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हमें ये सीक्वेल चाहिए!

देखते-देखते हिन्दी फिल्मों के सीक्वेल बनने लगे. सबसे पहले सीक्वेल के बारे में पता लगा स्टारवार्स सिरीज से. किशोरावस्था का ज्यादा हिस्सा सीक्वेल देखते ही गुजरा. एंपायर स्ट्राइक्स बैक पहले देखी फिर रिटर्न आफ जेडाइ- मगर स्टारवार्स आज तक न देख सका. कुछ और सीक्वेल देखे- कई बार खराब, जैसे- डाइहार्ड का दूसरा भाग और कई बार इतने शानदार कि दांतो तले उंगलियां दबाए रह गए, जैसे- मैड मैक्स का पार्ट टू. इन दिनों फिल्म रिलीज होने से पहले ही उसकी अगली कड़ी का ऐलान कर दिया जाता है. ऐसे में कई बार कुछ ऐसी फिल्मों के नाम मन में घूम जाते हैं, जिसके बारे में अक्सर लगता है कि इनका सीक्वेल बनना चाहिए. यहां मैं ऐसी ही चार फिल्मों की चर्चा करना चाहता हूं. हर बेहतर फिल्म अपना खुद का एक संसार रचती है. इन बेहतरीन फिल्मों के साथ मेरी भी कल्पना ने उड़ान भरी तो लगा क्यूं न ये प्लॉट सबके साथ शेयर किए जाएं…

बैंडिट क्वीन

संभावित प्लॉट

फूलन के जीवन का एक नया अध्याय शुरु होता है. इस बार चंबल के बीहड़ नहीं, राजनीति के बीहड़ों से गुजरना था. फूलन 1994 में पैरोल पर छूटती है. खराब स्वास्थ्य और एक के बाद एक खत्म होते साथियों के चलते उसने ’83 में आत्मसमर्पण किया था. जेल से छूटने के बाद प्रदेश के तत्कालीन मुखिया ने सरकार की तरफ से उसके खिलाफ चल रहे सारे केस वापस ले लिए.

फूलन एकलव्य सेना का गठन करती है जिसका मकसद था छोटी जाति वालों को साक्षर और आत्मरक्षा के काबिल बनाना था. उमैद सिंह से शादी के बाद फूलन के जीवन एक नई राह पर चल पड़ता है. फूलन का राजनीतिक जीवन शुरु होता है. वह मीरजापुर से 11वीं लोकसभा के लिये चुनी जाती है.

मगर इस नई जिंदगी में सब कुछ नया नहीं है. बीते मौसम की हवाएँ एक बार फिर जिंदगी में आंधी बनकर चल पड़ती हैं. क्षत्रीय स्वाभिमान आंदोलन से जुड़े लोग फूलन के खिलाफ लामबंद होने लगते हैं. फूलन को अपनी राजनीतिक ताकत का एहसास होता है और वह आलोचनाओं की परवाह किए बगैर उनका इस्तेमाल करने लगती है. 25 जुलाई 2001 को नई दिल्ली में कार से निकल रही फूलन को गोलियों से छलनी कर दिया जाता है. यह बेहमई में 22 ठाकुरों को मारे जाने का प्रतिशोध था.

इस तरह एक चक्र पूरा होता है, जातियों को बीच सुलगती रंजिश, वर्चस्व की जंग और राजनीति के अपराधीकरण के बीच से गुजरती फूलन किसी मंजिल तक नहीं पहुंचती मगर उसकी जिजीविषा मौजूदा व्यवस्था पर अनगिनत सवाल छोड़ती चलती है.

क्यूं बने फिल्म?

बैंडिट क्वीन के सिक्वेल में सर्वाधिक संभावनाएं हैं, बीहड़ से निकली एक दलित स्त्री किस तरह से राजनीति में अपनी जगह बनाती है और किस तरह से जाति और वर्चस्व की लड़ाई इस धरातल पर चलती रहती है, यह अपने में एक रोमांचक महागाथा की तरह है और शायद इसे फिल्माया जाना उसके डकैत जीवन को पर्दे पर उतारने से ज्यादा जोखिम भरा है.

