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पोलर एक्सप्रेसः भविष्य का सिनेमा

चार साल पहले क्रिसमस के मौके पर सारी दुनिया में रिलीज की गई दुनिया की पहली ‘आल डिजिटल कैप्चर फिल्म’ पोलर एक्सप्रेस को इस क्रिसमस पर याद किया जाना चाहिए। इसलिए भी शायद यह भविष्य के सिनेमा की शुरुआत है। इस कला माध्यम को शायद वे ज्यादा बेहतर एक्सप्लोर कर सकेंगे जो सिनेमा को विशुद्ध कला की तरह नितांत निजी स्पर्श देना चाहते हैं।’पोलर एक्सप्रेस’ क्रिसमस की रात एक बच्चे के स्वप्निल नार्थ पोल की यात्रा की कहानी कहती है। यह एक अद्भुत फिल्म है जो आपको मानों सपनों की दुनिया में ले जाती है, मगर ठहरिए… सपनों की दुनिया में अपनी फैंटेसी के चलते नहीं बल्कि हर दृश्य को एक कल्पनातीत विस्तार देने के कारण। इस फिल्म के ट्रेन, उसके भारी-भरकम इंजन, डब्बों से छनती रोशनी, इंजन से उठती भाप और आसमान से लगातार गिरती बर्फ को भूल नहीं सकते। यह सब वास्तविक दुनिया में संभव नहीं है।

फिल्म का वह दृश्य भूला ही नहीं जा सकता जब फिल्म के मुख्य पात्र एक बच्चे के हाथों से ट्रेन का टिकट छूट जाता है और हम देखतें हैं कि कैसे वह फड़फड़ाता हुआ ट्रेन के बाहर उड़ता चला जाता है। बर्फ की मोटी तह पर दौड़ते भेड़ियों के खुरों से उड़ती बर्फ की फुहार के बीच एक परिंदे की चोंच में दबता है और वहां से छुट कर दोबारा ट्रेन की पटरियों के बीच फड़फड़ाता हुआ दोबारा ट्रेन के रोशनदान जैसे विंडो में आकर फंस जाता है। जब आप इस फिल्म को देखते हैं तो जैसे किसी कलाकार द्वारा रची गई पेंटिग के भीतर दाखिल हो चुके होते हैं, जो दुनिया उस कलाकार की आंखों से देखी जा रही है, चाहे वह बर्फ का गिरना हो, या खिड़कियां या चेहरे पर पड़ती रोशनी…यहां यह बताना मुनासिब होगा कि यह एक एनीमेशन फिल्म न होकर लाइव एक्शन फिल्म है, जो परफारमेंस कैप्चर टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करते हुए बनाई गई है। इस फिल्म के लिए अभिनेता टॉम हैक्स को पांच अलग-अलग किरदार निभाने पड़े, जिन्हें बाद में मोशन कैप्चर की मदद से एक एनीमेशन फिल्म में बदल दिया गया। फिल्म के निर्देशक राबर्ट जे़ड ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वे इसी नाम से आई बच्चों की किताब की शैली को बरकरार रखना चाहते थे।


‘पोलर एक्सप्रेस’ को मैं इसलिए भविष्य की फिल्म कहना चाहूंगा क्योंकि यह फिल्म कल्पनाओं के असीम विस्तार का रास्ता खोलती है। एक एक ऐसी रचनात्मक दुनिया की संभावना के बारे में बताती है जहां कलाकार का अपनी रचना पर पूरा नियंत्रण होगा। जैसे शब्द-शब्द से हजार पृष्ठों का ‘क्राइम एंड पनिश्मेंट’ या ‘वार एंड पीस’ जैसा नावेल लिख दिया जाता है या रंग और ब्रश के स्ट्रोक्स से गुएर्निका अथवा मोनालिसा जैसी कलाकृतियां तैयार होती हैं, वैसे ही डिजिटल टेक्नोलॉजी की बदौलत उस संसार की रचना की जा सकेगी जो हमारे भीतर है।

हालांकि पहले लुई बुनुएल जैसे निर्देशकों ने इसे साकार करने का प्रयास किया है मगर वे सिर्फ दृश्यों के एक नया अथवा सामान्य चेतना के लिए एक असंबद्ध क्रम देकर प्रभाव पैदा कर सके। वह एक समानांतर संसार का सृजन नहीं कर सके। शायद ‘पोलर एक्सप्रेस’ जैसी फिल्में भविष्य में और ज्यादा बनेंगी जो अभिनेता, कैमरे या लोकेशन का सहारा लिए बगैर एक रचना का रूप लेंगी।

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2 Comments

  1. यह तो मुझे पता ही नहीं था। फ़िल्म मेरे पास कुछ समय से है मगर प्रिंट खराब होने की वजह से देखने से बच रहा था। क्रिसमस सही वक़्त जान पड़ रहा है इसे देख डालने का।

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