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हमने इतिहास को देखा है…

जो अपने लिए सोचीं थी कभी वो सारी दुआएं देता हूँ… 
साहिर (फिल्म ‘कभी-कभी ‘से)

इस बार अनजाने में ही हाथ लग गए एक नौजवान के कुछ नोट्स शेयर कर रहा हूं. नाम और लोकेशन का पता नहीं, गौर से पढ़कर देखें शायद वह आपके पड़ोस में ही कहीं हो..
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कई बार यह ख्याल आता है कि दुनिया को हिला देने वाली तारीखों के बीच अगर हम होते तो कैसी वैचारिक जद्दोजहद से गुजर रहे होते. शताब्दी की शुरुआत कुछ ऐसी ही उथल-पुथल से भरी थी. दो विश्वयुद्ध, उपनिवेशों का खात्मा, जीने का तरीका बदल देने वाले अविष्कार और सोसाइटी को बदल देने वाले आंदोलन. युरोपियन कंट्रीज के कॉफी हाउस में कभी न खत्म होने वाली बहसें. युद्ध के समर्थन में और युद्ध के खिलाफ, कला के समर्थन में और कला के खिलाफ, सत्ता के समर्थन में और सत्ता के खिलाफ.

हमने किसी बहुत बड़े मकसद के लिए सड़कों पर निकलने वाला जनसमूह नहीं देखा, उसके बारे में सुना जरूर, हमने किसी अविष्कार के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा देने वाले वैज्ञानिकों को नहीं जाना, उनके बारे में पढ़ा जरूर. हमने तमाम महान विचारकों को पढ़ा, उन पर बहस की, उनके बारे में दूसरों को बताया, उन पर लिखा, मगर किसी बड़े विचारक से कदम मिलाकर चलने का मौका हमें नहीं मिला. हमने बड़े विचारों को छोटे-छोटे स्वार्थों में बदलते देखा. बेमतलब की बातों पर खून-खराबा होते देखा. अपनी इस उम्र में हमने कोई इतिहास नहीं गढ़ा.

मगर दुनिया तो बदल रही थी, बदलती रही. दुनिया में शक्ति के संतुलन हमारे सामने ही डगमगाए. बचपन में पढ़ी कॉमिक्स की फंतासी जीवन में शामिल होने लगी. अस्सी के दशक में भविष्य के नायक फ्लैश गार्डेन को वीडियो फोन का इस्तेमाल करते दिखाया जाता था, जो हमारे लिए हैरानी थी. तब तो मोबाइल भी नहीं आए थे. टेलीग्राफ ऑफिस का विंडो देखते-देखते बंद हो गया. टाइपराइटर कचहरी तक सिमट गया. हमने वास्तविक दुनिया के पैरेलल एक वर्चुअल रियलिटी खड़ी कर ली. हमारा मन टुकड़ों में बंटता चला गया. हमने गंभीरता ओढ़ने वालों का मजाक उड़ाकर कहा कि हम उनसे ज्यादा संज़ीदा हैं.

हमने बड़ी-बड़ी बातें करनी बंद कर दीं. हमने छोटे-छोटे काम करने शुरु किए. जिनसे हमारी दुनिया में बहुत छोटे सही मगर बदलाव होने लगें. इस उम्मीद में शायद फिर कथाओं का कोई ऋषि चींटी का प्रयास देखकर चौंक पड़े. हमने वैल्यूज पर यकीन करना छोड़ दिया, क्योंकि उनकी आड़ में सबसे ज्यादा गुनाहगार छिपे हुए थे. हमने खुद के भीतर मूल्य तलाशने शुरू किए. हमने ईमानदारी से अपने बारे में सोचना शुरु किया. हमने दूसरों को तकलीफ पहुंचाकर परोपकारी बनने की बजाए स्वार्थी बनना स्वीकार किया. हमने दोस्त बनाए, हमने उन्हें भुला दिया, हम छिप कर रोए मगर अपने दुख को दुनिया के सामने नाटक बनाकर नहीं पेश किया.

हमने महसूस किया कि दुनिया तेजी से बदल रही थी. सड़कों पर आम चहल-पहल थी मगर खिड़कियों के पीछे हलचल थी. हवा में एसएमएस, सोशल नेटवर्किंग, ब्लागिंग की अदृश्य खिड़कियां बन रहीं थीं, उन खिड़कियों के पार एक नई दुनिया थी. दोस्त थे और खुद को अभिव्यक्त करने के मौके थे. एक छोटी सी चिड़िया की चहचहाहट दुनिया भर में फैल गई. खुद का चेहरा, खुद की जिंदगी, एक खुली किताब बन गई. हम अकेले होते हुए भी अकेले नहीं रह गए. महानगरों में अपने कमरे में कैद अकेले मुस्कुराते रहे, ठहाके लगाते रहे, उदास होते रहे, झुंझलाते रहे. और दुनिया में लाखों चेहरों पर कुछ ऐसे भी भाव थे. हम एक ऐसी दुनिया में थे, जहां की हर गली हर किसी के घर को पहुंचती थी. न तो रास्ते में पर्वत थे, न महासागर और दो राष्ट्रों का अहंकार.

की-बोर्ड पर दौड़ती उंगलियों ने दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश के मुखिया को चौंका दिया. हमने मधुमक्खियों की तरह मेहनत की. कई बार तो रातों को जागकर और लोकल ट्रेन-बसों में उबासी लेते हुए. हां, इसी से तो हमारे भीतर भरोसा जगा है. हमने टेक्नोलॉजी को विकसित होते और उसे खत्म होते देखा है. हमने अपने आसपास फैली दहशत, बारूद के धुएं और अनिश्चित भविष्य के बीच हंसना सीखा है. हां, हम यह कह सकते हैं कि हमने इतिहास को देखा है.

भरोसा रखें, हमने इस नए इतिहास को पढ़ना शुरु कर दिया है. जिस दिन हम उसे शुरु से आखिर तक समझ जाएंगे हमें यकीन है कि सब कुछ बदल जाएगा.

बीते साल एक टेब्लॉयड के एडिट पेज पर प्रकाशित

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