परिंदा

संभावित प्लॉट
छोटे भाई करन और नई-नवेली पत्नी की क्रूर हत्या के बाद अन्ना को आग के हवाले करके किशन अपराधों की दुनिया से किनारा कर लेता है. उसके पास अतीत की कड़वी स्मृतियों के सिवा कुछ नहीं बचा है. वह मुंबई से दूर गोवा में छोटे से रेस्टोरेंट कारोबारी के रूप में एक गुमनाम सी जिंदगी बसर कर रहा है.

वहां उसकी मुलाकात एक तलाकशुदा महिला अनिता से होती है जो अपने बेटे के साथ अकेली रहती है. किशन को अतीत के अंधेरे से निकालने में उसकी बड़ी भूमिका बनती है. किशन एक नई जिंदगी शुरु करना चाहता है मगर उसका अतीत पीछा नहीं छोड़ता है.

जल्दी ही उसे पता लगता है कि न सिर्फ अन्ना के करीबी बल्कि अन्ना का दुश्मन मूसा के आदमी उसे खत्म करना चाहते हैं. वे उसे खोज निकालते हैं और जिंदगी-मौत की इस नई जद्दोजेहद में किशन का सामना एक भयानक सच्चाई से होता है.

आग में झुलसा अन्ना मरा नहीं जीवित था. वह खुद अपनी जान बचाने के लिए भाग रहा था. उसके साथियों ने पूरे कारोबार पर कब्जा कर लिया था और अब वे अन्ना को मारने के लिए ढूंढ़ रहे हैं. किशन के सामने एक राह निकलती है कोमल, शांत और उम्मीदों से भरे जीवन की और दूसरी एक अंतहीन दौड़ की जहां उसका मुकाबला प्रतिशोध की आग में जलते अन्ना और उसके साथियों से होना है…

क्यूं बने फिल्म?

यह विधु विनोद चोपड़ा का शायद आज भी सबसे बेहतरीन काम है, भारतीय थ्रिलर और अपराध फिल्मों में एक मील का पत्थर. इसमें एक डार्क इंटेंसिटी है. यह कहानी शुरु ही अधर में लटी परिस्थितियों से होती है. याद करें फिल्म में पहली बार माधुरी दीक्षित और अनिल कपूर कहां मिलते हैं? फिल्म का आरंभ ही एक तनाव भरी परिस्थिति से होता है. यह शैली अपने में कहानी के विस्तार की संभावनाएं समेटे हुए है. परिंदा हमारी दुनिया के समानांतर जैसे एक अलग दुनिया रचती है. उस दुनिया के भीतर जाना, वहां की कहानियों को सुनने का एक अलग ही रोमांच है.

रोबोट

संभावित प्लॉट
अपने भीतर लगी रेड-चिप के चलते भारी तबाही मचाने के कारण अदालत रोबोट चिट्टी को मानवजाति के लिए खतरा मानती है और उसे डिसएबल करने का आदेश देती है. चिट्टी कई बरसों से एक म्यूजियम का हिस्सा है. वह देखने में भले निष्क्रिय हो, उसका मस्तिष्क सक्रिय है और वह वायरलेस माध्यमों के सहारे से नई टेक्नोलॉजी से खुद को लगातार अपडेट करता रहता है.

एक दिन चिट्टी को एक ऐसी घटना का पता लगता है, जो मानवजाति के लिए एक बड़ा खतरा बनने जा रहा है. दरअसल यह सुदूर अंतरिक्ष से आ रहे एक सिगनल हैं, वैज्ञानिक अभी इस पहेली को सुलझा ही रहे होते हैं कि चिट्टी उन्हें डिकोड कर लेता है.

रोबोट का मानना है कि इन सिगनल्स से ये साफ है कि उनके इरादों में कहीं भी मित्रता का अंश नहीं है, वे पुराने समुद्री डाकुओं की तरह एक के बाद एक उन ग्रहों की खोजते और उन पर फतेह करते आ रहे हैं, जहां जीवन की संभावनाएं हैं. उसकी बात पर कोई यकीन नहीं करता है. चिट्टी के पास एक ही रास्ता है कि वह कानून और अपने रचयिता डा.वशीकरण को दिए वचन को तोड़कर दोबारा सक्रिय हो. वह डा.वशीकरण से बात करता है मगर वे इसके लिए राजी नहीं होते.

