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जोगिंदर की स्मृति में

‘रंगा खुश’ जोगिंदर इस दुनिया में नहीं रहा। यह खबर मुझे देर से मिली और जब आज शाम को एक मित्र से बातों-बातों में पता लगा तो इस पर पोस्ट लिखने से खुद को रोक नहीं सका। जोगिंदर का नाम खराब एक्टिंग और खराब फिल्में प्रोड्यूस करने का पर्याय बन चुका था। वैसे भी उनको भारत के दस सबसे खराब निर्देशकों की लिस्ट में शामिल किया जा चुका है।

मैंने सबसे पहले दूरदर्शन पर जोगिंदर की दो फिल्में देखीं- जहां तक याद आता है दोनों ही जोगिंदर की प्रोड्यूस की हुई थीं। तब मेरी उम्र बहुत कम थी, लगभग बच्चा ही था- पहली बार मैंने ऐसी फिल्में देखीं जिनके बारे में दिल से यह कह सकता था कि वे वाकई खराब थीं। यानी वे सिनेमा के सामान्य बुनियादी उसूलों को सिरे से खारिज करती थीं। मगर यहीं पर जोगिंदर की फिल्में खराब होने के बाद भी विशिष्ट हो जाती थीं। उनमें कहानी कहने की एक अंतर्निहित ताकत होती थी जो आपको बांधे रखती थी। खास तौर पर दो चट्टानें फिल्म की सारी घटनाएं सामाजिक सरोकारों के इर्द-गिर्द घूमती थीं। हालांकि ये सामाजिक सरोकार नारेबाजी की शक्ल में थे।


इन फिल्मों में जमाखोरी, मिलावट और बेरोजगारी पर खूब कटाक्ष होते थे। दो चट्टानें में जोगिंदर ने राका नाम का निगेटिव किरदार निभाया था। जोगिंदर ने समाज के लोअर क्लास के मनोविज्ञान को बखूबी पकड़ा था और शायद यही वजह थी कि बिंदिया और बंदूक और रंगा खुश जैसी फिल्में जबरदस्त हिट हुईं। उसी दौरान मैंने दूरदर्शन पर जोगिंदर का एक इंटरव्यू देखा। संयोग से करीब एक घंटे लंबा यह इंटरव्यू कई बार रिपीट हुआ। इंटरव्यू लेने वाली थीं तबस्सुम और उसमें जोगिंदर की निर्देशित कई फिल्मों के फुटेज देखने को मिले।

दिलचस्प बात यह है कि जोगिंदर ने उस इंटरव्यू के दौरान यह स्वीकार किया कि वे क्रूड और बेहद लाउड फिल्में बनाते हैं। उन्होंने कहा कि मेरी फिल्मों में जबरदस्त ड्रामा होता है। इंटरव्यू के दौरान उनका नाटकीय अंदाज देखने लायक था। इंटरव्यू के दौरान फिल्मों की फुटेज देखने से यह महसूस हुआ कि जोगिंदर का खराब ही सही बात कहने का एक खास अंदाज है। एक वाक्य में यह कहा जा सकता था कि जोगिंदर को अपनी बात चीख-चीखकर कहने में यकीन था और इस स्टाइल को उन्होंने अभिनय से लेकर पिक्चराइजेशन तक में डेवलप कर लिया था।

मगर अभी एक दिलचस्प संयोग बाकी था, जब मैंने रिपोर्टिंग शुरु की तो अचानक मेरी मुलाकात जोगिंदर से हो गई। बरेली के एक बहुत सस्ते से सिनेमाहॉल में नई फिल्म लगी थी। फिल्म जोगिंदर की थी तो जाहिर है कि मेरी दिलचस्पी जगी, वहां गया तो पता चला कि फिल्म का निर्देशक भीतर ऑफिस में बैठा हुआ है। मैं भीतर गया और ‘सिनिकल-मैनियाकल’ रंगा खुश से मेरी मुलाकात भी हो गई।

