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ज़ुबैदा: उड़ना चाहती थी, गिरना, चाहती थी, संभलना चाहती थी मगर बंधना नहीं चाहती थी

महविश रज़वी

कुछ फिल्में देखकर ख़याल आता है कि ये अपने वक़्त से आगे की फिल्में थी, मगर ऐसा बहुत कम होता है कि कोई कहानी अपने वक़्त से बहुत आगे की हो, वो भी सच्ची कहानी।

साल 2001 में निर्देशक श्याम बेनेगल ने करिश्मा कपूर (ज़ुबैदा), रेखा (मंदिरा सिंह), मनोज बाजपेयी (विजेंद्र सिंह उर्फ विक्टर) के मुख्य किरदारों के साथ बनाई ‘ज़ुबैदा’। इस फ़िल्म की कहानी और स्क्रीनप्ले ख़ालिद महमूद ने लिखा था और बहुत बारीकी से लिखा था। ख़ालिद असल ज़िन्दगी में फ़िल्म की नायिका ज़ुबैदा- जिनपर ये फ़िल्म बनी है- उनके बेटे हैं।

निर्देशक श्याम बेनेगल की ख़ासियत रही हैं उनकी महिला प्रधान फिल्में। उनके किरदार कभी भी बहुत आला या बहुत खराब नहीं होते थे, इसीलिए भरोसेमंद लगते थे। ‘ज़ुबैदा’ से पहले वो, ‘भूमिका’, ‘मंथन’, ‘मंडी’, ‘निशांत’ जैसी कालजयी फिल्में दे चुके हैं।

ज़ुबैदा एक हँसमुख और फरमाबरदार लड़की है। उसके लिए दुनिया उतनी ही है जितनी उसके अब्बू, सुलेमान सेठ (अमरीश पुरी) ने दिखा दी, वो उसपर यक़ीन भी कर लेती है, मगर मुश्किल तब होती है जब उसके अब्बू ही उसकी दुनिया में आग लगाते हैं, और वो भी बहुत इतमीनान से। ज़ुबैदा की ज़िंदगी का हर फैसला उसके अब्बू करते हैं मगर ज़ुबैदा कभी उनकी फिक्र और मोहब्बत का केंद्र ही नहीं रही। हर फरमान इस ही बिनाह पर सुना दिया गया कि तुम बेटी हो, और बेटी होने के फ़र्ज़ अदा करो।

लेकिन कोई कब तक चुप रह सकता है, बार-बार हथौड़े की मार से तो लोहा भी बदल जाता है। नन्हीं सी उम्र में पति का साथ खो चुकी और एक बेटे की अकेले परवरिश कर रही ज़ुबैदा की ज़िंदगी में खुशियाँ दस्तक देती है। उसकी मुलाकात होती है जोधपुर के राजा विजेंद्र सिंह उर्फ विक्टर से। उसे पहली नज़र का इश्क़ तो नहीं कहेंगे, मगर वो पहली बार का इश्क़ ज़रूर था।

विक्टर की एक बीवी और दो बच्चे हैं मगर ज़ुबैदा मोहब्बत की राह में हर चीज़ को नज़रंदाज़ कर आगे बढ़ती है और थाम लेती है उसका हाथ। लेकिन पिता, पति और बेटे को खो चुकी एक अल्हड़ लड़की और कितना बर्दाश्त करने की क़ुव्वत रखती है? उसमें कितनी हिम्मत बची होगी कि वो छोटी सी ज़िन्दगी की बड़ी-बड़ी दुश्वारियों का सामना करे?

