषिकेश मुखर्जी और गुलज़ार की फिल्मों में गुम दुनिया की बात विस्तार से कीजिए।

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