Memory

एक नायक की बेचैन खोज

कल रात मैंने चैनल पर चल रही फिल्म यतीम देखी. यह फिल्म 1988 में रिलीज हुई थी. करीब 19 बरस बीत गए, मगर इसका जादू हमेशा की तरह मुझ पर छा गया. यतीम मेरी कुछ फेवरेट फिल्मों में से रही है. इस फिल्म को मैंने रिलीज होने के कुछ समय बाद एक पुराने से टाकीज़ में देखा था, मैं इस फिल्म से इस कदर प्रभावित हुआ कि उसके बाद जब कभी भी यह फिल्म लगती थी मैं सिनेमाहाल में जरूर जाता था.

शुरुआती दौर के जेपी दत्ता शानदार थे. खास तौर पर गुलामी और यतीम उनकी सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में हैं. इस फिल्म की खास बात है, हर वक्त छाई रहने वाली उदासी और अकेलापन… देशभक्त बनने से पहले के सनी का पूरा व्यक्तित्व एक खास चुंबकीय आकर्षण लिए था. उनकी चुप्पी, उदास चेहरा, अपने भावों को बस आंखों से अभिव्यक्त करना… इस फिल्म में उनका सर्वश्रेष्ठ रूप देखने को मिलता है.

जेपी दत्ता ने बड़े ही दिलचस्प ढंग से सनी की खूबसूरती को फिल्माने की कोशिश की है, आम तौर पर हमारे यहां नायिकाओं को पुरुष की निगाह से देखने खूब चलन है मगर किसी नायक को स्त्री की निगाह से देखने का प्रयास नहीं किया है. सरस्वतीचंद्र का एक एक गीत चंदन सा बदन… जैसे अपवाद बहुत कम हैं. यहां सनी की खूबसूरती को एक स्त्री की निगाह से देखने का प्रयास किया गया है. उनका धैर्य, औरतों के प्रति सम्मान की निगाह, उन्हें सुरक्षा देने वाला व्यक्तित्व सभी कुछ है. घोड़े को नहलाते नंगे बदन सनी या एक गीत में उनके पूरे पुरुषत्व की खूबसूरती को सामने रखने का प्रयास किया गया है.

यतीम की खूबी है कि जेपी दत्ता यहां पर कहानी कहने की जल्दीबाजी नहीं दिखाते. फिल्म की रफ्तार धीमी है, मगर इस धीमेपन का अपना सौंदर्य है. जैसे धीमी आंच पर पकने वाले किसी खास भोजन का या विलंबित लय के राग का… फिल्म की कहानी का अपना एक अर्थ है और यह बहुत कुछ राजकपूर की फिल्म आवारा के करीब जाकर ठहरती है.

यह फिल्म कई रिश्तों को नई निगाह से देखने का साहस करती है, जो कि आम तौर पर हिन्दी फिल्में नहीं कर पातीं मगर बहुत सधे तरीके से- एक नौजवान जिसे जीवन देने और पालन-पोषण करने वाले ने ही उसे यतीम बनाया, प्रेमी-प्रेमिका जो बचपन से ही भाई-बहन की तरह पले-बढ़े हैं.. इतना ही नहीं उनके बीच अनकहा मुंहबोला भाई-बहन का रिश्ता भी बनता है क्योंकि फराह के पिता को सनी बाबूजी ही मानता है. अपने सौतेले बेटे पर ही आसक्त एक मां… इन तमाम बातों का निर्वाह बिना अश्लील हुए निभा सकना जेपी दत्ता के बस की ही बात थी. मुझे यह फिल्म देखकर अफसोस होता है कि बाद में उन्होंने खऱाब फिल्में क्यों बनाईं…

फिल्म की लोकेशन के बिना शायद बात ही नहीं पूरी होगी. पूरी फिल्म में एक उजाड़ सा परिदृश्य है. कैनवस पर खाली आसमान और विशाल धरती दिखती है. गांव को इतने नेचुरल तरीके से शायद ही किसी फिल्म में दिखाया गया होगा. पुराने मकान, गलियां, पुलिस थाना और फतेहपुर सीकरी के आसपास का दृश्य.. जब यह फिल्म बनी थी तो उत्तर प्रदेश की लोकेशन चुनना ही अपने-आप में बड़ी अनोखी बात थी.

फिल्म मुझे इसलिए पसंद है क्योंकि यह जिंदगी को उसी तरह दिखाती है, जैसे हम-आप जीते हैं. जहां खुशियों के रंग उदासी में घुले-मिले हैं. यह एक नायक की बेचैन खोज भी है, अपनी आईडेंटिटी की खोज, अपने प्यार की खोज और अपने प्रतिशोध की खोज…

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3 Comments

  1. दिनेशजी
    आज पहली बार आपके चिट्ठे का पता चला, बहुत बढ़िया लेख लिखे हैं, एक एक कर सबको पढ़ रहा हूँ।
    मुबारक बेगम के बारे कई बार सुना था कि बहुत ही बदहाल हालत में जी रही हैं, बहुत दुख: होता है।
    मैने अपने संगीत चिट्ठे गीतों की महफिल पर मुबारक बेगम का एक दुर्लभ गाना सुनाया था, शायद आपने नहीं सुना हो, एक बार जरूर सुनिये।

    यहाँ
    http://mahaphil.blogspot.com/2007/08/blog-post_27.html

    और हाँ गीतों की महफिल के साईडबार में आपके चिट्ठे का लिंक जोड़ रहा हूँ। उम्मीद है आपको कोई आपत्ति नहीं होगी।

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