ज़ुबैदा बेगम की वास्तविक तस्वीर, जिनके जीवन पर खालिद मोहम्मद ने इस फिल्म की पटकथा लिखी थी।

यूं तो ज़ुबैदा की कहानी ख़ुद में ही बहुत बड़ी वजह है, मगर फ़िल्म को देखने की एक और वजह है औलाद और माँ-बाप के बदलते रिश्ते। कैसे ज़ुबैदा का बेटा रियाज़ (रजित कपूर), उससे सारी उम्र दूर रहकर भी ख़ुद को उससे अलग नहीं कर पाता। एक अजीब सी कशिश है, खिंचाव है उसके किरदार में जो वो अपनी माँ को इस नज़र से नहीं देखता, जिस नज़र से दुनिया दिखा रही होती है। कैसे ज़ुबैदा के माँ-बाप हमेशा करीब होकर भी उसे उसके हिस्से का सुख नहीं दे सके। ये फ़िल्म आपको रिश्तों के कई रंगों से रूबरू कराएगी। मुझे सबसे खबूसुरत रियाज़ और ज़ुबैदा का रिश्ता लगा, वो इतनी दूर रहे मगर अंत तक साथ रहे।

आपको ‘ज़ुबैदा’ देखनी चाहिए, एक लड़की के ख्वाबों और ख्वाहिशों को समझने के लिए। कैसे माँ-बाप जाने-अनजाने अपने बच्चों की ख्वाहिशों का गला घोंटते हैं। फ़िल्म के कई हिस्से आपको झकझोर देंगे। जब ज़ुबैदा बड़े लाड़ से इतराकर अपने अब्बू के गले लग जाती है और ज़िद करती है कि अब्बू मुझे नहीं करनी शादी, मैं पढ़ना चाहती हूं।

अब्बू उसके हाथ झटक कर तुरंत आगे बढ़ जाते हैं, और अगले ही पल वो अपनी माँ से कहती है, “इस जल्लाद से कह दो मैं शादी नहीं करूंगी।” माँ सिर्फ इतना ही कह पाती है कि “तौबा करो, अपने अब्बू के लिए कौन ऐसे बोलता है।” वो ज़ुबैदा की कैफियत समझती है मगर कुछ कर नहीं सकती, क्योंकि उन्हें कभी अपने लिए भी इतनी छूट नहीं मिली। पर सोचने वाली बात ये है कि उसके अब्बू को किसी ने क्यों नहीं बताया कि अपनी ही औलाद के साथ ऐसे नहीं करते। इस फ्रेम में करिश्मा की अदाकारी देखते ही बनती है, कैसे एक ही पल में वो मासूम से लेकर बाग़ी तक हर इमोशन को यूँही निभा ले जाती हैं।

अभिनय की बात करें तो करिश्मा कपूर ने इस फ़िल्म से ख़ुद को स्थापित कर लिया था, कैरियर के चरम पर उन्होंने ये रिस्क लिया और बहुत ईमानदारी से निभाया। टीनएज लड़की से लेकर परिपक्व औरत होने तक वो हर फ्रेम में दिलकश लगी हैं। हर उम्र की बारीकी को इतना बख़ूबी निभाया है कि कहीं किसी बेहतरी की गुंजाइश ही नहीं लगती।

दूसरी तरफ रेखा (मंदिरा सिंह) का किरदार मुझे सबसे दिलचस्प लगा, जोकि ज़ुबैदा की सौतन हैं। उनके किरदार के इतने लेयर्स हैं, मगर आप एक पल को भी उनसे नफरत नहीं कर पाते। वो कई बार ज़ुबैदा से उसकी चंचलता और अल्हड़पन के लिए सवाल करती हैं, वो उसे रोकना नहीं चाहती, संभालना चाहती हैं। मगर वो ऐसा कैसे कर सकती थी, जब वो ख़ुद कहीं न कहीं उसके जैसी बन जाना चाहती थी। ज़ुबैदा उनसे अपनी असुरक्षा खुलकर बयान करती रहती है, मगर तब भी वो उसे बुरी नज़र से नहीं देखती।

