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‘सेंसुअस साउथ’


दक्षिण भारतीय सिनेमा को लेकर उत्तर भारतीयों के मन में बहुत से पुर्वग्रह हैं। मसलन वे अविश्वसनीय होती हैं। उनमें काफी हिंसा होती है। तड़क-भड़क वाली पोशाकें और भड़कीले नृत्य होते हैं। कुल मिलाकर यह तस्वीर काफी हद तक सही भी बैठती है। इन टाइप्ड इमेजेज के साथ दक्षिण के सिनेमा की सोशियोलॉजिकल स्टडी काफी दिलचस्प हो सकती है। यहां यह भी गौर करने लायक बात है कि दक्षिण के सिनेमा ने उत्तर भारत पर भी खूब राज किया है। बी-ग्रेड डब की गई फिल्में छोड़ दें तो श्याम-श्वेत जमाने की फिल्म कंपनी जेमिनी की हिन्दी फिल्मों ने रिकार्ड बिजनेस किया और भारतीय मध्यवर्गीय घरों में ये फिल्में काफी पॉपुलर भी रही हैं।मेरे बचपन में चंदामामा प्रकाशन वाले बी नागी रेड्डी की पारिवारिक फिल्में भी काफी हिट होती थीं। यह सब कुछ एक अलग से विमर्श का विषय हो सकता है मगर एक बात में मुझे दक्षिण बहुत मौलिक लगता है, भले वह कभी चर्चा का विषय न बना हो, वह है दक्षिण भारतीय फिल्मों का सेंसुअस होना। यह आश्चर्यजनक रूप से कूल और परंपरावादी दक्षिण भारतीय समाज के विपरीत छवि है। दक्षिण के निर्देशकों के पास न सिर्फ अपनी नायिकाओं को ज्यादा ऐंद्रिक ढंग से सामने लाने का सलीका है बल्कि प्रेम दृश्यों में भी वे दिलचस्प कल्पनाशीलता दिखाते हैं, जो कम से कम हॉलीवुड से प्रेम दृश्यों को कॉपी करने वाली हिन्दी फिल्मों के निर्देशकों के पास नहीं है।


यहां तक कि जिन फिल्मों को मीडिया में जबरन ‘हॉट’ और ‘सेंसुअस’ कहकर प्रचारित किया जाता है, वे दर्शकों के बीच ज्यादा पॉपुलर नहीं हो पाती हैं। इनमें मर्डर, जिस्म और ऐतराज जैसी फिल्मों का नाम लिया जा सकता है। मर्डर में इमरान हाशमी और मल्लिका शेरावत के बीच एक प्रेम दृश्य को देखकर किसी समीक्षक ने लिखा था कि ‘फिल्म की नायिका पार्किंसन की मरीज लगती है’। मुझे याद है बहुत साल पहले प्रीतीश नंदी के संपादन में निकलने वाली टाइम्स ग्रुप की मैगनीज ‘द इलेस्ट्रेटेड वीकली आफ इंडिया’ ने भारतीय सिनेमा में सेक्स और सेंसुअसनेस के इतिहास को समर्पित एक पूरा अंक ही निकला था। अपने कंटेंट और प्रस्तुतिकरण के लिहाज से वह एक असाधारण अंक था।

उसी अंक से यह पता चलता है कि व्ही शांताराम ने अपनी फिल्मों में असाधारण रुप से कलात्मक ऐंद्रिक दृश्य रचे थे। इसके बाद कलात्मकता के नजरिए से अगर किसी का नाम लिया जा सकता है तो वह निर्विवाद रूप से राजकपूर का होगा। मगर उसके बाद शायद ही कोई निर्देशक ऐसा हो जिसकी फिल्में आप उनकी गहरी ऐंद्रिकता और उसके कलात्मक चित्रण के कारण याद रख सकें। पुरानी फिल्मों में सहसा 1975 में आई एक फिल्म का नाम कौंधता है, वह थी जूली। मगर वह भी दक्षिण के एक निर्देशक केएस सेतुमाधवन की थी। अपने समय के लिहाज से फिल्म में विषय वस्तु का ट्रीटमेंट काफी बोल्ड था। फिल्म अनकहे ही सेक्स जैसे विषय के इर्द-गिर्द घूमती है और उसका ट्रीटमेंट भी विषय के मुताबिक सेंसुअस ही रखा गया है।

मगर बीते कुछ सालों में आई ज्यादातर फिल्मों ने सेंसुअस दृश्यों को सीधे-सीधे हॉलीवुड की फिल्मों से कॉपी करना शुरु कर दिया। मुझे नहीं लगता कि ये फिल्में सचमुच भारतीय दर्शकों को ऐंद्रिक लगती होंगी। वहीं दक्षिण की फिल्मों मे सेक्स के चित्रण को एक तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग फूहड़ कहकर खारिज कर देता है। दरअसल इसके पीछे हमारी वह मानसिकता काम करती है जो किसी भी भारतीय छवि को नापसंद करती है। मुझे लगता है कि भरत मुनि के श्रृंगार रस की अवधारणा दक्षिण के निर्देशकों ने खूब आत्मसात की है। वे राम गोपाल वर्मा और अनुराग बसु के मुकाबले उन ऐंद्रिक छवियों को उभारते हैं जो हमारे आसपास के जीवन में शामिल होती है और कहीं न कहीं हमारे अचेतन में बसी होती है।

आम तौर पर हम अपने अचेतन में दबी सेक्स छवियों को ही फैंटेसी में एक्सप्लोर करना चाहते हैं। दक्षिण के निर्देशक इसे खूब जानते हैं और वे इस तरह के दृश्यों में अद्भुत कल्पनाशीलता दिखाते हैं। चाहे वे मणि रत्नम जैसे परिष्कृत निर्देशक हों या मसाला तेलुगु फिल्मों के निर्देशक। उनकी नायिकाएं भारतीय छवि के साथ स्क्रीन पर आती हैं। उनकी सेक्सुअलिटी भी भारतीय होती है। उन प्रेम दृश्यों का वातावरण अनोखा हो सकता है और आपकी कल्पना को उत्तेजित भी कर सकता है पर अक्सर वह बनावटी या किसी विदेशी परिवेश की नकल नहीं होता।


हां, बस इतना कहा जा सकता है कि दक्षिण की और कमोवेश यह पूरे भारतीय सिनेमा पर लागू होता है- कि सारी ऐंद्रिकता पर एक पुरुष का नजरिया हावी होता है। यह दक्षिण में कुछ ज्यादा दिखता है। वे सेक्स का चित्रण भी पुरुष की डामिनेटिंग छवि को ही सामने रखकर करते हैं। स्त्रियां यहां पर पुरुष को खुश रखने वाली एक खूबसूरत अप्सरा अथवा गुड़िया के रूप में सामने आती हैं।

आम तौर पर सिनेमा में सेक्सुअलिटी के प्रति भारतीय जनमानस और खुद फिल्मकारों में काफी पुर्वग्रह हैं। इसे लेकर काफी बहस भी होती है। सिनेमा में सेक्स के ज्यादा स्पष्ट चित्रण को भारतीय संस्कृति के खिलाफ माना जाता है। तो फिर दक्षिण का सिनेमा तो शायद हमारी भारतीय और सांस्कृतिक इरोटिक परंपराओं को खंगाल रहा है? इसे लेकर बहस का रुख क्या होगा?

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