एक सुबह धरती का नजारा बदला हुआ दिखता है. तबाही शुरु हो चुकी है. चिट्टी खुद को म्यूजियम से आजाद करता है. शत्रुओं से लड़ने के लिए सबसे पहले उसे खुद को अपग्रेड करना है, वहीं शत्रु उसकी ताकत को भांप चुके और इस तरह एक तेज रफ्तार दौड़ शुरु हो जाती है दुनिया को बचाने की…

क्यूं बने फिल्म?

रोबोट भारत के गिने-चुने साइंस फिक्शंन्स में शायद सबसे बेहतर है. यह फिल्म मनोरंजन के साथ ही एक संवेदनशील मानवीय विषय को भी छूती है. फिल्म में चिट्टी नामक रोबोट बने रजनीकांत के चरित्र में विस्तार की अपार संभावनाएं हैं. उसमें वह गहराई है जो उसे सिक्वेल या सिरीज के लिए उपयुक्त बनाती है. भारत के अन्य सुपर हीरो की तरह वह बनावटी नहीं है. अपने यहां ज्यादातर फिल्मों में सुपरहीरो के मैनेरिज्म, पोशाक या उसके एक्शन पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है, उसके किरदार पर नहीं. बैटमैन जैसी गहराई ढूंढ़ना तो बहुत दूर की बात है. यह रजनीकांत की खूबी है कि वे इन कमियों से पार पाते हुए खुद को एक दिलचस्प देसी किरदार में ढाल सके हैं.

मनोरमा सिक्स फीट अंडर

संभावित प्लॉट
सत्यवीर सिंह रंधावा (जी हां, यही नाम था इस फिल्म के जूनियर इंजीनियर का जो शौकिया जासूसी नॉवेल भी लिखता था) उसी छोटे शहर की हलचल से रहित दुनिया में मगन है. इस बीच उसकी जिंदगी में थोड़ा बदलाव आया है, घर में एक नन्हीं बच्ची का आगमन हुआ है, और उसकी पत्नी निम्मी पहले के मुकाबले बच्चों में ज्यादा मशगूल है.

सत्यवीर के सामने दूसरी तरह के दबाव हैं. प्रकाशक अब उस पर दबाव डालने लगे हैं. पिछली किताबों की सेल कम हुई है. वहीं कुछ दूसरे लेखकों की खराब किताबें भी काफी बिकी हैं. इसी बीच एक दिन चाय की दुकान पर एक अनजान व्यक्ति बातों-बातों में सत्यवीर को अगले उपन्यास का प्लॉट दे जाता है. सत्यवीर फटाफट उपन्यास लिख देता है. उपन्यास न सिर्फ बिकता है कि बल्कि लंबे समय बात उसके पास पाठकों के पत्र आने शुरु हो जाते हैं.

मामला उस वक्त अचानक एक रहस्यमय करवट लेता है जब उसे यह पता लगता है कि एक हत्या की साजिश को आधार बनाकर उपन्यास में लिखी घटनाएं हू-ब-हू वहां से अस्सी किलोमीटर दूर बसे एक कसबे में हुई घटना से मेल खा रही हैं। सत्यवीर को यह बात पता लगती है तो वह हैरान रह जाता है। राज का पता लगाने के लिए वह उस कसबे जाता है, मगर उसे यह नहीं पता होता है कि ऐसा करके वह अपनी जिंदगी के लिए सबसे बड़ा खतरा मोल लेने जा रहा है।

क्यूं बने फिल्म?

मनोरमा सिक्स फीट अंडर पश्चिम की नॉयर सिनेमा शैली में एक अद्भुत फिल्म है और कई मायनों में मौलिक भी. इस फिल्म की सबसे बड़ी खूबी है कि इसका परिवेश और नायक का चरित्र चित्रण. इसमें अपार संभावनाएं हैं आगे की कथा बुनने की. यह अपने में शैली या जॅनर की तरह काम कर सकता है.

पुनश्चयः क्या बोले नवदीप…

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