दरअसल मैंडी (महल की चारदीवारी में लोगों से दूर उन्हें यही नाम पसंद था), और मंदिरा ख़ुद में ही बहुत अलग हैं। मैंडी को भी हसरत थी कि वो खुलकर हँसे, एक आम औरत की तरह अपने पति के साथ ज़िन्दगी बिताएं, पर बचपन से सिखाए गए क़ायदे उन्हें जकड़े रहते हैं। मैंडी नफरत और जलन को भी दबा ले जाती है क्योंकि महल के नियम उसे इजाज़त नहीं देते। वो ज़ुबैदा में एक सहेली, एक बहन देख रही थी।

एक सीन में वो ज़ुबैदा से कहती हैं, “हम आपको तो नहीं संभाल सके ना।” तब आप महसूस करेंगे कि उस वक़्त उनके लहजे में सिर्फ अधिकार नहीं, थोड़ी सी जलन भी होती है। वक़्त और हालात साथ देते तो शायद वो भी ज़ुबैदा के साथ रहते-रहते खुलकर जज़्बात ज़ाहिर करना सीख लेती। एक सीन में ज़ुबैदा और मैंडी बैडमिंटन खेल रही होती हैं, ज़ुबैदा ने पैंट-टी शर्ट और मैंडी ने साड़ी पहन रखी है। ये इतना बताने के लिए काफी है कि मैंडी, ज़ुबैदा से बहुत अलग नहीं है। मगर वो उसकी तरह रह नहीं सकती। इस किरदार को जिस ठहराव की ज़रूरत थी, उसे रेखा ने अपनी आवाज़, उठने-बैठने और यहाँ तक कि चलने के ढंग में भी बखूबी आत्मसार कर लिया।

वहीं इन दोनों के पति बने मनोज बाजपेयी एक बहुत ही बंधे हुए किरदार में थे। वो ज़ुबैदा से इश्क़ तो करते हैं, निभाते भी हैं, मगर किस हद तक करते हैं ये अंदाज़ा लगाना मुश्किल होता है। वो उसके लिए क्या सोचते हैं ये पूरी तरह पता ही नहीं चल पाता। उनके और मंदिरा के रिश्ते को भी बहुत ही कम वक्त में समेट दिया गया। लेखकों को उन्हें थोड़ा और विस्तार देने की ज़रूरत थी। हाँ एक अभिनेता के तौर पर मनोज ने ईमानदारी निभाई। उस ईमानदारी का ही सिला है कि आज इंडस्ट्री में उनकी अलग छाप है।

इनके अलावा सुरेखा सीकरी, लिलेट दूबे, अमरीश पुरी, रजित कपूर जैसी मज़बूत सपोर्टिंग कास्ट ने हर फ्रेम को और मज़बूती दी। सुरेखा सीकरी के हिस्से कुछ बेहद प्यारे सीन्स आये हैं, जिन्हें देखकर उनसे मोहब्बत और बढ़ जाती है।

फ़िल्म का संगीत इसकी जान है। चाहे बैकग्राउंड म्यूजिक हो या गाने, एआर रहमान ने हर साज़ पर बारीकी से काम किया है। संगीत और सीन्स का इतना अच्छा मिलान बहुत कम फिल्मों में देखने को मिलता है। फ़िल्म में किसी एक गाने को पसंदीदा कह पाना सबसे मुश्किल सवाल है। लेकिन ‘मैं अलबेली’ गाने में मदमस्त होकर नाचती ज़ुबैदा को देखना एक खुशनुमा पल है।

अंत में बस इतना ही कि बदचलन औरत बनने के लिए एक बुराई और बाकिरदार आदमी बने रहने के लिए सिर्फ एक भलाई काफी है।

महविश रज़वी यानी माही प्रोफेशन से तो जर्नलिस्ट हैं लेकिन उनकी एक और पहचान है। वे एक उभरती हुई रचनाकार हैं। हाल के दिनों में उनकी कुछ कहानियां चर्चित हुई हैं। सिनेमा पर उनका लेखन और फेसबुक पर समसामयिक मुद्दों पर टिप्पणियां भी उल्लेखनीय हैं।

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