Memory

सुचित्रा फिल्म सोसाइटी


यह असफल सा प्रयास है अपने वर्तमान को अतीत की तरह टटोलने का। यदि बैंगलोर कभी अपना डेरा उठ जाए तो क्या ऐसा होगा जो मेरी स्मृति में बसा रह जाएगा। जाहिर तौर बारिश, बारिश और बारिश। हर शाम क्षितिज से उमड़ते काले बादल और उनमें बिजली कि हल्की कौंध। हवा, हवा और हवा।…और क्या याद रह जाएगा। पैदल जाती लड़कियां। ढेरों लोग फुटपाथ पर एक ही अंदाज में चलते। गले में झूलता आई कार्ड और कानों में मोबाइल के ईयरफोन, पीठ पर एक बड़ा सा बैग। ठहरी हुई गाड़ियों का अंतहीन रेला। मगर हार्न की आवाज नहीं। क्योंकि बंगलुरु के लोग सड़कों पर लगने वाले जाम के आदी हो चुके हैं। कई बार तो सुबह लगे जाम में जब सभी गाड़ियों के इंजन बंद हो जाते हैं तो चिड़ियों की चहचहाहट भी सुनाई देने लगती है।कुछ और भी याद रह जाएगा। बनशंकरी की ऊंची-नीची सड़कें। हरितिमा मे खोती हुई। और उन सड़कों से होते हुए एक पुरानी बारिश और जंग खाई इमारत। सुचित्रा फिल्म सोसाइटी। बीते दो बरस में मेरे लिए बैंगलोर का एक इकलौता एक्सप्लोर है। हम भीड़ से होते हुए कुछ चौड़ी उदास सड़कों की तरफ मुड़ते हैं और नारियल के झुरमुट में छिपी एक इमारत दिखती है।

अपने यूपी के शिक्षा विभाग की याद दिलाता इसका दफ्तर भीतर एक हॉल और उसी में छोटी सी लाइब्रेरी। इमारत के पिछले हिस्से में एक छोटा सा थिएटर बना है। जहां पर महीने में तीन-चार फिल्में दिखाई जाती हैं। इसके बीच एक उजाड़ सा पार्क है। संस्था के संचालकों ने जैसे अपने मानक तय कर रखे हैं। सिनेमा के बाद कई बार उस पर डिस्कशन भी आमंत्रित किए जाते हैं।

सुचित्रा का अपना इतिहास भी है। करीब 30 वर्षों का। इसकी स्थापना के वक्त सत्यजीत रे भी यहां आए थे। सोसाइटी के सदस्यों की संख्या बहुत ज्यादा नहीं है। मगर एमएस सथ्यु और गिरीश करसावल्ली भी इसके मेंबर हैं। हर शो के पहले अकसर बाहर चल रही बूंदा-बांदी के बीच चाय या कॉफी और क्रकजैक या मोनेको बिस्कुट मिलते हैं। हर फिल्म शुरु होने से पहले घंटी बजती है और बाहर टहलते, सिगरेट सुलगाते या आपस में कुछ फुसफुसाते लोग भीतर चल पड़ते हैं।

इस छोटे से हॉल के अंधेरे में पहली बार मैं दुनिया के महानतम निर्देशकों से रू-ब-रू हुआ। खास तौर पर इंग्मार बर्गमॅन की तीखी, मन को बेधती उदासी को मैंने इसी हॉल के अंधेरे में जाना। बड़े पर्दे पर बर्गमन की श्याम-श्वेत छवियों को देखना। उनके कलाकारों के असाधारण क्लोज-अप। या फिर फ्रांसुआ त्रुफो की दुविधा से भरी दुनिया। या फिर गोदार की एब्सर्डिटी। सुचित्रा फिल्म सोसाइटी मुझे सिर्फ इसलिए याद रह जाएगी कि उम्र के उस दौर में जब चीजों के प्रति आप उदासीन होने लगते हैं मैं किसी किशोर जैसी उत्सुकता और धुकधुकी लेकर गया।

यहां दिखाई जाने वाली इन महान फिल्मों का इसके वातावरण से जैसे गहरा संबंध है। शायद यह एहसास मल्टीप्लेक्स मे जाकर उन्हीं फिल्मों को देखने से नहीं होगा। आप भीतर जाते हैं तो एक अकेलेपन के साथ। सुचित्रा फिल्म सोसाइटी मे देखी गई हर फिल्म मेरे भीतर ‘घटित’ हुई है। बारिश, हरियाली, बहती हवा और थिएटर के अंधेरे में ‘लिखी’ गई कहानियां जीवन का हिस्सा बन जाती हैं। प्रोजेक्टर की कांपती सफेद रोशनी से मन के अंधेरे में दमकती यादें… लेकिन अभी तो मैं बैगलोर में हूं और यादें वोडाफोन के जू-जू की तरह भविष्य की देहलीज पर इंतजार कर रही हैं…

Show More

Related Articles

9 Comments

  1. जल्दी जल्दी आया करो भाई। सुंदर है यह पोस्ट। फिल्में इस तरह से भी हमारे लिए अविस्मरणीय बनती हैं।
    और हां, सही नाम शायद गिरीश कासरवल्ली है।

  2. बस दिनेश भाई, रवीन्द्र भाई की बात को अपना पूरा समर्थन. जल्दी जल्दी आया करो.
    इसे पढने के बाद अगले हफ्ते आपके साथ सुचित्रा जाना तय है.

  3. hallo sir, coincedentally aapke blog par aana hua chavanni chap ke zarie. mai bangalore me naye hoon aur film libreary jaisi jagahen doond rahi hoon.meri filmo me gahari dilchaspi hai.aise me aapke blog ko pad kar lage ki mai khud suchitra pahunch gayi hoon. mai zald hi vahan ja kar aape anubhavon ko apni tarah se jeene ki koshish karoongi.

Leave a Reply

Back to top button
Close