बाहर नगाड़ा बज रहा था और भीतर जोगिंदर फिल्म की दो अभिनेत्रियों के साथ खस्ताहाल दफ्तर में बैठे हुए थे। जो दो लड़कियां बैठी हुई थीं, वे इतनी बदसूरत थीं, कि उन्हें किसी भी एतबार से एक्ट्रेस कहना मुश्किल था। उन्होंने क्लीवेज दिखाने वाली टाइट लो-नेक ड्रेस पहन रखी थी। जोगिंदर ने बाहर के खोमचे से मेरे लिए चाय मंगाईं। जोगिंदर वहां भी खूब आर्दशवादी बातें बघारीं मगर दूरदर्शन से एक बात फर्क थी कि उसके हर दूसरे वाक्य में गालियां होती थीं। उसने नेताओं को और व्यवस्था को जमकर गालियां बकीं। जोगिंदर एक ऐसा शख्श था जो किसी ठेकेदार की तरह फिल्में बनाता था। उस वक्त तक वास्तव में उसका सिनेमा की कला से कोई लेना-देना नहीं रह गया था और वह छोटे स्तर पर फानेंसरों की तलाश में था।

मुझे उस फिल्म का नाम तो याद नहीं रह गया मगर वह फिल्म जहां-जहां रिलीज होती थी, जोगिंदर ढोल-नगाड़ा लेकर दर्शकों का अपना नाच दिखाता था। यह अपने-आप में एक यूनिक प्रयोग था कि किसी फिल्म का निर्देशक अपनी ही फिल्म शुरु होने से पहले नगाड़ा बजाए। जोगिंदर ने उस दिन बहुत ढेर सारी बातें कीं और कहा कि अपनी अगली फिल्म वे बरेली में बनाएंगे और लोकेशन होगा बरेली कॉलेज का कैंपस- जो कि वास्तव में एक खूबसूरत ऐतिहासिक इमारत है।

नेट पर सर्च के दौरान जोगिंदर के बारे में कई दिलचस्प तथ्य मिले, वह एक लेखक भी था और डिंपल कपाड़िया की फिल्म आज की औरत की पटकथा लिखी थी, जोगिंदर ने बतौर स्पॉट ब्वाय और साउंड विभाग में भी काम किया है। इतना ही नहीं फिल्मों में आने से पहले वह एक पॉयलेट था।

बाद में जोगिंदर की फिल्में लगातार खराब होती चली गईं और उसने साफ्ट पोर्न बनाना शुरु कर दिया। प्यासा शैतान इसी कैटेगरी की फिल्म थी, हालांकि उसे अच्छे तरीके से लिखा गया था। आसमान में उड़ते ‘जिन’ जोगिंदर के कहकहे हर दस मिनट बाद झेलने के बावजूद उस फिल्म में कुछ बेहतर दृश्य रचे गए थे। यह उस कैटेगरी की फिल्म थी जिसमें रिलीज होने के बाद साफ्ट पोर्न दृश्य जोड़ दिए जाते हैं। जोगिंदर आखिरी दौर में एक और फिल्म बनाई थी (टाइटिल याद न होने के लिए मुझे माफ करें)जिसमें उसका कॉमन सेंस देखने लायक था, उसने अपनी एक पुरानी फिल्म के फुटेज और बाद में शूट किए कुछ फुटेज जोड़कर एक नई फिल्म बना डाली।

जोगिंदर जैसे कलाकारों को अच्छे या बुरे की कैटेगरी में नहीं रखा जा सकता। वे यह बताते हैं कि कला और ज़िंदगी में यही समानता है, वह भले बदसूरत हो मगर है जिंदगी का एक हिस्सा ही- और उससे भी बहुत कुछ सीखा जा सकता है।

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3 Comments

  1. सुंदर पोस्ट लिखी है आपने. कुछ फ़िल्में मुझे भी कुछ धुंधली सी याद हैं. जोगिन्दर स्टाइल की फ़िल्में पंजाबी (भारत और पाकिस्तान, दोनों में ही) में एक अर्से से बनती चली आ रही हैं. अलबत्ता, हिन्दी में इस तरह की फ़िल्में नई बात लगती थीं.

  2. जोगिन्दर और उनकी फिल्मों का सटीक विश्लेषण किया है आपने,दरअस्ल जोगिन्दर सरीखे कलाकार उस श्रेणी में आते हैं जिसमे लोगों में प्रतिभा तो उतनी नहीं होती पर फिल्मो से मुहब्बत इतनी होती है की वो सिवाय फिल्म बनाने के कुछ और सोच नहीं सकते और यही जोगिन्दर ने ताउम्र किया भले ही उनमे ‘बिजनेस सेन्स’ की कमी रही हो.
    जोगिन्दर की अदाकारी भी कुछ फिल्मों,जैसे की ‘पत्थर और पायल,हुकूमत’ आदि,में ख़राब नहीं कही जाएगी.

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