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अनजान टापू पर नफरत और प्रेम


किताबों और फिल्मों का गहरा रिश्ता है। गौर करें तो भारतीय समांतर सिनेमा या जिसे हम कला सिनेमा कहते हैं उसकी बुनियाद में ही आधुनिक हिन्दी साहित्य है। इस पर मैं कभी अलग से लिखना चाहूंगा। इसे छोड़ भी दें तो दुनिया भर में स्तरीय सिनेमा का निर्माण किताबों को आधार बनाकर हुआ है। गॉन विथ द विंड, बेनहर, ए फेयर टू आर्म्स, डाक्टर जिवागो, ग्रैफ्स आफ रैथ, पाथेर पांचाली, गाइड जैसी तमाम फिल्में हैं, जिनका नाम लिया जा सकता है। यहां तक कि मदर इंडिया भी पर्ल एस बक के उपन्यास को आधार बनाकर लिखी गई थी।मगर मैं यहां कुछ उन उपन्यासों का जिक्र करना चाहता हूं जो अपने विन्यास में सिनेमा के बहुत करीब हैं। बड़े फलक पर देखें तो इसमें कृश्न चंदर के कई उपन्यास, विभूतिभूषण बंधोपाध्याय की पाथेर पांचाली और आरके नारायण की गाइड को भी समेटा जा सकता है। इन उपन्यासों को पढ़ना दरअसल एक किस्म के गहन सिनेमाई अनुभव से गुजरना है। मगर इनके बारे में भी फिर कभी बात होगी।

इस पोस्ट में मैं सिर्फ उन दो उपन्यासों का जिक्र करना चाहूंगा जो अपने-आप में पूरे उपन्यास हैं मगर उनकी संरचना सिनेमा को आधार बनाकर की गई है। इन्हें पढ़ना सचमुच उपन्यास पढ़ने से ज्यादा एक ‘फिल्म देखना’ है। जब मैं ‘फिल्म देखना’ शब्द का इस्तेमाल कर रहा हूं तो इस काफी गंभीर और कलात्मक मायनों में समझने की कोशिश कर रहा हं। किसी भी उपन्यास की भाषा को एक स्तरीय सिनेमा देखने के अनुभव के करीब ला सकने के लिए बड़े भाषाई कौशल की जरूरत होती है। इसके लिए जरूरी है कि कथानक में सिनेमा की पटकथा जैसी चुस्ती तो हो मगर वह किसी घटिया जासूसी उपन्यास में न बदलने पाए। भाषा में ऐसी बिंबात्मकता हो कि आप एक बेहतरीन सिनेमा देखने के अनुभव से गुजर सकें। इस सबके बाद भी वह एक स्तरीय साहित्यिक रचना की कसौटियों पर भी खरा उतरे।

मैंने दरअसल बचपन से किशोरावस्था के बीच दो ऐसे ही ‘उपन्यास देखे’ या ‘फिल्में पढ़ीं’। इन दोनों उपन्यासों से मैंने कहानी कहने के तरीके और नैरेशन के बारे में काफी कुछ सीखा। इतना ही नहीं सिनेमा के नैरेशन को शायद मैं आज इतना बेहतर नहीं समझ सकता था अगर मैंने ये दो किताबें न पढ़ी होतीं। पहली किताब थी मनोहर मलगांवकर की ‘शालीमार’ और दूसरी थी ख्वाजा अहमद अब्बास की ‘बंबई रात की बाहों में’।

पहली किताब के बारे में पहले।

पटकथा लेखन के उस्ताद कृष्णा शाह ने ‘शालीमार’ की पटकथा खुद स्टैनफर्ड शेरमॅन के साथ मिलकर लिखी थी। चूंकि शालीमार अपने दौर की एक महत्वाकांक्षी फिल्म थी और कृष्णा शाह खुद हॉलीवुड और ब्रॉड-वे में काफी हाथ आजमा चुके थे, लिहाजा उन्होंने इस पर किताब लिखने का जिम्मा सौंपा अंग्रेजी के लेखक मनोहर मलगांवकर को, जो अपनी किताब ‘द मैन हू किल्ड गांधी’ की वजह से ज्यादा जाने जाते हैं। मैंने इसका हिन्दी अनुवाद पढ़ा, जो वाकई बहुत अच्छा था। इसे हिन्दी-उर्दू मिश्रित खालिस हिन्दुस्तानी जुबान में लिखा गया था। तो इस तरह से चार दिग्गजों की मेहनत से जो किताब तैयार हुई थी वह वाकई लाजवाब थी।

किताब की सबसे बड़ी खूबी थी चरित्र चित्रण, खूब-खूब बारीक डिटेल्स और दिलचस्प ब्योरे। शालीमार, जो एक फ्लाप और अपने समय से आगे की फिल्म मानी जाती है, हूबहू इस उपन्यास को आधार बनाकर लिखी गई थी। यदि आप उपन्यास पढ़कर फिल्म देखें तो हैरान रह जाएंगे कि हीरे की चोरी जैसे घिसे हुए सब्जेक्ट पर क्या वाकई इतने शोध के साथ लिखा जा सकता है। हैरानी की बात यह है कि उपन्यास के विपरीत फिल्म मुंबइया लटकों-झटकों और गानों में फंसकर रह गई।

