Memory

जो हमारा अपना है

भारतीय सिनेमा में आखिर क्या है, जो उसे सारी दुनिया के सिनेमा से अलग करता है. जो हमारा अपना है. शायद कहानी को पेश करने का गहरा रागात्मक तरीका. पश्चिम के सिनेमा के मुकाबले भारतीय सिनेमा ने कभी कहानी कहने की यथार्थवादी शैली नहीं अपनाई.

उसने यथार्थ को एक भावनाओं के संसार में चलने वाले नाट्य में बदल दिया. उनके सामने भारत का विशाल और करीब-करीब अनपढ़ जनसमूह था. जिसको उन्हें संबोधित करना था. उससे तीसरी कसम के इन्हीं शब्दों में बात की जा सकती थी, सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है, न हाथी है न घोड़ा है, वहां पैदल ही जाना है.

भारतीय सिनेमा में गीत-संगीत, उसमें निहित ड्रामा और करुणा दरअसल एक ब्रेख्तियन एलिनिएशन रचते हैं. शायद यही वजह है कि सौ साल बीत गए मगर खुशी और गम दोनों में गाने वाले इन कलाकारों से, इन कहानियों से और रुपहले परदे पर क्रियेट होने वाले इस ड्रामे से भारत के लोगों ने कभी खुद को अजनबी नहीं पाया.

एक साथ लाखों आंखों में इस सिनेमा ने सपने जगाए, लाखों के मन में उम्मीदें जगाईं और हजारों दिलों में प्यार का जज्बा जगाया, (याद करें फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी पंचलैट, जिसका नायक हम तुझसे मोहब्बत करके सनम गाता है). आज भी लोग पापुलर सिनेमा के नायकों को पूजते हैं, उनके लिए अपना खून और अपनी जान तक देने को तैयार रहते हैं. हैरत की बात यह है कि कभी हमने खुद अपने सिनेमा की परंपरा को समझने का प्रयास नहीं किया. हम उसे बेहतर कहते हैं, जो शायद यूरोपियन सिनेमा की नकल पर बना आर्ट सिनेमा होता है, या फिर हालीवुड की तर्ज पर एक यूनीवर्सल लैंग्वेज में बनी फिल्म… जिसका एक ग्लोबल चरित्र है. हमने अपनी परंपरा से अपनी मौलिकता नहीं खोजी. शायद यही वजह है कि हम विश्व सिनेमा में वहां भी नहीं खड़े हो सके, जहां पिछले कुछ वर्षों से ईरान खड़ा है.

मेरा अनुरोध है उन सिनेमा प्रेमियों से जो भारतीय सिनेमा की इस समृद्ध विरासत पर अपनी राय बनाना चाहें, बहस चलाना चाहें, अपनी राय व्यक्त करना चाहें, कुछ लिखना चाहें. उन सभी लोगों का इंडियन बाइस्कोप में स्वागत है. इस ब्लाग को आगे बढ़ाने में आप सभी का योगदान चाहिए, लिहाजा आपके सुझावों और प्रस्तावों का हमेशा स्वागत है…

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2 Comments

  1. Its good to see that u have created a blog of ur taste… I m sure u’ll find a lot many like minded-people here… waise aapke reviews ab aur bhi zyada achche lag rahe hain
    Waise jo log Dinesh Sir ko nahi jaante hain, ye jaankari unke liye… Dinesh Sir simplicity aur knowledge ka behatreen combo hain. Cinema ke to aise fan hain ki koi bhi film First Day First Show dekh sakte hain, Literally koi bhi film chahe reviews kaise bhi ho. Ye apni opinion khud banane mein believe karte hain aur behad genuine insaan hain… Practical journalism ki achchi samajh rakhte hain, I mean desk per baith kar unrealistic copies ki apeksha nahi karte. Great Going Sir. Cheers!!!

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