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जब नायक से बड़ा बन जाता है किसी फिल्म का सपोर्टिंग एक्टर

जब आप ‘जय गंगाजल’ देखकर निकलते हैं तो देर तक आपके जेहन में डीसीपी बीएन सिंह घूमता रहेगा। इस किरदार के जरिए प्रकाश झा पहली बार स्क्रीन पर आए हैं और अन्य निर्देशकों के मुकाबले उन्होंने अपने लिए एक लंबा रोल चुना है और उसे बेहद सधे तरीके से निभाया भी है।

कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है एसपी आभा माथुर (प्रियंका चोपड़ा) का चरित्र इकहरा होता जाता है और प्रकाश झा ज्यादा मजबूती से उभरते हैं। यह पहली बार नहीं हुआ है। ऐसी बहुत सी फिल्में हैं जिनमें सपोर्टिंग एक्टर मुख्य किरदार पर भारी पड़ जाता है। नमक हराम में अमिताभ बच्चन का नाम अक्सर लिया जाता है। इसके अलावा ‘सत्या’ के मनोज बाजपेई, ‘नाम’ के संजय दत्त और ‘दीवाना’ में शाहरुख खान का नाम तुरंत याद आ जाता है।

मगर ‘जय गंगाजल’ में अंत तक पहुंचते-पहुंचते लगता है कि यदि प्रकाश झा थोड़ी और हिम्मत जुटाते और इस फिल्म में आभा माथुर की कहानी कहने की बजाय बीएन सिंह की कहानी कहते, तो शायद वे ज्यादा अहम फिल्म बना पाते। यह एक भ्रष्ट पुलिस अधिकारी के सामाजिक और मानवीय तौर पर जागरुक होने और भ्रष्ट सिस्टम के खिलाफ खड़े होने की कहानी है।

एक संवेदनशील निर्देशक के लिए न सिर्फ इस कहानी में बल्कि इस किरदार में बहुत संभावनाएं हैं। प्रकाश झा इन संभावनाओं का दुहरे स्तर पर निर्वाह करते हैं- बतौर निर्देशक और साथ ही साथ बतौर अभिनेता। दिलचस्प यह है कि इस किरदार को बेहतर बनाने में उनके निर्देशक से ज्यादा उनके अभिनेता का योगदान है, जो पहली बार सामने आया है।

उन्होंने इस चरित्र को बहुत कम संवाद दिए हैं और उसकी कमी अपनी आंखों व चेहरे के भाव और शारीरिक भाव-भंगिमाओं से पूरी करते हैं। वे एक घाघ किस्म के पुलिस अधिकारी के रूप में सामने आते हैं, जो सिस्टम में मौजूद हर गड़बड़ी को पहचानता है। शुरु के कुछ दृश्यों में उनका संवाद “आपको किसी ने गलत मिसगाइड किया है…” ध्यान खींचता है।

कहानी हमारी ईमानदार आइपीएस प्रियंका चोपड़ा को दोहरे संघर्ष में ले जाती है। पहला संघर्ष भ्रष्ट राजनेता बब्लू पांडे से है और दूसरा संघर्ष बीएन सिंह जैसे लोगों लोगों से है, जिनके हाथ में पूरा तंत्र है और जो जानते हैं कि कोई लाख सिर पटक ले उनकी मर्जी के बिना कुछ नहीं कर सकता। प्रियंका इस फिल्म में इस तरह से ईमानदार हैं जैसे मिनरल वाटर 100 प्रतिशत स्वच्छ होता है। उनके किसी निजी जीवन, उलझन, काम्प्लेक्स, कुंठा की झलक भी नहीं मिलती।

जबकि बीएन सिंह का स्याह चरित्र धीरे-धीरे बदलता है। प्रकाश झा की अदायगी में एक किस्म का ठहराव है। उन्होंने इतनी लाउड फिल्म में चरित्र को अंडरप्ले किया है और इसके बाद भी उसे गुम नहीं होने दिया। शायद प्रकाश झा के ये ‘शेड्स ऑफ ग्रे’ न देखने को मिलते तो फिल्म बहुत ही सपाट और उबाऊ हो जाती। इस फिल्म की मजबूरी थी कि वह प्रकाश झा को नायक नहीं बना सकती थी। लिहाजा कहानी लौटकर उसी पुराने ट्रैक पर पहुंच जाती है…

मगर ‘जय गंगाजल’ में आप फिल्म के भीतर एक फिल्म को संभावित होते और फिर उस संभावना को धुमिल होते हुए देख सकते हैं।

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