वापस लौटते हैं किताब पर। किताब दो भागों में है। पहला भाग बहुत छोटा है छह सात पृष्ठों का। इसे नायिका की आत्मकथात्मक शैली में लिखा गया है। पूणे में एक आर्मी के जवान से प्यार होना और धोखा खाना। बस इतना ही। अगला भाग दरअसल एक थ्रिलर जैसा है। हीरों की चोरी के लिए जुटे दुनिया के दिग्गज चोर, कानून की पहुंच से दूर एक टापू और साजिश। इस उपन्यास की खूबी है इसके बारीक तथ्यों से सजाए गए ब्योरे।


शुरुआत एक हत्या से होती है। जिस गन से गोली चलती है आप उसकी तकनीकी खूबियों से भी वाकिफ हो जाते हैं। आगे आने वाले हर किरदार का अपना इतिहास है। वह काल्पनिक नहीं है। एंटर द ड्रैगन के अभिनेता जॉन सैक्सन के निभाए किरदार के बारे में आप जानना शुरु करते हैं तो उनका फौजी इतिहास, वास्तविक युद्ध के डिटेल सामने आते हैं। वे बोल नहीं सकते- इसकी बाइलोजिकल डिटेल भी आपको पता चलती है। उनकी छड़ी आवाज नहीं करती क्योंकि उसके नीचे एक रबर का टुकड़ा लगा है।

फिल्म के विलेन रेक्स हैरीसन एक नफासत पसंद खलनायक है। किताब में उसके खाने की मेज पर लगे लजीज पकवानों का भी जिक्र है। खुले में पकाई जा रही समुद्री मछलियों से लेकर महल में सजी नाजुक और खूबसूरत सजावटी चीजों तक में आप रमने लगते हैं। इसमें खूबसूरत सोने की परत वाले सिगरेट केस, चाइनीज क्राकरी, पर्दे से लेकर बाथरूम मे लगे कीमती टाइल्स तक के बारे में इतनी बारीकी से लिखा गया है कि पढ़ते-पढ़ते आपको लगता है आप सचमुच किसी टापू में बने आलीशान महल के मेहमान हैं। और जब आप हिफाजत में रखे गए हीरे की तरफ बढ़ते हैं तो उन तकनीकी बारीकियों से दो-चार होते हैं जो उस हीरे की हिफाजत के लिए जुटाई गई हैं। जमीन में बिछाए विस्फोटक, लेजर बीम, अलार्म, क्लोज सर्किट कैमरों के बारे में बहुत प्रमाणिकता से लिखा गया है।

इस सबके बाद भी अगर सिर्फ इतना होता तो यह एक दिलचस्प उपन्यास नहीं होता। यहां चरित्रों के बीच दिलचस्प टकराव है, उनका सेंस आफ ह्यूमर, उनके बदलते रंग हैं जो आपको हैरत में डाल देते हैं। सिनेमा मे मोंताज विधा का व्याकरण रचने वाले आइजेंस्टाइन ने लिखा था कि कैसे सपाट चरित्र होने पर आप अपनी दिलचस्पी खो देते हैं और चरित्र की अनिश्चितता आपको उसमें उलझाए रखती है।

‘शालीमार’ का हर चरित्र बहुआयामी है। जीनत एक सांवली नर्स है। नायक की पूर्व प्रेमिका। उससे नफरत करती है मगर कई प्रसंगों में पुराना आकर्षण जोर मारने लगता है। प्रेम आवेग के साथ उमड़ता है तो फरेब की कड़वाहट भी आ जाती है। उपन्यास के कई हिस्से नायक-नायिका के बीच दिलचस्प नोकझोंक से भरे हैं। रेक्स हैरिसन एक तहजीब और नफासत पसंद खलनायक है। उसकी इस नफासत में छिपी क्रूरता का एहसास हमें एक ही दृश्य में हो जाता है, जहां एक व्यक्ति को गोली से मौत के बाद वह नौकरों से कहता है कि यहां की गंदगी साफ करो।

कुल मिलाकर सभ्यता से दूर एक अपराधी की मिल्कियत वाला अनजान टापू, दुनिया भर को चोरों का जमावड़ा, करोड़ों की कीमत का सुर्ख खूबसूरत हीरा, इस पृष्ठभूमि में पनपती नफरत और मुहब्बत… ‘शालीमार’ आपको किसी और ही दुनिया मे ले जाता है। उपन्यास का अंत थोड़ा कमजोर है और उतना भव्य नहीं है, जैसा कि पूरे उपन्यास का कैनवस है, मगर आप अलग तरह के अनुभव से गजरने की संतुष्टि के साथ उपन्यास रखते हैं।

‘बंबई रात की बाहों में’ के बारे में अगली बार।

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3 Comments

  1. सारा आकाश की पटकथा हाल ही मे पढी है। फिल्म और उपन्यास को कैसे अंतर से पाटा जाता है और किस खूबी से पेश किया जाता है यह बात राजकमल द्वारा प्रकाशित सारा आकाश पटकथा से बखूबी पता चलता है।
    उपन्यास हिट हो तो जरूरी नहीं कि फिल्म भी हिट होगी ही। उदा. चेतन भगत के उपन्यास पर आधारित फिल्म हाल ही में कमजोर साबित हुई ।

    अच्छी पोस्ट।

  2. अच्छा लगा पढ़ना. बीच बीच में द काईट रनर की याद आदि रही..जहाँ उपन्यास बाँधे रखता है और फिल्म हल्की पड़ जाती है. आगे आलेख का इन्तजार है.

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